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महात्मा गाँधी की नजर में ईसाई मिशनरियाँ


लेखकः डॉ. कमल किशोर गोयनका

ईसाई मिशनरियों का विचार था कि गाँधी को ईसाई बना लिया जाय तो भारत को ईसाई देश बनाना बहुत आसान हो जायेगा।

दक्षिण अफ्रीका में कई बार ऐसे प्रयत्न हुए और भारत आने पर कई पादरियों, ईसाई मिशनरियों तथात 80 वर्ष के ए.डब्ल्यू बेकर, 86 वर्ष की एमिली किनेर्डके जैसे अनेक ईसाइयों ने उऩ्हें ईसाई बनाने के लिए प्रेरित किया और यहाँ तक कहा किः ʹयदि आपने ईसा मसीह को स्वीकार नहीं किया तो आपका उद्धार नहीं होगा।ʹ

(ʹहरिजनःʹ 4 अगस्त 1940)

गाँधी जी ईसा मसीह और उनके जीवन तथा ʹबाइबिलʹ एवं ईसाई सिद्धान्तों की परम्परागत ईसाई व्याख्या को अस्वीकार करते हुए अपनी व्याख्या प्रस्तुत करते थे। उन्होंने 16 जून, 1927 को डबल्यू. बी. स्टोवर को पत्र में लिखा भी था किः “मैं बाईबिलʹʹ या ʹईसाʹ के जीवन की परम्परागत व्याख्या को स्वीकार नहीं करता हूँ।”

गाँधी जी ने प्रमुख रूप से ईसा के ʹदेवत्वʹ तथा ʹअवतारʹ स्वरूप का खंडन किया।

उन्होंने आर.ए.ह्यूम को 13 फरवरी, 1926 को पत्र में लिखाः “मैं ईसा मसीह को ईश्वर का एकमात्र पुत्र या ईश्वर का अवतार नहीं मानता, लेकिन मानव जाति के एक शिक्षक के रूप में उनके प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है।”

गाँधी जी ने अनेक बार कहा और लिखा कि वे ईसा को अन्य महात्माओं और शिक्षकों की तरह ʹमानव प्राणीʹ ही मानते हैं। ऐसे शिक्षक के रूप में वे ʹमहान्ʹ थे परन्तु ʹमहानतम्ʹ नहीं थे। (गाँधी वाङमयः खंड 34, पृष्ठ 11)

गाँधी जी ने ईसा का ईश्वर का एकमात्र पुत्रʹ होने की ईसाई धारणा का भी खंडन किया और 4 अगस्त 1940 को हरिजन में लिखाः “वे ईश्वर के एक पुत्र भर थे, चाहे हम सबसे कितने ही पवित्र क्यों न रहे हों। परन्तु हम में से हर एक ईश्वर का पुत्र है और हर कोई वही काम करने की क्षमता रखता है जो ईसा मसीह ने कर दिखाया था, बशर्ते कि हम अपने भीतर विद्यमान दिव्यत्व को व्यक्त करने की कोशिश करें।” इसके साथ गाँधी जी ने ईसा के चमत्कारों का सतर्क भाषा में खंडन किया।

महात्मा गाँधी ने ईसाई अंधविश्वासों का अनेक रूपों में खंडन किया। ʹईसा मुक्ति के लिए आवश्यक है….ʹ उनकी इस मान्यता का उन्होंने अस्वीकार किया।

(11 दिसम्बर, 1927 का पत्र)

उन्होंने ईसा द्वारा सारे पापों को घी डालने की बात का भी सतर्क खंडन किया।

(यंग इंडियाः 22 दिसम्बर, 1927)

गाँधी जी ने यह भी अस्वीकार किया कि ʹधर्मांतरण ईश्वरीय कार्य है।ʹ उन्होंने ए.ए. पॉल को उत्तर देते हुए ʹहरिजनʹ के 28 दिसम्बर, 1935 के अंक में लिखा कि ईसाई धर्म  प्रचारकों का यह कहना कि ʹवे लोगों को ईश्वर के पक्ष में खींच रहे हैं और ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं…ʹ तो मनुष्य ने यह कार्य उसके हाथों से क्यों ले लिया है ? ईश्वर से कोई कार्य छीनने वाला मनुष्य कौन होता है तथा क्या सर्वशक्तिमान् ईश्वर इतना असहाय है कि वह मनुष्यों को अपनी ओर नहीं खींच सकता ?

