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चित्त की विश्रान्तिः प्रसाद की जननी


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

हर एक मनुष्य आनंद चाहता है, हर एक मनुष्य सुख चाहता है, हर एक मनुष्य मुक्ति चाहता है। कोई भी बंधन नहीं चाहता है।

मानवजात का एक समूह है। उसमें चार प्रकार के मनुष्य हैं। सब मनुष्य आनंद चाहते हैं, हृदय की शांति और शीतलता चाहते हैं। कोई ऐसा नहीं चाहता कि मेरा हृदय अशांत हो… मैं पापी होऊँ… मैं सुख से दूर चला जाऊँ। सब सुख की तरफ ही भाग रहे हैं। कई लोग सुख की तरफ इस तरह भागते हैं कि वहाँ सुख मिलता नहीं, दुःख ही दुःख मिलता है, मुसीबत ही मुसीबत मिलती है।

जैसे ऊँची गरदन होने से ऊँट अच्छा घास छोड़कर कँटीले वृक्षों के पत्तों को खाता है। काँटे मुँह में लगने से खून निकलता। ऊँट समझता है कि कितना मजेदार है ! उसे यह पता ही नहीं यह मजा अपने लिए सजा है।

ऐसे ही हम सुख चाहते हैं, हृदय की तृप्ति चाहते हैं लेकिन विषय-विकारों का कँटीला सुख चाहते हैं। शुरूआत में तो अच्छा लगता है किन्तु बाद में ऊँट जैसा हाल होता है। विषयों का सुख दाद की खुजली जैसा सुख है। उसे खुजलाते हैं तो मजा आता है लेकिन बाद में सत्यानाश कर देता है।

कुछ लोग जल्दी सुख लेने जाते हैं। जहाँ सुख है उस अंतरात्मा की तरफ नहीं जाते बल्कि सुख के बहाने सुख से दूर चले जाते हैं। परिणाम का विचार नहीं करते। ऐसा बोलने से, ऐसा करने से, ऐसा भोगने से क्या परिणाम आयेगा यह नहीं सोचते। उनको पामर कहते हैं।

दूसरे प्रकार के लोग होते हैं विषयी। कथा में जायेंगे, सत्संग सुनेंगे तो कहेंगे कि ʹमहाराजजी की बात तो ठीक है, ज्ञान तो अच्छा है लेकिन क्या करें यार ! संसार में रहते हैं…. जरा इतना कर लें फिर देखा जायेगा।ʹ इनको विषयी कहते हैं।

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो ज्ञान की बात सुनते हैं तो थोड़ा उधर चलते भी हैं। जो उत्तम जिज्ञासु हैं, बुद्धिमान हैं, वे तो बस, गलती को समझकर विषय-विकारों से अपने को बचाकर सच्चे सुख की तरफ चल पड़ते हैं। थोड़े ही दिनों में उनको भगवदसुख की प्राप्ति हो जाती है। वे अपने घर में आ जाते हैं। अपना घर क्या है ? चित्त की विश्रान्ति प्रसाद की जननी है। चित्त की विश्रान्ति प्रभुरस को प्रकट करने वाली कुँजी है। चित्त की विश्रान्ति से सामर्थ्य प्रकट होता है और सामर्थ्य का सदुपयोग करने से निर्भयता आती है।

जो कपट करके यश चाहते हैं या सामर्थ्य का दुरुपयोग करके सुखी होना चाहते हैं, उनका सामर्थ्य नष्ट होते ही हाल-बेहाल हो जाता है।

सामर्थ्य का सदुपयोग करो। अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताएँ कम करो। अपने व्यक्तिगत व्यापार का ज्यादा विस्तार मत करो।

जो सामर्थ्य मिला है उससे औरों की सेवा करके अपना कर्जा उतारो। संसार के सुख-भोग की इच्छा छोड़कर अपने लिए अंदर का सुख खोजो और बाहर से सुख की साधन-सामग्री का उपयोग औरों के लिये करो। यह सामर्थ्य का सदुपयोग हुआ। ऐसे ही बुद्धि का भी सदुपयोग करो, वस्तु का भी सदुपयोग करो और विचारों का भी सदुपयोग करो।

