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अहंकार का स्वरूप


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग प्रवचन से

ʹश्री योगवाशिष्ठ महारामायणʹ मैं आता हैः ʹसंसार में जितने भी दुःख हैं वे सब अहंकार के कारण ही उत्पन्न होते हैं। अहंकार के कारण ही जीव का जन्म-मरण होता है और अहंकार के कारण ही राग-द्वेष होता है। अहंकार के त्याग से सब दुःखों का त्याग हो जाता है एवं जीव को परम पद की प्राप्ति होती है। अतः अहंकार का त्याग करना चाहिए।

वशिष्ठजी महाराज के ऐसा कहने पर रामजी ने पूछाः “यदि अहंकार का त्याग कर देंगे तो खायेंगे और पियेंगे कैसे ? मनुष्य में ʹमैं हूँʹ का भाव है तभी तो उसमें कर्तव्य पालन की आकांक्षा होती है, जीवन में कुछ माँग होती है, कुछ भूतकाल की चिंता होती है और भविष्यकाल के लिए चिंतन होता है। यदि यह अहंकार ही चला जाये त वह खायेगा-पियेगा और जियेगा कैसे ?”

वशिष्ठजी महाराज ने कहाः “हे राम जी ! अहंकार के तीन स्वरूप होते हैं- 1.क्षुद्र (स्थूल) अहं 2. मध्यम (सूक्ष्म अहं) 3. वास्तविक अहं।

क्षुद्र माने तुच्छ। स्थूल शरीर के साथ जुड़कर मनुष्य जो बोलता है उसे क्षुद्र अहं कहा जाता है। ʹमैं फलानि जाति का हूँ… मेरी इतनी उम्र है… मैं यह कर सकता हूँ….ʹ यह अहं जनसाधारण में, अल्प मति के लोगों में भी होता है एवं विद्वानों में भी होता है।

शरीर में है ही क्या ? कुछ सीधी हड्डियाँ, कुछ आड़ी हड्डियाँ, मांस, रक्त, वात, पित्त, कफ, मल-मूत्र, थूक आदि और ऊपर से चमड़े का आवरण…. फिर भी क्षुद्र अहं के साथ जुड़कर मनुष्य बोलता है कि ʹमैं मोटा हूँ…. मैं पतला हूँ… मैं काला हूँ…. मैं गोरा हूँ….. मैं ब्राह्मण हूँ… मै क्षत्रिय हूँ… मैं फलाने गाँव का हूँ… मैं फलाने देश का हूँ….ʹ इस शरीर के साथ जुड़कर बहने वाला जो स्फुरण है उसी को क्षुद्र अहं कहते हैं। अहं ही सर्व दुःखों की जड़ है।

कोई कितना ही बुद्धिमान हो, विद्वान हो, अपने को अक्लवाला समझता हो लेकिन शरीर के साथ जब तक अहं जुड़ा रहेगा तब तक संसार के भोगों की वासनाएँ बनी रहेंगी और वासना ही तो जीव के जन्म-मरण का कारण है।

क्षुद्र अहं के साथ जुड़ा हुआ जीव वासना के अनुसार ही काम करता है। उसका मन विषय-भोगों में ही भटकता रहता है। इस अहंकार ने त्रिलोकी को वासना के जाल में बाँध रखा है। क्षुद्र अहंकारवाला मनुष्य मंदिर में रहते हुए भी बंधन में रहते हुए भी बंधन में है और घर में रहते हुए भी बंधन में है। एक ऊँचे पद पर बैठा हुआ मनुष्य भी अपने को स्वतंत्र नहीं मान सकता।

यदि कोई स्वस्थ एवं धनवान मनुष्य कहे कि ʹमेरा कोई कर्त्तव्य नहीं है, मुझे नौकरी धंधे की कोई चिंता नहीं है क्योंकि बैंक में मेरा ʹफिक्स-डिपॉजिटʹ (स्थायी जमा-पूँजी) है। हर महीने ब्याज आता है। मैं आराम से खाता पीता हूँ। मैं बड़ा सुखी हूँ।ʹ

….लेकिन उस व्यक्ति की गहराई में देखोगे तो वह भी अंदर से सुखी नहीं मिलेगा। ʹमैं सुखी हूँ….ʹ वह इस शरीररूपी ढाँचे को लेकर बोलता है। उस ढाँचे को अगर जरा सी ग्रमी लगे या जरा सा मच्छर काट ले तो वह दुःखी हो जायेगा क्योंकि क्षुद्र अहं में बैठा है बेचारा।