(गाँधी वाङमयः खंड 61, पृष्ठ 87 तथा 494)

गाँधी जी ने लंदन में 8 अक्टूबर, 1931 को ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की मिशनरी संस्थाओं के सम्मेलन में ईसाइयों के सम्मुख कहा कि ʹगॉड के रूप में ईश्वर की, जो सबका पिता है, पूजा करना मेरे लिए उचित नहीं होगा। यह नाम मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डालता, पर जब मैं ईश्वर को राम के रूप में सोचता हूँ तो वह मुझे पुलकित कर देता है। ईश्वर को गॉड के रूप में सोचने से मुझमें वह भावावेश नहीं आता जो ʹरामʹ के नाम से आता है। उसमें कितनी कविता है ! मैं जानता हूँ कि मेरे पूर्वजों ने उसे ʹरामʹ के रूप में ही जाना है। वे राम के द्वारा ही ऊपर उठे हैं और मैं जब राम का नाम लेता हूँ तो उसी शक्ति से ऊपर उठता हूँ। मेरे लिए गॉड नाम का प्रयोग, जैसा कि वह बाइबिल में प्रयुक्त हुआ है, सम्भव नहीं होगा। उसके द्वारा सत्य की और मेरा उठना मुझे सम्भव नहीं लगता। इसलिए मेरी समूची आत्मा आपकी इस शिक्षा को अस्वीकार करती है कि ʹरामʹ मेरा ईश्वर नहीं है।ʹ

(गाँधी वाङमयः खंड 48, पृष्ठ 141)

महात्मा गाँधी ने 2 मई, 1933 को पं. जवाहरलाल नेहरू को पत्र में लिखाः “हिन्दुत्व के द्वारा मैं ईसाई, इस्लाम और कई दूसरे धर्मों से प्रेम करता हूँ। यह छीन लिया जाये तो मेरे पास रह ही क्या जाता है ?” …..और इसीलिए वे हिन्दू धर्म की रक्षा करना चाहते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं किः “हिन्दू धर्म की सेवा और हिन्दू धर्म की रक्षा को छोड़कर मेरी कोई दूसरी प्रवृत्ति ही नहीं है।”

(गाँधी वाङमयः खंड 37, पृष्ठ 100)

गाँधी जी एक और तर्क देते हैं। वे कहते हैं किः “धर्म ऐसी वस्तु नहीं जो वस्त्र की तरह अपनी सुविधा के लिए बदला जा सके। धर्म के लिए तो मनुष्य विवाह, घर-संसार तथा देश तक को छोड़ देता है।”

(मणिलाल गाँधी को लिखे पत्र से, 3 अप्रैल 1926)

ईसाई मिशनरियों का यह तर्क था कि वे भारत को शिक्षित, संस्कारी तथा धार्मिक बनाना चाहते हैं, तो गाँधी जी ने इन मिशनरियों से कहा किः “जो भारतवर्ष का धर्मपरिवर्तन करना चाहते हैं, उनसे यही कहा जा सकता है किः हकीमजी पहले अपना इलाज कीजिये न ?”

(ʹयंग इंडियाःʹ 23 अप्रैल, 1931)

गाँधी जी आगे कहते हैं किः “भारत को कुछ सिखाने से पहले यहाँ से कुछ सीखना, कुछ ग्रहण करना होगा।”

(ʹयंग इंडियाʹ 11 अगस्त, 1927)

ʹक्या मनुष्य का धर्मान्तरण हो सकता है ?ʹ महात्मा गाँधी ने अनेक बार इस प्रश्न का भी उत्तर दिया था। उनका मत था कि यह सम्भव नहीं है, क्योंकि कोई भी पादरी या धर्म प्रचारक नये अनुयायी को यह कैसे बतलायेगा कि ʹबाइबिलʹ का वह अर्थ ले जो वह स्वयं लेता है ? कोई भी पादरी या मिशनरी ʹबाइबिलʹ से जो प्रकाश स्वयं लेता है, उसे किसी भी दूसरे मनुष्य के हृदय में शब्दों के द्वारा उतारना सम्भव नहीं है।”

