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Know the Self


 

(Excerpts from Satsang of Pujya Sant Shri Asaramji Bapu)

Bliss-personified God is your True origin. You are sustained by That and you will finally merge into That itself. And if you do not take out time to establish yourself in That, then you are but your own greatest enemy.

You have been provided with both time and energy to attain Eternal Self-Bliss. You have been blessed with an intellect to realize the Divine Being. If you waste these divine gifts in the pursuit of worldly comforts and pleasures, then even if you acquire a lot of wealth it will not bring an end to your sorrows. Irrespective of how much a man is wealthy or powerful he can never be fully relieved from miseries.

No doubt it is a sin to kill a horse, donkey, dog or man; but to deny your own divinity is a graver sin. It is tantamount to committing suicide, and such a person is his own greatest enemy. External enemies are simply dwarfed in comparison.

You have been bestowed with a human life, a good intellect; rather than employing them in the right pursuit if you waste them for transient worldly pleasures, then you are bound to repent in the end.

The human life is not meant for sense-enjoyments. It is meant to attain the bliss of samadhi, to attain the majestic state of equanimity. In ancient times people would undertake pilgrimages, experiencing happiness and sorrow, praise and insults and various other difficulties en route with a view to having the realization, The body is born and will die, I am its witness.

“One who has conquered his mind, senses and body, is his own friend while one who fails to conquer his mind, senses and body is his own enemy.” (Srimad Bhagwad Gita: 6.6)

Therefore, one should nurture elevating thoughts of realizing the Supreme Self; for salvation is unattainable without first acquiring Knowledge of the True Self. One should make a firm resolve to attain the Knowledge of the True Self alone in order to repose in the Supreme Being, the Eternal, the Immutable and the One that is always free from sorrow.

O happiness -love -and bliss-personified soul! Why are you toiling for happiness, love and bliss; being kicked, wearied and tormented in the process? Wait stop here and now. Learn the art of experiencing your True Self from an Enlightened Saint so that you can realize, how sweet, how loveable, how blissful and truly great you are!

भगवान के दर्शन से भी ऊँचा


 

(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)

आत्मसाक्षात्कार करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। जीव, जगत (स्थूल जगत, सूक्ष्म जगत) और ईश्वर – ये सब माया के अन्तर्गत आते हैं। आत्मसाक्षात्कार माया से परे है। जिसकी सत्ता से जीव, जगत, ईश्वर दिखते हैं, उस सत्ता को मैं रूप से ज्यों का त्यों अनुभव करना, इसका नाम है आत्मसाक्षात्कार। जन्मदिवस से भी हजारों गुना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। आत्मासाक्षात्कार दिवस। भगवान कहते हैं-

 

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।

 

हजारों मनुष्यों में कोई विरला सिद्धि के लिए यत्न करता है और उन सिद्धों में से कोई विरला मुझे तत्वतः जानता है।

 

आत्मसाक्षात्कार को ऐसे कोई विरले महात्मा ही पाते हैं। योगसिद्धि, दिव्य दर्शन, योगियों का आकाशगमन, खेचरी, भूचरी सिद्धियाँ, भूमि में अदृश्य हो जाना, अग्नि में प्रवेश करके अग्निमय होना, लोक-लोकान्तर में जाना, छोटा होना, बड़ा होना इन अष्टसिद्धियों और नवनिधियों के धनी हनुमानजी आत्मज्ञानी श्रीरामजी के चरणों में गये, ऐसी आत्मसाक्षात्कार की सर्वोपरि महिमा है। साधना चाह कोई कितनी भी ऊँची कर ले, भगवान राम, श्रीकृष्ण, शिव के साथ बातचीत कर ले, शिवलोक में शिवजी के गण या विष्णुलोक में जय-विजय की नाईं रहने को भी मिल जाय फिर भी साक्षात्कार के बिन यात्रा अधूरी रहती है।

 

आज हमारी असली शादी का दिवस है। आज ईश्वर मिलन दिवस, मेरे गुरूदेव का विजय दिवस है, मेरे गुरूदेव का दान दिवस है, गुरूदेव के पूरे बरसने का दिवस है। दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो पूरी मानवता के लिए अपने परम तत्त्व को पा सकने की खबर देने वाला दिवस आत्मसाक्षात्कार दिवस है। आज वह पावन दिवस है जब जीवात्मा सदियों की अधूरी यात्रा पूरी करने में सफल हो गया। धरती पर तो रोज करीब डेढ़ करोड़ो लोगों का जन्म दिवस होता है।