इस क्षुद्र अहं ने सारे विश्व को ढाँक रखा है। कोई-कोई विरला होता है जो इस क्षुद्र अहं से हटकर मध्यम अहं में आता है। मध्यम अहं अर्थात् सूक्ष्म अहं। जप-तप, सुमिरन, पूजा-अर्चना, सत्संग, सेवा आदि करने से समझ में आ जाता है कि ʹजीवात्मा अमर है और शरीर नश्वर। यह शरीर पहले नहीं था, बाद में भी नहीं रहेगा और अभी भी नहीं की ओर जा रहा है। मौत शरीर की होगी। मरने के बाद हम भगवान के पास जायेंगे।

मध्यम अहं वाले को यह पक्का हो जाता है कि शरीर यहीं पड़ा रहेगा। शरीर भगवान के पास नहीं जायेगा लेकिन सूक्ष्म शरीर में अहं होता है कि हम भगवान के पास जायेंगे। सूक्ष्म शरीर में अहं होने से भोग की वासना शांत होती है लेकिन विचारों में अपनी बात मनाने की वासना बनी रहती है।

स्थूल शरीर में अहं होने से मनुष्य संसार की भोग वासना में जकड़ा रहता है और सूक्ष्म शरीर में अहं होने से लोक-लोकांतर की इच्छा में उलझा रहता है। ʹअपना प्रिय भगवान अभी नहीं मिला, इसलिए मरने के बाद किसी लोक-लोकान्तर में मिलेगा…..ʹ सूक्ष्म अहंवाले का ऐसा भाव होता है। क्षुद्र अहंवाले से सूक्ष्म अहं वाला अच्छा है क्योंकि क्षुद्र(स्थूल) अहंवाला भगवान की प्राप्ति के लिए जप-तप-यज्ञादि करने में लग जाता है। उसको कम  परिश्रम करने पर भी ज्यादा सुख मिलता है।

सूक्ष्म अहं में जीने वाला व्यक्ति क्रियाजन्य सुख से ऊपर उठता है एवं भावजन्य सुख से सुखी होने लगता है। क्रियाजन्य सुख में परिश्रम ज्यादा होता है और सुख कम मिलता है। भावजन्य सुख में परिश्रम कम होता है और सुख ज्यादा मिलता है, भावना का सुख मिलता है।

भावना का सुख भारत के ऋषि-मुनियों की देन है। भगवद् भक्ति से भाव को विकसित करके, ईश्वर और गुरु की शरण लेने से स्थूल अहं लीन होता है। वेदान्त का श्रवण करके उसका मनन एवं निदिध्यासन करने से सूक्ष्म अहं  बाधित हो जाता है एवं इन दोनों को सत्ता देने वाला जो वास्तविक अहं है, वह प्रकट हो जाता है। उसी को कहा जाता है – अहं ब्रह्मास्मि। वही जीव का वास्तविक स्वरूप है। उस वास्तविक स्वरूप को पाये हुए किन्हीं महापुरुष ने ही कहा हैः

जन्म-मृत्यु मेरे धर्म नहीं हैं।

पाप-पुण्य कुछ कर्म नहीं हैं।।

अज निर्लेपीरूप, कोई कोई जाने रे…..

वह चैतन्य परमात्मा अजर-अमर है, निर्लेप है और सबका वास्तविक स्वरूप है। ऐसे उस वास्तविक स्वरूप को कोई विरला ही जानता है।

ʹमैं फलाना भाई हूँ….ʹ यह स्थूल अहं है। ʹमैं भगवान का भक्त हूँ….ʹ यह सूक्ष्म अहं है। जहाँ से वास्तविक अहं का, शुद्ध अहं का जब तक बोध नहीं होता तब तक जीव बेचारा परिस्थितिजन्य सुख-दुःख, क्रियाजन्य सुख-दुःख एवं भावजन्य सुख-दुःख में धक्के खाता रहता है।

जब तक स्थूल और सूक्ष्म अहं में जीवन होगा तब तक चाहे किचना भी ऊँचा जीवन होगा, उसमें शुद्ध सुख का पता नहीं चलेगा। निर्धनों के आगे धनवान अपने को सुखी मानता है, निर्बलों के आगे बलवान् अपने को सुखी मानता है, अल्प मतिवालों के आगे विद्वान अपने को सुखी मानता है लेकिन इस स्थूल और सूक्ष्म अहं का सुख वास्तविक सुख नहीं है। ऐसे कई सुख आते हैं और चले जाते हैं। ʹजब मौत आकर सामने खड़ी होती है तब स्थूल और सूक्ष्म अहं से जुड़कर जो भी किया, वह सब छोड़कर जाना पड़ता है….ʹ यह सोचकर मनुष्य बेचारा दुःखी हो जाता है क्योंकि उसने अभी तक अपने वास्तविक ʹमैंʹ को नहीं जाना है।