(ʹहरिजनʹ 12 दिसम्बर, 1936)

गाँधी जी कई बार नये बने ईसाइयों की दुश्चरित्रता तथा मिशनरियों के कुकृत्यों का उल्लेख करते हैं। वे अपनी युवावस्था की एक घटना की चर्चा करते हुए कहते हैं-

“मुझे याद है, जब मैं नौजवान था उस समय एक हिन्दू ईसाई बन गया था। शहर भर जानता था कि नवीन धर्म में दीक्षित होने के बाद वह संस्कारी हिन्दू ईसा के नाम पर शराब पीने लगा, गोमांस खाने लगा और उसने अपना भारतीय लिबास छोड़ दिया। आगे चलकर मुझे मालूम हुआ, मेरे अनेक मिशनरी मित्र तो यही कहते हैं कि अपने धर्म को छोड़ने वाला ऐसा व्यक्ति बन्धन से छूटकर मुक्ति और दारिद्रय से  छूटकर समृद्धि प्राप्त करता है।”

(यंग इंडियाः 20 अगस्त, 1925)

“अभी कुछ दिन हुए, एक मिशनरी एक दुर्भिक्षपीड़ित अंचल में पैसा लेकर पहुँच गया। अकाल पीड़ितों को उसने पैसा बाँटा, उन्हें ईसाई बनाया, फिर उनका मंदिर हथिया लिया और उसे तुड़वा डाला। यह अत्याचार नहीं तो क्या है ? जिन हिन्दुओं ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया था, उनका अधिकार तो उस मंदिर पर नहीं रहा था और ईसाई मिशनरी का भी उस पर कोई हक नहीं था, पर वह मिशनरी वहाँ पहुँचता है और जो कुछ ही समय पहले यह मानते थे कि उस मंदिर में ईश्वर का वास है, उन्हीं के हाथ से उसे तुड़वा डालता है।”

(गाँधी वाङमयः खंड 61, पृष्ठ 49)

गाँधी जी ईसाई धर्म के एक और ʹव्यंग्य चित्रʹ की ओर मिशनरियों का ध्यान आकर्षित करते हैं कि यदि मिशनरियों की संख्या बढ़ती है तो हरिजनों में आपस में ही लड़ाई-झगड़े और खून खराबे की घटनाएँ बढ़ेंगी।

गाँधी जी इसी कारण ईसाइयों के धर्मान्तरण को ʹअशोभनʹ, ʹदूषितʹ, ʹहानिकारकʹ, ʹसंदेह एवं संघर्षपूर्णʹ, ʹअध्यात्मविहीनʹ, ʹभ्रष्ट करने वालाʹ, ʹसामाजिक ढाँचे को तोड़ने वालाʹ तथा ʹप्रलोभनों से पूर्णʹ कहते हैं। गाँधी जी का सम्पूर्ण वाङमय पढ़ जायें, ऐसी ही कटु आलोचनाओं से भरा पड़ा है।

गाँधी जी ने ईसाई मिशनरियों द्वारा चिकित्सा एवं शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कार्यों की कई बार प्रशंसा भी की, किन्तु उन्होंने इसके मूल में विद्यमान प्रलोभनों तथा उनके धर्म परिवर्तन के उद्देश्य पर गहरी चोट करते हुए एक मिशनरी से कहाः “जब तक आप अपनी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों से धर्मपरिवर्तन के पहलू को हटा नहीं देते, तब तक उनका मूल्य ही क्या है ? मिशन स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को ʹबाइबिलʹ की कक्षाओं में भाग लेने को बाध्य क्यों किया जाता है या उनसे इसकी अपेक्षा ही क्यों की जाती है ? यदि उनके लिए ईसा के संदेशों को समझना जरूरी है तो बुद्ध और मुहम्मद के संदेश को समझना जरूरी क्यों नहीं है ? धर्म की शिक्षा के लिए शिक्षा का प्रलोभन क्यों देना चाहिए ?”

