आसुरी, राक्षसी और मोहिनी भाव
संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा हैः मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः।। ‘वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किये रहते हैं।’ गीताः 9.12 आसुरी भाव, दैत्य भाव और मोहिनी भाव …