जब तक वास्तविक ʹमैंʹ का पता नहीं चलता तब तक चाहे दुनिया की नजर में बड़ा प्रसिद्ध व्यक्ति हो, बड़ा सुंदर व्यक्ति हो, बड़ा दाता हो, बड़ा बुद्धिमान हो लेकिन तत्त्वज्ञान की दुनिया में वह मूढ़ ही है। जिसने उस वास्तविक ʹमैंʹ को जान लिया वह दुनिया की तो क्या, देवताओं-यक्षों-गंधर्वों की ही नहीं अपितु ब्रह्मा-विष्णु-महेश की नजरों में भी आदरणीय हो जाता है।

वास्तविक ʹमैंʹ में जागने के लिए जब तक ब्रह्मवेत्ता सदगुरु की छत्रछाया नहीं मिलती, तब तक अनेक प्रकार की साधनाएँ करनी पड़ती हैं। जब ब्रह्मवेत्ता सदगुरु मिल जाते हैं और उऩके बताये हुए मार्ग पर साधक चल पड़ता है, उनके निर्देशानुसार ब्रह्मचिंतन एवं ब्रह्मज्ञान के अभ्यास में लग जाता है तो उसकी सारी साधनाएँ पूरी हो जाती हैं। फिर उसे अलग से किसी साधना की जरूरत नहीं पड़ती है। साधक अपने लाखों जन्मों के संस्कार एक ही जन्म में मिटा सकता है। अगर मनुष्य जन्म पाकर भी वह सावधान न हो  लाखों जन्म लेने के संस्कार भर भी सकता है।

यदि जीवन में सावधानी नहीं है तो जिससे सुख मिलेगा उसके प्रति राग हो जायेगा और जिससे दुःख मिलेगा उसके प्रति द्वेष हो जायेगा। इससे अनजाने ही चित्त में संस्कार जमा होते जायेंगे एवं वे ही संस्कार जन्म-मरण का कारण बन जायेंगे। वैर लेने के लिए किसी का शत्रु होकर एवं प्रेम (राग) के कारण किसी का पुत्र, मित्र, भाई आदि बनकर जन्म लेना पड़ेगा। जब तक वास्तविक ʹमैंʹ का ज्ञान नहीं होगा तब तक यह क्रम चलता ही रहेगा। वास्तविक ʹमैंʹ का ज्ञान होने पर राग-द्वेष बाधित हो जाते हैं और जन्म-मरण का चक्र सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

जितना-जितना मनुष्य स्थूल अहं को छोड़कर सूक्ष्म अहं में जाता है उतनी-उतनी उसकी गुरु या भगवान को समझने की शक्ति बढ़ती है। ब्रह्मवेत्ता गुरु द्वारा बताये गये निर्देशों का सच्चाई एवं तत्परता से पालन करने पर वह सूक्ष्म अहं को त्यागकर वास्तविक ʹअहंʹ को जानने में भी सक्षम हो जाता है।

आपका वास्तविक ʹमैंʹ ही आपकी असलियत है। उस वास्तविक ʹमैंʹ में अगर आप जग गये तो आपका बेड़ा पार हो जायेगा। फिर तो आपकी मीठी नजर जिन पर पड़ेगी वे भी निहाल हो जायेंगे। आपके दीदार करने वालों को भी बहुत लाभ होगा, आप ऐसे महान हो जाओगे !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या 3-5 अंक 90

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पुदीना


चटनी के रूप में प्रयुक्त किया जाने वाला पुदीना एक सुगंधित एवं उपयोगी औषधि है।

आयुर्वेद के मतानुसार पुदीना स्वादिष्ट, रुचिकर, पचने में हल्का, तीक्ष्ण, तीखा, कड़वा, पाचनकर्त्ता, उल्टी मिटाने वाला, हृदय को उत्तेजित करने वाला, विकृत कफ को बाहर लाने वाला, गर्भाशय-संकोचक, चित्त को प्रसन्न करने वाला, जख्मों को भरने वाला, कृमि, ज्वर, विष, अरुचि, मंदाग्नि, अफारा, दस्त, खाँसी, श्वास, निम्न रक्तचाप, मूत्राल्पता, त्वचा के दोष, हैजा, अजीर्ण, सर्दी-जुकाम आदि को मिटाने वाला है।

