संतकृपा से चित्रकेतु का मोहभंग
संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से सदगुरु मेरा शूरमा, करे शब्द की चोट। मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।। ʹमैं शरीर हूँ… यह मेरा नाम है… यह मेरी नात-जात है…. यह मेरी पत्नी है… यह मेरा पुत्र-परिवार है…. यह मेरा कर्त्तव्य है….ʹ ये सब भरम हमारे अंदर घुस गये हैं। ʹहम जी …