(हरिजनः 17 अप्रैल,1937)

चिकित्सा क्षेत्र में गाँधी जी ने ईसाइयों द्वारा कोढ़ियों की सेवा करने की भी तारीफ की, लेकिन यह भी कहा कि “ये सारे रोगियों और सारे सहयोगियों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे धर्मपरिवर्तन करके ईसाई बन जायें।”

(हरिजनः 25 फरवरी, 1939)

गाँधी जी इन प्रलोभनों की धर्मनीति से व्याकुल थे। वे जानते थे कि अमेरिका तथा इंग्लैण्ड से ईसाई मिशनरियों के पास खूब धन आता है और उसका उपयोग मूलतः धर्मपरिवर्तन के लिए ही होता है। अतः उन्होंने स्पष्ट कहा कि  “आप ʹईश्वरʹ और ʹअर्थ-पिशाचʹ दोनों की सेवा एक साथ नहीं कर सकते।”

(यंग इंडियाः 8 दिसम्बर 1927)

इसके दस वर्ष के बाद गाँधी जी जॉन आर. मॉट से यही बात कहते हुए बोले कि “मेरा निश्चित मत है कि अमेरिका और इंगलैण्ड मिशनरी संस्थाओं के निमित्त जितना पैसा देता है, उससे लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई है। ईश्वर और धनासुर (मेमन) को एक साथ नहीं साधा जा सकता। मुझे तो ऐसी आशंका है कि भारत की सेवा करने के लिए धनासुर को ही भेजा गया है, ईश्वर पीछे रह गया है। परिणामतः वह एक-न-एक दिन उसका प्रतिशोध अवश्य करेगा।”

(हरिजनः 26 दिसम्बर, 1936)

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय और मानवीय दोनों ही दृष्टियों से ईसाई मिशनरियों से अपनी रीति-नीति, आचरण-व्यवहार तथा सिद्धान्त-कल्पनाओं को बदलने तथा विवेक सम्पन्न बनाने का आह्वान करते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि परोपकार का काम करो, धर्मान्तरण बन्द करो।

(हिन्दूः 28 फरवरी, 1916)

गाँधी जी 14 जुलाई 1927 को ʹयंग इंडियाʹ में लिखते हैं कि “मिशनरियों को अपना रवैया बदलना होगा। आज वे लोगों से कहते हैं कि उनके लिए ʹबाइबिलʹ और ईसाई धर्म को छोड़कर मुक्ति का और कोई मार्ग नहीं है। अन्य धर्मों को तुच्छ बताना तथा अपने धर्म को मोक्ष का एकमात्र मार्ग बताना उनकी आम रीति हो गयी है। इस दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन होना चाहिए।”

एक ईसाई मिशनरी से बातचीत में उन्होंने कहाः “अगर मेरे हाथ में सत्ता हो और मैं कानून बना सकूँ तो मैं धर्मांतरण का यह सारा कारोबार ही बन्द करा दूँ। इससे वर्ग-वर्ग के बीच निश्चय ही निरर्थक कलह और मिशनरियों के बीच बेकार का द्वेष बढ़ता है। यों किसी भी राष्ट के लोग सेवाभाव से आयें तो मैं स्वागत करूँगा। हिन्दू कुटुम्बों में मिशनरी के प्रवेश से वेशभूषा, रीति-रिवाज, भाषा और खान-पान तक में परिवर्तन हो गया है और इन सबका नतीजा यह हुआ है कि सुन्दर हरे-भरे कुटुम्ब छिन्न-भिन्न हो गये हैं।”

(हरिजनः 11 मई, 1935)

महात्मा गाँधी जैसे सहिष्णु एवं विवेकी व्यक्ति भी स्वतंत्र भारत में कानून बनाकर ईसाई धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध का प्रस्ताव करते हैं और निःसंकोच अपना संकल्प ईसाइयों के सम्मुख करते हैं।

गाँधी जी के उत्तराधिकारियों जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि ने उनके विचारों की उपेक्षा की और उसका दुःखद परिणाम आज सामने है। देश के कुछ प्रदेशों में ईसाईकरण ने सुरक्षा और एकता के लिए समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं और अब वे पंजाब, हिमाचल प्रदेश आदि नये स्थानों पर भी गिरिजाघर बनाने जा रहे है। विदेशी धन का प्रवाह पहले से कई गुना बढ़ गया है और ईसाई मिशनरियाँ आक्रामक बनती जा रही हैं।