ध्यान-भजन करने बैठते हैं तो फालतू विचार बार-बार आयेंगे। उन फालतू विचारों के पीछे भगवान की भावना करो। भगवान अपना शुद्ध ज्ञान मनुष्यों को देते हैं। उसे लेकर उस भगवद्ज्ञान से अपने विचारों को भर दो।

मान लो, विचार पानी के आयें तो पानी की गहराई में प्रभु की चेतना है। जल के, थल के, तेज के, वायु के, आकाश के विचार आये तो उन जल, थल, तेज, वायु और आकाश-इन सबकी गहराई में प्रभु ! तू है…. ऐसे विचारों को भर दो। इस भावना से विचारों का सदुपयोग हो जायेगा। मनोराज्य की खटपट से बचकर मन विश्रान्ति की तरफ आयेगा।

भगवान की भाषा में कहें तो….

मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय।

मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव।।

ʹहे धनंजय ! मेरे सिवाय किंचिन्मात्र भी दूसरी वस्तु नहीं है, यह संपूर्ण जगत सूत्र के मणियों के सदृश मेरे में गूँथा हुआ है।ʹ भगवदगीताः 7-7

जैसे सूत की मणियों में सूत का धागा, सोने की मणियों में सोने का तार पिरोया जाता है, ऐसे ही सारा जगत भगवद चेतना में और भगवद चेतना सारे जगत में पिरोयी हुई है।

एक बार अखंडानंद सरस्वती साबरमती में गांधी जी का चित्र देखने गये थे। चित्र क्या था ? सूत का बना हुआ था। सब सूत ही सूत था, लेकिन ऐसी कला थी कि उसमें गाँधी जी दिख रहे थे। जब चश्मा भी सूत और गांधी जी की आँखें भी सूत। उनके हाथ में डंडा है वह भी सूत और उनकी चप्पल भी सूत। सूत में डिजाईन थी। सब सूत ही सूत था। ऐसे ही ब्रह्म में जो जगत की डिजाईन है वह सब ब्रह्म ही ब्रह्म है….ʹ ऐसा जो चिंतन करता है वह संयमी और पवित्र रहता है। उसका अंतःकरण जल्दी शुद्ध हो जाता है।

आप सृष्टि में मंगलमय देखने लग जाओ, चित्त जल्दी पवित्र होगा, शांत होगा। इस पर दोष, उस पर दोष…. इसके-उसके अवगुणों का चिंतन करोगे तो आपका मन दूषित होगा।

जो मंजिल चलते हैं वे शिकवा नहीं किया करते।

और जो शिकवा करते हैं वे मंजिल नहीं पहुँचा करते।।

फरियाद हटाकर तुम धन्यवाद दो। हर हाल में तुम उसकी करूणाकृपा को देखो। इससे तुम जल्दी कल्याण को प्राप्त होगे।

दंडकारण्य में भगवान श्रीराम, सीता जी और लक्ष्मण जी रहे थे। तब वहाँ के सिख्खड़ साधुओं ने सोचा कि अपन नाहक अनासक्त होकर, विरक्त होकर जंगलों में अकेले पड़े हैं। अपन भी शादी विवाह कर लेते और अपनी-अपनी सीता लाते तो अपन भी मजे से भजन करते। लखन कंदमूल ले आता और सीता जी सेवा कर देतीं, पैरचंपी करती और अपन आराम से भजन करते।

उनके मन में ये विचार कुछ दिनों तक तो रहे, लेकिन फिर जब रावण सीता जी को ले गया तो रामजी ʹहाय सीते ! हाय सीते ! सीते…. सीते…!ʹ करने लगे तब साधु बाबाओं ने कहाः “राम जैसे राम को भी रोना पड़ता है तो अपना क्या हाल होता भैया ? अपन तो ऐसे ही भले, ऐसे ही चंगे।”

भगवान का रामावतार मनुष्य को सीख देता है कि भगवान भी अगर आसक्ति करेंगे तो भगवान भी दुःखी होंगे फिर औरों की तो बात ही क्या ?

