ऋषि प्रसाद

सांसारिक, आध्यात्मिक उन्नति, उत्तम स्वास्थ्य, साँस्कृतिक शिक्षा, मोक्ष के सोपान – ऋषि प्रसाद। हरि ओम्।

आसुरी, राक्षसी और मोहिनी भाव


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा हैः मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।। ‘वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैं।’ गीताः 9.12 आसुरी भाव, दैत्य भाव और मोहिनी भाव …

Read More ..

धन्य कौन ?


संत श्री आसाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से एक बार ऋषि-मुनियों में आपस में चर्चा चली कि कौन-सा युग श्रेष्ठ है जिसमें थोड़ा-सा पुण्य अधिक फलदायक होता है और कौन सुविधापूर्वक उसका अनुष्ठान कर सकता है ? किसी ने कहा सतयुग ही श्रेष्ठ युग है, किसी ने कहा द्वापर तो किसी ने कुछ… ऐसे ही …

Read More ..

सर्वकला भरपूर, प्रभु !


(ईश्वर सदा है सर्वत्र है और सबमें है। उसी के कारण हमारा अस्तित्व है। इसी बात पर प्रकाश डालते हुए पूज्यश्री कह रहे हैं-) कंकर, पत्थर और पहाड़ में ईश्वर के अस्तित्व की एक कला है – अस्तिपना। कंकर, पत्थर और पहाड़ों का चूरा करके बालू बना दो। बालू का भी चूरा कर दो फिर …

Read More ..