पुदीने में विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। उसमें रोगप्रतिकारक शक्ति उत्पन्न करने की अदभुत शक्ति है एवं पाचक रसों को उत्पन्न करने की भी क्षमता है। अजवायन के सभी गुण पुदीने में पाये जाते हैं।

पुदीने के बीज से निकलने वाला तेल स्थानिक एनेस्थेटिक, पीड़ानाशक एवं जंतुनाशक होता है। यह दंतपीड़ा एवं दंतकृमिनाशक होता है। इसके तेल की सुगन्ध से मच्छर भाग जाते हैं।

विशेषः पुदीने का ताजा रस लेने की मात्रा है 5 से 20 ग्राम। पत्तों का चूर्ण लेने की मात्रा 3 से 6 ग्राम। काढ़ा लेने की मात्रा 20 से 40 ग्राम। अर्क लेने की मात्रा 20 से 40 ग्राम। बीज का तेल लेने की मात्रा आधी बूँद से 3 बूँद।

औषधि प्रयोगः

मलेरियाः पुदीने एवं तुलसी के पत्तों का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम लेने से अथवा पुदीना एवं अदरक का रस 1-1 चम्मच सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।

वायु एवं कृमिः पुदीने के 2 चम्मच रस में एक चुटकी काला नमक डालकर पीने से गैस, वायु एवं पेट के कृमि नष्ट होते हैं।

पुराना सर्दी-जुकाम एवं न्यूमोनियाः

पुदीने के रस की दो-तीन बूँदें नाक में डालने एवं पुदीने तथा अदरक के 1-1 चम्मच रस में शहद मिलाकर दिन में दो बार पीने से लाभ होता है।

अनार्तव-अल्पार्तवः

मासिक धर्म न आने पर या कम आने पर अथवा वायु एवं कफदोष के कारण बंद हो जाने पर पुदीने के काढ़े में गुड़ एवं चुटकी भर हींग डालकर पीने से लाभ होता है। इससे कमर की पीड़ा में भी आराम होता है।

आँत का दर्दः

अपच, अजीर्ण, अरूचि, मंदाग्नि, वायु आदि रोगों में पुदीने के रस में शहद डालकर लें अथवा पुदीने का अर्क लें।

दादः

पुदीने के रस में नींबू मिलाकर लगाने से दाद मिट जाती है।

उल्टी, दस्त, हैजाः

पुदीने के रस में नींबू का रस, प्याज अथवा अदरक का रस एवं शहद मिलाकर पिलाने अथवा अर्क देने से ठीक होता है।

बिच्छू का दंशः

पुदीने का रस दंशवाले स्थान पर लगायें एवं उसके रस में मिश्री मिलाकर पिलायें। यह प्रयोग तमाम जहरीले जंतुओं के दंश के उपचार में काम आ सकता है।

हिस्टीरियाः

रोज पुदीने का रस निकालकर उसे थोड़ा गर्म करके सुबह शाम नियमित रूप से देने पर लाभ होता है।

मुख-दुर्गन्धः

पुदीने के रस में पानी मिलाकर अथवा पुदीने के काढ़े का घूँट मुँह में भरकर रखें, फिर उगल दें। इससे मुख-दुर्गन्ध का नाश होता है।

साँईं श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द,

संत श्री आसारामजी आश्रम, जहाँगीरपुरा,

वरिवाय रोड, सूरत।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2000, पृष्ठ संख्या 28,29 अंक 89

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जीवन्मुक्त के लक्षण


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

जीते जी जिन्हें अपने वास्तविक स्वरूप का निश्चय हो गया है, जिन्होंने अपने साक्षीस्वरूप का अनुभव कर लिया है एवं ʹइस ब्रह्माण्ड तथा अनंत ब्रह्माण्डों में मेरे सिवा दूसरा कोई तत्त्व नहीं है….ʹ ऐसा जिन्हें बोध हो गया है, वे जीवन्मुक्त हैं। ऐसे महापुरुष समस्त व्यवहार करते हुए भी व्यवहार या कर्म से नहीं बँधते क्योंकि वे देहभाव या मनभाव से कुछ नहीं करते।