जब-जब भय, शोक, दुःख होता है तो आसक्ति से ही होता है, पक्कड़-अक्कड़ से ही होता है। मनुष्य अगर पक्कड़-अक्कड़ छोड़ दे तो दुःख और भय को जगह ही नहीं मिलेगी।

चित्त की विश्रान्ति से पक्कड़-अक्कड़ छूटती है। जो करना चाहिए और जो कर सकते हो उसे कर डालो और जो नहीं करना चाहिए और नहीं कर सकते। उसकी इच्छा छोड़ दो। उसे हृदय से निकाल दो। उससे चित्त की विश्रान्ति मिलती है।

तुमको जो करना चाहिए वह तुम कर डालोगे तो पिया को तुम्हारे लिए जो करना होगा, वह भी कर देगा, उसमें देर नहीं लगेगी।

तू मुझे उर आंगन दे दे। मैं अमृत की वर्षा कर दूँ।

तू तेरा अहं दे दे। मैं परमात्मा का रस भर दूँ।।

अगर  ऐसा कहें कि अहं तो नहीं देंगे, अहं तो हम अपने पास रखेंगे, लेकिन आप रस भर दो… तो भैया !

इश्क करना और जाँ बचाना, यह भी कभी हो सकता है क्या ?

जैसे सूत की मणि, सूत के धागे से पिरोयी हुई है, जैसे तरंग भिन्न-भिन्न दिखते हुए भी सब जल ही जल है, मिट्टी के बर्तन भिन्न-भिन्न दिखने पर भी सब मिट्टी ही मिट्टी है, शक्कर के खिलौने सब भिन्न-भिन्न होते हुए भी सब शक्कर ही शक्कर है, ऐसे ही व्यक्तियों के आकार (Model) भिन्न-भिन्न, उनके विचार भिन्न-भिन्न, उनके कर्म भिन्न-भिन्न, उनके स्वभाव भिन्न-भिन्न, लेकिन उन सबमें अभिन्न एक आत्मा ज्यों का त्यों है… ऐसा जो सुमिरन करता है उसको विश्रान्ति मिलती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 1997, पृष्ठ संख्या 21,22,23 अंक 55

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शरीर स्वास्थ्य


सेवफल

प्रातःकाल खाली पेट सेवफल का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। सेव को छीलकर नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसके छिलके में कई महत्त्वपूर्ण क्षार होते हैं। इसके सेवन से मसूड़े मजबूत होते हैं, दिमाग शांत होता है व अच्छी नींद आती है। यह रक्तचाप को कम करता है।

सेव वायु तथा पित्त का नाश करने वाला, पुष्टिदायक, कफकारक, भारी, रस तथा पाक में मधुर, ठंडा, रूचिकारक, वीर्यवर्धक, हृदय के लिए हितकारी व पाचनशक्ति को बढ़ाने वाला है।

रक्तविकार के कारण बार-बार फोड़े-फुंसियाँ होती हों, जीर्ण त्वचारोग के कारण चमड़ी शुष्क हो गई हो, खुजली अधिक होती हो तो अन्न त्यागकर केवल सेव का सेवन करने से लाभ होता है।

सेव के छोटे-छोटे टुकड़े कर के काँच या चीनी के बर्तन में, ओस पड़े इस तरह खुली जगह, चाँदनी रात में रखकर, रोज सुबह, एक महीने तक सेवन करने से शरीर तंदरुस्त बनता है।

सेव को अंगारों पर सेंककर खाने से अत्यन्त बिगड़ी पाचनक्रिया सुधरती है।

सेव का रस सोडे के साथ मिलाकर दाँतों पर मलने से, दाँतों से निकलने वाला खून बंद हो जाता है एवं दाँतों पर जमी हुई पपड़ी दूर होती है व दाँत स्वच्छ होते हैं।

बार-बार बुखार (ज्वर) आने पर अन्न का त्याग करके सिर्फ सेव का सेवन करें तो बुखार से मुक्ति मिलती है व शरीर बलवान बनता है।

कुछ दिन केवल सेव के सेवन से सर्व प्रकार के विकार दूर होते हैं। पाचनक्रिया बलवान बनती है और स्फूर्ति आती है।

यूनानी मतानुसार सेव हृदय, मस्तिष्क, लिवर तथा जठरा को बल देता है, भूख लगाता है, खून बढ़ाता है तथा शरीर की कान्ति में वृद्धि  करता है।