गाँधी जी ने अपने विवेक, दूरदृष्टि तथा मानव-प्रेम के कारण ईसाइयों के उद्देश्यों को पहचाना था तथा उनके बीच जाकर उन्हें अधार्मिक तथा अमानवीय कार्य करने से रोकने का भी प्रयत्न किया था। उनके इस राष्ट्रीय कार्य को अब हमें क्रियान्वित करना है। ईसाई मिशनरियों को धर्मान्तरण से रोकना होगा। हमारी सरकार को इसे गम्भीरता से लेना चाहिए, अन्यथा गाँधी जी के अनुसार संघर्ष और रक्तपात को रोकना असम्भव हो सकता है।

गाँधी जी की कामना थी कि आदिवासियों (भील जाति) के मंदिर में राम की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठ हो, ईसा मसीह की नहीं, क्योंकि इससे ही इन जातियों में नये प्राणों का संचार होगा।

(नवजीवनः 18 अप्रैल, 1936)

राष्ट्र के मानवमंदिर में भी स्वदेशी ईश्वर की प्राणप्रतिष्ठा से ही कल्याण हो सकता है और यह ʹहरा-भरा देशʹ छिन्न-भिन्न होने से बचाया जा सकता है।

विशेष सूचनाः कोई भी इस लेख के परचे छपवाकर देश को तोड़ने वालों से भारत देश की रक्षा कर सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या 19-21, अंक 90

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निःस्वार्थ सेवा


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

सृष्टि की उत्पत्ति के विषय में हमारे शास्त्र कहते हैं कि जब भगवान नारायण के नाभिकमल से ब्रह्माजी का प्रागट्य हुआ तब ब्रह्माजी दिग्मूढ़ की स्थिति में पड़ गये। वे समझ नहीं पा रहे थे किः ʹमेरा प्रादुर्भाव क्यों हुआ ? मुझे क्या करना है ?ʹ तभी आकाशवाणी हुईः तप कर…. तप… तप कर…

तत्पश्चात ब्रह्माजी समाधि में स्थित हुए। उससे सामर्थ्य प्राप्त करके उन्होंने अपने संकल्प से इस सृष्टि की रचना की। अर्थात् हमारी सृष्टि की उत्पत्ति तप से हुई है। इसका मूल स्थान तप है।

हमारे सत्शास्त्रों में अनेक प्रकार के तप बताये गये हैं। उनमें से एक महत्त्वपूर्ण तप है निष्काम कर्म, सेवा, परोपकार। इसी तप को भगवान श्री कृष्ण ने गीता में ʹकर्मयोगʹ कहा तथा ज्ञान, भक्ति और योग की भाँति इस साधना को भी भगवत्प्राप्ति, मोक्षप्राप्ति में समर्थ बताया।

व्यक्ति अपने तथा अपने परिवार के प्रति तो उदार रहता है परन्तु दूसरों की उपेक्षा करता है। वह स्वयं को दूसरों से भिन्न मानता है। इसी का नाम अज्ञान, माया है। जन्म-मरण का, शोक-कष्ट का, उत्पीड़न व भ्रष्टाचार आदि पापों का यही मूल कारण है। भेदभाव और द्वेष ही मृत्यु है तथा अभेद, अनेकता में एकता, सबमें एक को देखना, सबकी उन्नति चाहना ही जीवन है।

समस्त बुराइयों का मूल है स्वार्थ और स्वार्थ अज्ञान से पैदा होता है। स्वार्थी मनुष्य जीवन की वास्तविक उन्नति एवं ईश्वरीय शांति से बहुत दूर होता है। न तो उसमें श्रेष्ठ समझ होती है और न ही उत्तम चरित्र। वह धन और प्रतिष्ठा पाने की ही योजनाएँ बनाया करता है।