 

शादी दिवस और प्रमोशन दिवस भी लाखों लोगों का हो सकता है। ईश्वर के दर्शन का दिवस भी दर्जनों भक्तों का हो सकता है लेकिन ईश्वर-साक्षात्कार दिवस तो कभी-कभी और कहीं-कहीं किसी-किसी विरले को देखने को मिलता है। जो लोक संत हैं और प्रसिद्ध हैं उनके साक्षात्कार दिवस का तो पता चलता है, बाकी तो कई ऐसे आत्मारामी संत हैं जिसका हमको आपको पता ही नहीं। ऐसे दिवस पर कुछ न करें तब भी वातावरण में आध्यात्मिकता की अद्भुत तरंगें फैलती रहती हैं।

 

आसोज सुद दो दिवस, संवत बीस इक्कीस।

मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस।।

 

देह मिथ्या हुई पढ़ते तो हो, बोलते तो हो लेकिन देह कौनसी, पता है जो दिखती है वह स्थूल देह है, इसके अंदर सूक्ष्म देह है। विष्णुभक्त होगा तो विष्णुलोक में जायगा, तत्त्वज्ञान नहीं है तो अभी देह मिथ्या नहीं हुई। अगर पापी है तो नरकों में जायेगा फिर पशुयोनि में आयेगा, पुण्यात्मा है तो स्वर्ग में जायेगा फिर अच्छे घर में आयेगा, लेकिन अब न आना न जाना, अपने आपमें व्यापक हो जाना है। जब तत्त्व ज्ञान हो गया तो देह और आकृति का अस्तित्व अंदर टिकाने वाला शरीर मिथ्या हो गया। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर सारे बाधित हो गये। जली हुई रस्सी देखने में तो आती है लेकिन उससे आप किसी को बाँध नहीं सकते। ऐसे ही जन्म जन्मांतरों की यात्रा का कारण जो अज्ञान था, वह गुरु की कृपादृष्टि से पूरा हो गया (मिट गया)। जैसे धान से चावल ले लिया भूसी की ऐसी-तैसी, केले से गूदा ले लिया फिर केले के छिलके को तुम कैसे निरर्थक समझते हो, ऐसे ही शरीर होते हुए भी-

 

देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार।

हुआ आत्मा से तभी,  अपना साक्षात्कार।।

 

आज तो आप लोग भी मुझे साक्षात्कार-दिवस की खूब मुबारकबादी देना, इससे आपका हौसला बुलंद होगा। जैसे खाते पीते, सुख-दुःख, निंदा स्तुति के माहौल से गुजरते हुए पूज्यपाद भगवत्पाद श्री श्री लीलाशाहजी  बापू, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि अथवा तो और कई नामी-अनामी संत समत्वयोग की ऊँचाई तक पहुँच गये, साक्षात्कार कर लिया, ऐसे ही आप भी उस परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं, ऐसे ही साक्षात्कारी पुरूषों के इस पर्व को समझने सुनने से आत्मचाँद की यात्रा करने का मोक्षद्वार खुल जाता है।

 

मनुष्य तू इतना छोटा नहीं कि रोटी, कपड़े मकान, दुकान या रूपयों में ही सारी जिंदगी पूरी कर दे। इन छूट जाने वाली असत् चीजों में ही जीवन पूरा करके अपने साथ अन्याय मत कर। तू तो उस सत्स्वरूप परमात्मा के साक्षात्कार का लक्ष्य बना। वह कोई कठिन नहीं है, बस उससे प्रीति हो जाये।

 

असत् पदार्थों की और दृष्टि रहेगी तो विषमता बढ़ेगी। यह शरीर मिथ्या है, पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। धन, पद ये मिथ्या हैं, इनकी तरफ नजर रहेगी तो आपका व्यवहार समतावाला होगा। धीरे धीरे समता में स्थिति आने से आप कर्मयोगी होने में सफल हो जाओगे। ज्ञान के द्वारा सत् असत् का विवेक करके सत् का अनुसंधान करोगे और असत् की आसक्ति मिटाकर समता में खड़े रहोगे तो आपका ज्ञानयोग हो जायगा। बिना साक्षात्कार के समता कभी आ ही नहीं सकती चाहे भक्ति में प्रखर हो, योग में प्रखर हो, ज्ञान का बस भंडार हो लेकिन अगर साक्षात्कार नहीं हुआ तो वह सिद्धपुरूष नहीं साधक है। साक्षात्कार हुआ तो बस सिद्ध हो गया।