इसमें टार्टरिक एसिड होने से यह एकाध घंटे में पच जाता है और खाये हुए अन्य आहार को भी पचा देता है।

सेव के गूदे की अपेक्षा उसके छिलके में विटामिन ʹसीʹ अधिक मात्रा में होता है। अन्य फलों की तुलना में सेव में फास्फोरस की मात्रा सबसे अधिक होती है। सेव में लौहतत्त्व भी अधिक होता है अतः यह रक्त व मस्तिष्क संबंधी दुर्बलताओं वाले लोगों के लिए हितकारी है।

विशेषः सेव शीतल है। इसके सेवन से कुछ लोगों को सर्दी जुकाम भी हो जाता है। किसी को इससे कब्जियत भी होती है। अतः कब्जियत वाले पपीता खायें।

अनार

ʹएक अनार सौ बीमारʹ वाली कहावत आपने सुनी ही होगी। मीठा अनार तीनों दोषों का शमन करने वाला, तृप्तिकारक, वीर्यवर्धक, हल्का, कसैले रसवाला, बुद्धि तथा बलदायक एवं प्यास, जलन, ज्वर, हृदयरोग, कण्ठरोग, मुख की दुर्गन्ध तथा कमजोरी को दूर करने वाला है। खटमिट्ठा अनार अग्निवर्धक, रूचिकारक, थोड़ासा पित्तकारक व हल्का होता है। पेट के कीड़ों का नाश करने व हृदय को बल देने के लिए अनार बहुत उपयोगी है। इसका रस पित्तशामक है। इससे उल्टी बंद होती है।

अनार पित्तप्रकोप, अरूचि, अतिसार, पेचिश, खांसी, नेत्रदाह, छाती का दाह व व्याकुलता दूर करता है।

गर्मियों में सिरदर्द हो, लू लग जाये, आँखें लाल-लाल हो जायें तब अनार का शरबत गुणकारी सिद्ध होता है।

इसका रस स्वरयंत्र, फेफड़ों, हृदय, यकृत, आमाशय तथा आँतों के रोगों में लाभप्रद है। अनार खाने से शरीर में एक विशेष प्रकार की चेतना सी आती है।

ताजे अनार के दानों का रस निकालकर उसमें मिश्री डालकर पीने से हर प्रकार का पित्तरोग शांत होता है।

अनार के रस में सेंधा नमक व शहद मिलाकर लेने से अरूचि मिटती है।

अनार की सूखी छाल आधा तोला बारीक कूटकर, छानकर उसमें थोड़ा सा कपूर मिलायें। यह चूर्ण दिन में दो बार पानी के साथ मिलाकर पीने से भयंकर कष्टदायक खांसी मिटती है।

अनार के छिलके का चूर्ण नागकेशर के साथ मिलाकर देने से अर्श (बवासीर) का रक्तस्राव बंद होता है।

अनार का रस शरीर में शक्ति, स्फूर्ति तथा स्निग्धता लाता है। बच्चों के पेट में कीड़े हों तो उन्हें नियमित रूप से सुबह-शाम 2-3 चम्मच अनार का रस पिलाने से कीड़े नष्ट हो जाते हैं।

अनार का छिलका मुँह में डालकर चूसने से खाँसी में लाभ होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 30,32 अंक 53

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सत्संग से जागे विवेक


पूज्यपाद संत श्री आशाराम जी बापू

सत्संग से वंचित होना महान पापों का फल है। किसी भी कीमत पर सत्संग का त्याग नहीं करना चाहिए। वशिष्ठजी कहते हैं कि चांडाल के घर की भिक्षा एक ही बार मिले, वह भी ठीकरे में लेकर खाना पड़े पर जहाँ ज्ञान का सत्संग मिलता हो वहीं पड़े रहना चाहिए।

कोई बड़ा धनवान हो चाहे बड़ा सम्राट हो, अंत में तो वह धन को, साम्राज्य को यहीं छोड़कर चला जायेगा और ब्रह्मविद्या नहीं होगी तो किसी न किसी माँ के गर्भ में जाकर लटकने का, फिर जन्म लेने का और मरने का दुर्भाग्य चालू रहेगा। जिसको सत्संग में रूचि है, प्रीति है, श्रद्धा है, वह देर सबेर ज्ञान पाकर मुक्त हो जायेगा।