वे अहंकार को, जो कि सब दुःखों का मूल कारण है, देह से लेकर अंतःकरण में कहीं भी नहीं रखते। वे सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि द्वन्द्वों से परे होते हैं। वे सुख-दुःख को सच्चा नहीं मानते। जब वे अनुभव करते हैं कि ʹमेरा जन्म ही नहींʹ तो मृत्यु को वे सत्य कैसे मानते हैं ?ट

जब तक अंतःकरण है तब तक साक्षीभाव का कथन किया जा सकता है किन्तु जहाँ अंतःकरण के भी अभाव का अनुभव होता हो तब साक्षी भी कैसे कह सकते हैं ? साक्षीभाव की संज्ञा भी मुमुक्षु को समझाने के लिए है।

भगवान श्रीकृष्ण गीता में अलग-अलग प्रसंगों पर देह, मन, आत्मा को स्वयं के रूप में कहते हैं किन्तु श्रीकृष्ण परमात्मा का वास्तविक स्वरूप तो आत्मा है, साक्षी है। भक्त प्रथम देहभाव से श्रीकृष्ण परमात्मा की उपासना करता है, फिर धीरे-धीरे आत्मभाव से उपासना करता है और अंत में ʹवह आत्मा अन्य कोई नहीं वरन् स्वयं ही हूँ….ʹ ऐसे अभेद भाव से उपासना रता है। अंत में वह भेद-अभेद को भी मिटा देता है। ʹमुझमें कोई भाव ही नहीं, मुझमें द्वैतपना भी नहीं है और एकपना भी नहीं है…ʹ यह परम अवस्था है। इस स्थिति को ʹजीवन्मुक्ति की स्थितिʹ अथवा ʹब्राह्मी स्थितिʹ कहते हैं।

जब सभी मनुष्य तुमको अच्छा करने लगें तब समझना कि मुसीबत आ खड़ी हुई है। बनावटी संतों की इसी प्रकार प्रशंसा उनके ही अनुयायियों ने की थी। सभी हमें अच्छा बोलें ऐसी इच्छा न करें क्योंकि अपना वास्तविक स्वरूप जो कि मन-वाणी से परे है उसकी प्रशंसा कोई नहीं करता अपितु शरीर, मन आदि की ही लोग प्रशंसा करते हैं और ऐसी प्रशंसा हमें नीचे ले जाती है।

अध्यात्म-पथ पर चलने वालों के लिए ऐसी प्रशंसा, लोगों की बातचीत एवं अनेक प्रकार की सिद्धियों के पीछे पड़ना यह सब विघ्नरूप है, उनकी उन्नति को रोकने वाला है क्योंकि जहाँ आत्मा के सिवाय कुछ नहीं है, जहाँ शरीर को भी भूलने की बात है वहाँ यह सब अवनति की ओर ले जाने वाला है। अतः जीवन्मुक्त महापुरुष उस ओर दृष्टिपात ही नहीं करते। जीवन्मुक्त अवस्था में इस जगत को देखने पर भी, शरीर को देखने पर भी पूरा साक्षीभाव बना रहता है।

जीवन्मुक्त की पहचान इस प्रकार होती हैः उनका मन मानों ब्रह्म का ध्यान करता है, वचन मानों स्तुति करते हैं, चरण मानों ब्रह्म की प्रदक्षिणा करते हैं ऐसा लगता है। षडरिपु उनके षडमित्र बनकर रहते हैं। क्रोध क्षमा का रूप लेता है। अभिमान सम्मान का रूप लेता है। कपट सरलता का रूप लेता है। लोभ संतोष का रूप लेता है। मोह प्रेम का रूप लेता है। काम पूर्णकाम अर्थात् वासनारहित हो जाता है।

कई तत्त्वज्ञ महापुरुष कहते हैं कि मन एवं वाणी आत्मा तक नहीं  पहुँच सकते। यह सच है लेकिन मनरूपी महासागर में उठते विचाररूपी तरंगों को आत्मा जानती एवं देखती है। इसी प्रकार वाणी एवं वाणी से उत्पन्न वचनरूपी तरंगों की भी आत्मा साक्षी है।

जैसे मनुष्यादि शरीर का जीवन अन्न है, वैसे ही मनुष्य का मनुष्यत्व उसके सदाचार में निहित है। इसी प्रकार जीव का जीवन तत्त्वज्ञान है, वही उसका आहार है। परन्तु आत्मा का जीवन तो ब्रह्म का साक्षात्कार है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2000, पृष्ठ संख्या 20, अंक 89

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