मनुष्य के वास्तविक कल्याण में स्वार्थ बहुत बड़ी बाधा है। इस बाधा को निःस्वार्थ सेवा एवं सत्संग के द्वारा निर्मूल किया जाता है। स्वार्थ में यह दुर्गुण है कि वह मन को संकीर्ण तथा हृदय में ʹमैं और मेरेʹ की लघुग्रंथि होती है तब तक सर्वव्यापक सत्ता की असीम सुख-शांति नहीं मिलती और हम अदभुत पवित्र प्रेरणा प्राप्त नहीं कर पाते। इसके लिए हृदय का व्यापक होना आवश्यक है। इसमें निःस्वार्थ सेवा एक अत्यन्त उपयोगी साधन है।

निष्काम कर्म जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने की पहली सीढ़ी है। इसके अभ्यास से चित्त की शुद्धि होती है तथा भेदभाव मिटता है। सबमें ईश्वर की भावना दृढ़ होते ही ʹअहंʹ की लघुग्रन्थि टूट जाती है और सर्वत्र व्याप्त ईश्वरीय सत्ता से जीव का एकत्व हो जाता है। भगवद् भाव से सबकी सेवा करना यह एक बहुत बड़ा तप है।

ʹईशावास्योपनिषद्ʹ में आता हैः

ईशावास्यमिदंसर्वं यत् किं च जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुंजीथाः मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।।

ʹअखिल ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी जड़-चेतनरूप जगत है वह ईश्वर से व्याप्त है। उस ईश्वर को साथ रखते हुए इसे त्यागपूर्वक भोगो। किसी भी धन अथवा भोग्य पदार्थ में आसक्त मत होओ।ʹ

यहाँ पर ʹत्यागʹ पहले है और ʹभोगʹ बाद में। यदि व्यक्ति अपने परिवार में ही आसक्त रहे तो वह विश्वप्रेम विकसित नहीं कर सकेगा, विश्वभ्रातृत्व नहीं पनपा सकेगा। सभी के बच्चे अपने बच्चों के समान नहीं लगेंगे। व्यक्ति का प्रेम, जो व्यापक ईश्वर सत्ता को अपने हृदय में प्रगट कर सकता है वह प्रेम नश्वर परिवार के मोह में ही फँसकर रह जायेगा।

परमार्थ को साधने के लिए, कलह, अशांति तथा सामाजिक दोषों को निर्मूल करने के लिए विश्वप्रेम को विकसित करना होगा। संकुचितता को छोड़कर हृदय को फैलाना होगा। सुषुप्त शक्तियों को प्रगट करने का यही सबसे सरल उपाय है।

जिसका प्रेम विश्वव्यापी हो गया है उसके लिए सभी समान हैं। समस्त ब्रह्माण्ड उसका घर होता है। उसके पास जो कुछ है, सबके साथ बाँटकर उसका उपयोग करता है। दूसरों के हित के लिए अपना हित त्याग देता है। कितना भव्य व्यक्तित्व है उस महामानव का ! वह तो धरती पर साक्षात् भगवान है।

सरिताएँ सबको ताजा जल दे रही हैं। वृक्ष छाया, फल तथा प्राणवायु दे रहे हैं। सूर्य प्रकाश, ऊर्जा एवं जीवनीशक्ति प्रदान करता है।  पृथ्वी सभी को शरण तथा धन-धान्य देती है। पुष्प सुगंध देते हैं। गायें पौष्टिक दूध देती हैं। प्रकृति के मूल में त्याग की भावना निहित है।

निःस्वार्थ सेवा के द्वारा अद्वैत की भावना पैदा होती है। दुःखियों के प्रति शाब्दिक सहानुभूति दिखाने वालों से तो दुनिया भरी पड़ी है परन्तु जो दुःखी को अपने हिस्से में से दे दे ऐसे कोमलहृदय लोग विरल ही होते हैं।

निःस्वार्थ सेवा चित्त के दोषों को दूर करती है, विश्वचैतन्य के साथ एकरूपता की ओर ले जाती है। जिसका चित्त शुद्ध नहीं है, वह भले ही शास्त्रों में पारंगत हो, वेदान्त का विद्वान हो, उसे वेदान्तिक शांति नहीं मिल सकती।