जैसे आपको कोई चीज अच्छी लगती है तो आप उसका त्याग नहीं करते हैं, फेंक नहीं देते हैं, संभालकर घर में रख लेते हैं। चाहे घर छोटा भी हो, कमरे में जगह नहीं हो तो छत पर भी रख देते हो। ऐसे ही जो लोग सत्संग में जाते हैं, उन्हें सत्संग की कोई न कोई बात तो अच्छी लगती ही है। जो बात अच्छी लगे उसे अगर दिलरूपी घर में जगह नहीं है तो दिमाग रूपी छत में भी रख लेंगे तो कभी-न-कभी काम आएगी।

सत्संग की आधी घड़ी, सुमिरन बरस पचास।

बरखा बरसे एक घड़ी अरहट फिरे बारह मास।।

जैसे अरहट बारहों मास फिरता रहे फिर भी उतना पानी नहीं दे पाता लेकिन एक घड़ी की वर्षा बहुत सारा पानी बरसा देती है। ऐसे ही सत्संग से भी अमाप लाभ मिलता है।

सत्संग ही साधना को पुष्ट करता है। साधक ऐसे ही जप करता रहेगा तो कभी भी ऊब जायेगा पर सत्संग सुनता रहेगा तो कभी जप की महिमा सुनेगा, कभी ध्यान की महिमा सुनेगा, कभी ज्ञान की बातें सुनेगा तो जप में, ध्यान में, ज्ञान में रूचि होगी। काम करते-करते सत्संग में सुनी हुई बातों को याद रखेगा तो भी बहुत लाभ होगा।

सत्संग ऐसी बढ़िया चीज है कि सत्संग सुनते रहने से आदमी के चित्त में विवेक जगता है। एक होता है सामान्य विवेक, दूसरा होता है मुख्य विवेक। सामान्य  विवेक याने शिष्टाचार। कैसे उठना, कैसे बैठना, कैसे बोलना, बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करना, महापुरुष है तो उनसे दो कदम पीछे चलना, कुछ पूछे तो विनम्रता से उत्तर देना, उनके सामने अपने चित्त की दशा का वर्णन करना, यह सामान्य विवेक सत्संग में मिलता है। सत्संग सुनते-सुनते जब आदमी के चित्त की पहली भूमिका बन जाती है तो सामान्य विवेक या शिष्टाचार अपने-आप में पैदा होने लगता है।

दूसरा विवेक है मुख्य विवेक। वह है आत्मा-अनात्मा का विवेक। सत्संग में सुनी हुई बातें याद रखकर उसका मनन करने से मुख्य विवेक जगता है। एक होती ही है रहने वाली चीज, वह है आत्मा। दूसरी होती है छूटने वाली, नष्ट होने वाली चीज, वह है अनात्मा, मायारूपी जगत के पदार्थ। जो अनात्म पदार्थ हैं वे चाहे कितने भी कीमती हों, कितने भी सुंदर हों, कितने भी सुखद लगें किन्तु कभी तो उनका वियोग होगा ही। या तो वह चीज नहीं रहेगी या तो उसे ʹमेरीʹ कहने वाला  शरीर नहीं रहेगा। संसार की कोई भी चीज हो वह केवल देखऩे भर को है, कहने भर को हमारी है। आखिर तो छूटेगी ही। जब चीज छूट जाये तब रोना पड़े, उसके वियोग का दुःख सहना पड़े उसके पहले समझकर उसमें से ममता छोड़ दें। जो छूटने  वाली चीज है उसे छूटने वाली समझ लें और जो नहीं छूटने वाला है, सदा साथ देने वाला है उस आत्मा में प्रीति कर लें तो काम बन जायेगा।

हम लोग क्या करते हैं कि जो छूटने वाली चीजें हैं उनसे प्रीति करते हैं और जो सदा साथ रहने वाला है उनकी ओर ध्यान नहीं देते हैं। जो प्रीति अपने आत्मा में करता है और छूटने वाली चीजों का उपयोग करता है उसका जीवन सुखमय हो जाता है।