 

इस महान से महान दिवस पर साधकों के लिए एक उत्तम तोहफा यह है कि आप अपने दोनों हाथों की उँगलियों को आमने सामने करके मिला दें। होंठ बंद करके जीभ ऐसे रखें कि न ऊपर लगे न नीचे, बीच में रखें। फिर जीव-ब्रह्म की एकता का संकल्प करके, तत्त्वरूप से जो मौत के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ता उसमें शांत हो जायें। यह अभ्यास प्रतिदिन करें, कुछ समय श्वासोच्छवास की गिनती करें जिससे मन एकाग्र होने लगेगा, शक्ति का संचय होने लगेगा। धीरे-धीरे इस अभ्यास को बढ़ाते जायेंगे तो तत्त्व में स्थिति हो जायेगी। जीवन की शाम होने के पहले साक्षात्कारी महापुरूषों की कृपा की कुंजी से साक्षात्कार कर लेना चाहिए।

 

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इक घड़ी न मिलते ता कलिजुगु होता….


 

सिख समाज के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव जी बचपन से ही धार्मिक कार्यों और सत्संगियों की सेवा में रूचि लेते थे। अर्जुनदेव अपने पिता गुरु रामदास जी से पिता के नाते उतना लगाव नहीं रखते थे, जितना गुरु के नाते रखते थे। एक भी क्षण के लिए वे अपने गुरु रामदास जी से दूर होना नहीं चाहते थे। गुरु राम दास जी ने अपने पुत्र अर्जुन देव में सेवा, गुरुचरणों में समर्पण, अधिकार नहीं कर्तव्य में रूचि, आज्ञापालन में निष्ठा आदि सदगुणों को देख के यह निश्चय कर लिया था कि ‘गुरुगद्दी का अधिकारी तो अर्जुनदेव ही हो सकता है।’ इसलिए उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय किया।
एक बार गुरु रामदासजी के पास उनके एक संबंधी का संदेश आया कि ‘मेरे पुत्र का विवाह है। आप इस अवसर पर लाहौर अवश्य पधारें।’ गुरु रामदास जी ने अपने बड़े बेटे पिरथीचंद को वहाँ जाने के लिए कहा तो पिरथीचंद ने अपने पीछे कहीं छोटे भाई अर्जुनदेव को गुरुगद्दी न सौंप दी जाय इस भय से मना कर दिया। तब गुरु जी ने दूसरे बेटे बाबा महादेव जी को वहाँ जाने के लिए कहा उन्होंने भी मना कर दिया क्योंकि उन्हें संसारी बातों में रूचि नहीं थी। तब रामदास जी ने अर्जुनदेव जी कहाः “बेटा ! तुम लाहौर जाओ और जब तक मैं न बुलाऊँ, तुम वहीं रहना।”

अर्जुनदेव जी गुरुआज्ञा पाते ही लाहौर निकल पड़े। विवाह-कार्य सम्पन्न हुआ। 3-4 महीने हो गये लेकिन अभी तक गुरु जी की ओर से न कोई पत्र आया न ही बुलावा। उनको 4 महीने का बिछुड़ना 4 युगों के समान प्रतीत होने लगा। गुरुदेव के बिना एक-एक पल काटना मुश्किल हो गया तब अर्जुनदेव जी ने गुरु जी को पत्र लिखाः

मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई।
बिलप करे चात्रिक की निआई।…..