सेवा का हेतु क्या है ? चित्त की शुद्धि… अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या, घृणा आदि कुभावों की निवृत्ति…. भेदभाव की समाप्ति। इससे जीवन का दृष्टिकोण एवं कर्मक्षेत्र विशाल होगा, हृदय उदार होगा, सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होंगी, विश्वात्मा के प्रति एकता के आनंद की झलकें मिलने लगेंगीं। ʹसबमें एक और एक में सब…ʹ की अऩुभूति होगी। इसी भावना के विकास से राष्ट्रों में एकता आ सकती है, समाजों को जोड़ा जा सकता है, भ्रष्टाचा की विशाल दीवार को गिराया जा सकता है, हृदय की विशालता द्वारा वैश्विक एकता को स्थापित किया जा सकता है तथा अखूट आनंद के असीम राज्य में प्रवेश पाकर मनुष्य जन्म सार्थक किया जा सकता है

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या  13,14 अंक 90

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ध्यान का रहस्य


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

ध्यान माने क्या ? हमारा मन नेत्रों के द्वारा जगत में जाता है, सबको निहारता  है तब जाग्रतावस्था होती है, ʹहिताʹ नाम की नाड़ी में निहारता है तब स्वप्नावस्था होती है और जब हृदय में विश्रांति करता है तब सुषुप्तावस्था होती है। ध्यानावस्था न जाग्रतावस्था है, न स्वप्नावस्था है और सुषुप्तावस्था है वरन् ध्यान चित्त की सूक्ष्म वृत्ति का नाम है। सूक्ष्म वृत्ति हो जाने पर शरीर से ʹमैं पनाʹ हट जाता है।

इसका मतलब यह नहीं कि जब ध्यान करते हो तब जड़ हो जाते हो या तुमको कुछ पता नहीं चलता। तुम नाचते हो, गाते हो, रोते हो… उसका ऊपर-ऊपर से पता नहीं चलता है लेकिन अंदर से सब पता चलता है। तुम्हारी ताल से विपरीत कोई ताल देता है तो ध्यान का ताल टूट भी जाता है। ध्यान करने वाला ध्यानावस्था में जड़ नहीं होता है, बेवकूफ नहीं रहता है वरन् उसकी चित्त की वृत्ति सूक्ष्म और आनंद-प्रेमप्रधान हो जाती है। वही वृत्ति जब जाग्रत में आ जाती है तो जाग्रत के व्यवहार में भी ठीक से सँभलकर रहती है।

परमात्म-ध्यान से अंतरात्मा की शक्ति जागृत होती है एवं स्मृतिशक्ति बढ़ती है। ध्यान करने से दुर्गुण दूर होते हैं एवं सदगुण बढ़ते हैं। ध्यान करने से पाप नष्ट होते हैं, निर्भयता बढ़ने लगती है, परमात्मा का सुख उभरता है, परमात्मा का ज्ञान निखरता है। ध्यान करने से परमात्मा का आनन्द आता है और ध्यान दृढ़ होने से  परमात्मा स्वयं प्रगट हो जाते हैं।

चंचल-दुर्बल रहने से भगवान नहीं मिलते, न ही बड़े छोटे होने से भगवान मिलते है। चिंता करने से भी भगवान नहीं मिलते, न ही ʹहा-हा…ही-ही….ʹ करने से भगवान मिलते हैं। भगवान तो मिलते हैं जप-ध्यान से, भक्ति-ज्ञान से।

हम जैसे रोज-रोज खाते हैं, रोज-रोज सोते उठते हैं, रोज-रोज जगत का व्यवहार करते हैं वैसे ही रोज-रोज परमात्मा का ध्यान भी करना चाहिए। रोज-रोज परमात्मा का जप सुमिरन करना चाहिए। रोज-रोज सत्संग-स्वाध्याय करना चाहिए एवं अपने आपको अंतर्मुख करने का यत्न करना चाहिए।

कई लोग ध्यान के समय आँखें खोलकर इधर-उधर देखते रहते हैं, वे उस समय चूक जाते हैं। आँखें खोलकर इधर-उधर निहारने से वृत्ति बहिर्मुख रहती है।

जिसकी वृत्ति अंतर्मुख हो गयी है उसको जप से क्या लेना-देना ? जिसकी वृत्ति शांत हो गयी है, उसको स्वाध्याय के लिए भी वृत्ति को बाहर लाने की जरूरत नहीं है। स्वाध्याय और जप, वृत्ति को अंतर्मुख करने के लिए हैं। कीर्तन भी वृत्ति को अंतर्मुख करने के लिए  है।