किसी रास्ते से गुजर कर आप कहीं जाना चाहते हो तो सड़क बढ़िया हो चाहे घटिया हो, चाहे चढ़ाव आये चाहे उतार आये, आप वहाँ से गुजर कर अपने गन्तव्य स्थान को पहुँच ही जाओगे। चढ़ाव देखकर आप रुक नहीं जाओगे और उतार देखकर बैठ नहीं जाओगे । ऐसे ही जीवन के चाहे किसी भी क्षेत्र में जाओ, चढ़ाव उतार आयेंगी ही, अनुकूलता-प्रतिकूलता आयेगी ही। संयोग-वियोग भी होता रहेगा। इन सबको गुजरने दो और अपने लक्ष्य की स्मृति बनाये रखो। जिस पत्नी का संयोग हुआ है एक दिन उसका वियोग भी होगा, पुत्र परिवार का भी वियोग होगा। धन-पद-प्रतिष्ठा, दुःख-सुख सब संयोगजन्य हैं। उनका वियोग अवश्य होगा। इसमें कोई सन्देह नहीं है क्योंकि ये सब नश्वर हैं। फिर भी उनके लिए आदमी तड़पता रहता है तो मनुष्य जन्म में जो आत्मज्ञान का अधिकार है वह गँवा देता है।

व्यवहार में आप कुशल रहो। व्यवहार चलाने के लिए रूपये पैसे की जरूरत पड़ती है। ठीक है, किन्तु अंदर समझ बनाये रखो कि इसमें कोई सार नहीं है। बहुत धन मिल गया तो भी क्या ? पद-प्रतिष्ठा मिल गई फिर क्या ? ये सब अनात्म पदार्थ हैं, उनका संयोग हुआ है तो वियोग भी होगा। इन छूटने वाले पदार्थों का साथ कब तक टिकेगा ?

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

असत् कभी टिकता नहीं है और सत् का कभी नाश नहीं होता है। उस सत् के साथ मन से भी संबंध बनाये रखना है।

रेलवे में मुसाफिरी करते वक्त हमने देखा है कि यात्री जब मिलते हैं तो आपस में बातचीत करते हैं- ʹआप कहाँ से आये हो ? कहाँ जाना है ?ʹ फिर एक दूसरे का स्वभाव मेल खाता है तो दोस्ती जम जाती है। वे साथ में खाते हैं, कुछ खरीदते हैं तो एक एक दूसरे को देते हैं। एक-दूसरे का एड्रेस भी लेते हैं और उतरते समय तो बहुत लम्बी-चौड़ी बातचीत करते हैं- ʹअच्छा फिर मिलेंगे, खत लिखेंगे… आयेंगे… जायेंगे…ʹ वह सब स्टेशन से बाहर निकलकर घर पहुँचते ही हवा हो जाता है। रेलवे की दोस्ती वहीं तक सीमित रह जाती है।

तुम्हारे ये जो श्वासोच्छ्वास चल रहे हैं तो समझो यह आयुष्यरूपी गाड़ी चल रही है। रेलगाड़ी तो कहीं दो मिनट, कहीं पाँच मिनट, कहीं आधा घंटा भी रूकती है पर यह गाड़ी तो चौबीस घंटों चलती ही रहती है। रेलगाड़ी छुक-छुक करती चलती है, यह गाड़ी ʹसोઽहं सोઽहंʹ करती है। रेलगाड़ी में तो आप चाहो तो बीच के स्टेशन में उतरो चाहे अंतिम स्टेशन पर उतरो मरजी आपकी। इस गाड़ी को तो जहाँ रूके, छोड़ना ही पड़ेगा। ऐसी गाड़ी में साथ में जो स्नेही, सगे-संबंधीरूपी पैसेंजर मिल गये उनके साथ ठीक से संबंध निभा लो लेकिन अंदर से समझ लो कि गाड़ी छूटने तक का खेल है, चाहे उनकी गाड़ी पहले छूटे, चाहे अपनी गाड़ी पहले छूटे। गाड़ी से उतरे कि सब भूल जाना है। केवल अपने घर को याद रखना है।