‘हे गुरु जी ! आपके दर्शन के लिए मेरा मन व्याकुल है और चातक की तरह विलाप करता है। हे संतजनों के प्यारे ! आपके दर्शन के बिना प्यास नहीं बुझती।’

यह पत्र पिरथीचंद के हाथ लगा। उन्होंने उसके गुरु जी तक इस डर से नहीं पहुँचने दिया कि कहीं गुरुजी उनको बुला न लें। 10-12 दिन हुए, गुरु जी की ओर से कोई पत्र न आया। अर्जुन देव जी ने दूसरा पत्र लिखाः

तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी।……

‘आपका मुख शोभनीय है और वाणी सहज अर्थात् शांतिरूप है। हे सारंगपाणि ! आपके दर्शन किये चिरकाल हो गया है। हे मेरे प्रभु ! मेरे मित्र ! सज्जन ! यह स्थान धन्य है जहाँ आप बस रहे हैं !’

यह पत्र भी पिरथीचंद को मिल गया, उन्होंने वह पत्र भी छुपा लिया। इधर अर्जुनदेव जी की व्याकुलता बढ़ती गयी। उन्होंने कुछ समय पश्चात् तीसरा पत्र लिखकर जिस सिख के हाथ भेजा, उससे कहा कि वह उसे गुरु जी के सिवा किसी को न दे। उसमें लिखा थाः

इक घड़ी न मिलते ता कलिजुगु होता।…..

‘एक घड़ी दर्शन न होने पर तो समय कलियुग सा लगता है लेकिन हे प्यारे ! अब आपको कब मिलूँगा ? हे गुरु ! आपका दरबार देखे बिना मुझे नींद नहीं आती और न ही मेरी रात्रि बीतती है। मैं तन, मन और वाणी से उस गुरु पर बलिहारी जाता हूँ, जिसका दरबार सच्चा है।’

सिख ने वह पत्र सीधा गुरु रामदास जी को दिया। गुरु जी ने अर्जुन देव का पत्र पढ़ा, उनके आँसू बह निकले। अर्जुनदेव जी का त्याग एवं समर्पण देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्र पर तीन का अंक देखकर सिख से पूछाः “दूसरे दो पत्र कहाँ हैं ?” सिख ने उत्तर दियाः “मैंने वे पत्र तो पिरथीचंद को दिये थे।”

गुरु जी ने पिरथीचंद को बुलाकर पूछा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। अंतर्यामी गुरु जी ने अपने सेवक को कहाः “जाओ, पिरथीचंद की कोट की जेब में दोनों पत्र पड़े हैं, उनको ले आओ।” सिख जाकर पत्र ले आया।

पिरथीचंद शर्माये। उन्होंने कहाः “पिता जी ! वे पत्र मेरे द्वारा लिखे गये हैं।”

गुरु जी ने अर्जुनदेव जी को बुलवा लिया। फिर दोनों से कहाः “इस वाणी की तीन सीढ़ियाँ (पंक्तियाँ) हैं, जो इसकी चौथी सीढ़ी का उच्चारण करेगा, उसी की पहली तीनों सीढ़ियाँ समझी जायेंगी।”

पिरथीचंद तो झूठ बोला था, उनसे तो वाणी उच्चारित नहीं हो सकी। अर्जुनदेव जी ने चौथी सीढ़ी का उच्चारण करते हुए कहाः

भागु होआ गुरि संत मिलाइआ।
प्रभु अबिनासी घर महि पाइआ।….

‘जब पुण्यों का प्रभाव हुआ, सौभाग्य हुआ तब संतों ने आप ही गुरु से मिलाप करा दिया और अब (आपकी कृपा से) अविनाशी प्रभु अंतःकरण रूपी घर में प्राप्त हुआ है। अब प्रार्थना है कि आपकी सेवा करते हुए पलभर भी न बिछड़ूँ। मैं आपका दास हूँ।’

गुरु राम दास जी बहुत प्रसन्न हुए और अर्जुनदेव जी को गले लगाकर बोलेः “बस बेटा ! तुम ही गुरु की पदवी के योग्य हो।” अर्जुनदेव जी गुरु के प्रति तड़प जल्दी ही उन्हें गुरु के निकट ले आयी।

जब बच्चा झूठमूठ में रोता है तो माँ ध्यान न भी दे लेकिन जब वह माँ के लिए सचमुच तड़पता है तो माँ उससे दूर नहीं रह पाती, तो हजारों माताओं की करुणा जिनके हृदय में होती है, ऐसे सदगुरु के लिए शिष्य के लिए हृदय में सच्ची तड़प जग जाय तो वे भला दूर कैसे रह सकते हैं !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2015, पृष्ठ संख्या 23, अंक 274
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