जब स्वरूप में निष्ठा हो जाये तो फिर खुली आँख भी समाधि है। जब तक स्वरूप में निष्ठा नहीं हुई, तब तक इष्ट में, भाव में, प्रेम में निष्ठा करके अंतर्मुख होना चाहिए। इष्ट में, भाव में, प्रेम में निष्ठा करके अंतर्मुख हुआ जाता है तो अंतर्मुखता में जो आनंद आता है, वही आत्मा का आनंद है।

ऐसा नहीं है कि भगवान बाद में मिलेंगे। जब-जब मन अंतर्मुख हो जाता है तब-तब आत्मा में लीन हो जाता है, आनंद आता है। जब आनंद आये तो समझो आत्मा के नजदीक हो किन्तु मनोराज हो गया, निद्रा आने लगे तब चित्त को सावधान करना चाहिए। मनोराज, निद्रा या तंद्रा में चित्त न जाये इसके लिए स्वाध्याय, जप, कीर्तन करो एवं आत्मारामी सच्चे महापुरुषों के सान्निध्य में बैठकर ध्यान करो।

चित्त को अंतर्मुख करने के लिए निष्ठा की जरूरत है। छोटे-मोटे विघ्न तो आयेंगे-जायेंगे। फिर चाहे हिमालय की गुफा में जाकर ही क्यों न बैठो ? जीव-जन्तु, पशु आदि तो वहाँ भी तंग करेंगे ही, किन्तु उनकी वजह से हलचल करोगे तो फिर चित्त को शांत कब करोगे ? अतः एकनिष्ठ होकर बैठना चाहिए और एकनिष्ठ भी बोझ बनकर नहीं कि ʹमैं शांत बैठा हूँ।ʹ

कोई आया तो क्या ? कोई गया तो क्या ? किसको कब  तक निहारते रहोगे ? ….और बाहर जो दिखेगा उसका अर्थ तुम अपनी समझ के अनुसार लगाओगे। सही देखना है, सच्चा देखना है तो एकनिष्ठ होकर अंतर्मुख होना चाहिए।

हम जितने अंतर्मुख होते हैं उतनी शक्ति बढ़ती है। जितने संकल्प कम होते हैं उतना सामर्थ्य बढ़ता है। जैसे, जितने बादल हट जाते हैं उतना सूर्य का प्रभाव दिखता है। जितने बादल अधिक आ जाते हैं उतन सूर्य का प्रभाव कम हो जाता है। ऐसे ही आत्मसूर्य है। जितने स्पंदन ज्यादा हैं बादलों की नाईं, उतना आत्मसूर्य का प्रभाव कम दिखता है और जितने संकल्प कम होते हैं उतना प्रभाव ज्यादा दिखता है। वास्तव में आत्मा का तेज घटता बढ़ता नहीं है लेकिन संकल्पों के कारण घटता हुआ लगता है। अतः एकनिष्ठ होकर ध्यानस्थ होना चाहिए।

चाहे भक्ति हो, योग हो या ज्ञान हो, आपकी निष्ठा आपके काम आयेगी। यदि निष्ठा नहीं होगी तो भक्त की भक्ति अधूरी रह जायेगी, योगी का योग अधूरा एवं ज्ञानी का ज्ञान अधूरा रह जायेगा। एकनिष्ठा…. जैसे पतिव्रता स्त्री की पति में निष्ठा होती है वैसे ही साधक की अपने साधन में निष्ठा होनी चाहिए, नहीं तो संसार की माया ऐसी है कि फँसा देती है। भगवान से भी बढ़कर भगवत्प्रीति के साधन में आदरबुद्धि होनी चाहिए। आदरबुद्धि के अभाव में ही साधन में रुचि नहीं होती।

चातक मीन पतंग जब, पिय बिन नहीं रह पाय।

साध्य को पाये बिना, साधक क्यों रह जाय ?

ध्यान का आस्वादन भी वही ले सकता है जिसकी निष्ठा दृढ़ हो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या 5,6 अंक 90

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