आप बस में बैठकर कहीं जा रहे हो। रास्ते में बहुत बढ़िया बंगला दिखे, वह चाहे कितना भी सुंदर हो पर बस में से उतरकर उसमें रहने चले जाते हो क्या ? नहीं। अपना मकान भले किराये का हो, पुराना हो पर उसमें ही जाकर रहोगे क्योंकि वह अपना है जबकि सुंदर दिखऩे वाला वह बंगला तो पराया है, देखने भर को है। उसमें निवास नहीं हो सकता। ठीक ऐसे ही शरीररूपी घर कितना भी सुंदर लगे, सुखदायी लगे पर यह देखने भर को है, पराया है। इसमें सदा निवास नहीं हो सकता। अपना आत्मारूपी घर ही अपना है, शाश्वत है।

शरीर सदा टिकता नहीं है और आत्मा कभी मरता नहीं है। यह है मुख्य विवेक। ऐसा विवेक जिसका जागृत हो गया वह देर सवेर अमर आत्मा का ज्ञान पा लेगा।

अविनाशी आतम अमर जग ताते प्रतिकूल।

ऐसा ज्ञान  विवेक है, सब साधन का मूल।।

आत्मा अविनाशी है, शरीन नाशवान है। आत्मा सत्-चित्-आनंदस्वरूप है, शरीर असत्, जड़ और दुःखरूप है। आत्मा अजर-अमर है, शरीर परिवर्तनशील और मरणधर्मा है। ऐसा विवेक जिसका  पक्का हो गया उसने दुनिया में बहुत कुछ जान लिया। उसने बहुत पढ़ाई कर ली, उसने बहुत  परीक्षाएँ पास कर लीं। चाहे वह अनपढ़ हो, अंगूठाछाप हो पर सत्संग सुनते सुनते उसका विवेक जग जाता है। सुख-दुःख में वह इतना हिलता नहीं है। पढ़े हुए जिंदगी में जितने सुख-दुख के झोंके खाते हैं उतने झोंके खाने का दुर्भाग्य उसका नहीं होता है। संसार बमें ही रचा-पचा रहने वाला आदमी चाहे कितना भी पढ़ा लिखा हो  किन्तु उसके जीवन में सत्संग नहीं है विवेक नहीं है। आदमी को थोड़ा सा भी सुख मिलता है तो अभिमान आ जाता है और थोड़ा सा दुःख आता है तो परेशान हो जाता है। तो किसकी पढ़ाई सच्ची ? सत्संग में आदमी बिना परिश्रम के ऐसी पढ़ाई पढ़ लेता है कि अनपढ़ होते हुए भी वह पढ़े-लिखे को पढ़ा सकता है। तुलसीदास जी ने कहा हैः

बिनु सत्संग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।

भगवान की कृपा के बिना सत्संग सुलभ नहीं है। माया की कृपा हो तो आदमी को धन-धान्य मिलता है, प्रजापति की कृपा हो तो पुत्र परिवार मिलता है। जब प्रभु की कृपा होती है तब सत्संग मिलता है।

सत्संग में प्रीति होना बड़े भाग्य की बात है और सत्संग से वंचित होना, सत्संग का त्याग करना महान पापों का फल है। किसी आदमी में सामान्य विवेक भी नहीं है, वह यदि सत्संग सुनता रहेगा तो उसका सामान्य विवेक जगेगा और प्रीतिपूर्वक, आदरपूर्वक, श्रद्धा से सत्संग का मनन करेगा तो मुख्य विवेक में उसकी गति हो जायेगी। सामान्य विवेक जगने से आदमी के चित्त में धर्म की उत्पत्ति होती है। वह धर्मात्मा बन जाता है। मुख्य विवेक जगता है और वह दृढ़ हो जाता है तो आदमी महात्मा बन जाता है। महात्मा वह है जो अपने शरीर सहित संपूर्ण जगत के पदार्थों को नाशवान समझकर, अविनाशी आत्मा में प्रीतिपूर्वक स्थित हो जाता है। जो अपने-आपको जान लेता है, वही परम विवेकी है। उसने ही जगत में बड़ा काम कर लिया जिसने अपने-आपको जान लिया।

जहाँ में उसने बड़ी बात कर ली।

जिसने अपने आपसे मुलाकात कर ली।।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 1997, पृष्ठ संख्या 5,6,7 अंक 53

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