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ʹएतत्सर्वं गुरोर्भक्त्या….ʹ


संत श्री आशाराम जी बापू के सत्संग-प्रवचन से

शास्त्रों के रचयिता वेदव्यासजी महाराज ने कहा हैः “काम को जीतना हो तो बीमार को देखो अथवा मन ही मन कल्पना करो की शरीर की चमड़ी हट जाये तो अंदर कौन सा मसाला भरा है। लोभ को जीतना हो तो दान करो। क्रोध को जीतना हो तो क्षमा का गुण ले आओ। मोह को जीतना हो तो शमशान में जाकर देखो कि आखिर कोई किसी का नहीं होता। अहंकार को जीतना हो तो जिस बात का अहंकार हो-धन का, सत्ता का, सौन्दर्य का इत्यादि… उसमें अपने से बड़ों को देखो। इस प्रकार एक-एक दोष पर विजय प्राप्त करने के अलग-अलग उपाय हैं लेकिन यदि मनुष्य इन सब दोषों को एक साथ जीतना चाहता हो तो उसका एकमात्र उत्तम उपाय है कि वह सच्चे सदगुरु में भक्तिभाव करे।”

एतत्सर्वं गुरोर्भक्त्या…..

पत्थर को भगवान मानना बड़ा आसान है क्योंकि पत्थर की मूर्ति तुम्हें टोकती नहीं है परन्तु भगवान के अवतारस्वरूप संत को, गुरु को भगवान मानना बड़ा कठिन है क्योंकि,

सदगुरु मेरा शूरमा, करे शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

लाखों-करोड़ों व्यापारी मिल जायेंगे, लाखों-लाखों पंडित मिल जायेंगे, सैंकड़ों-हजारों गुरु मिल जायेंगे परंतु सदगुरु तो कभी-कभी, कहीं-कहीं मिलते हैं और ऐसे सदगुरु की शरण में जाकर पूर्ण श्रद्धा रखने वाले कोई-कोई विरले होते हैं।

सदगुरु के पास जाने वालों में भी शुरु-शुरु में तो इतनी श्रद्धा नहीं होती, ऊपर-ऊपर से थोड़ा फायदा उठाकर मन से ही गुरु मान लेते हैं। फिर कभी भाग्य जोर पकड़ता है तब गुरु से दीक्षा लेते हैं। बाद में भी कभी अपने मन के विरूद्ध बात दिखाई दी तो कहते हैं किः ʹगुरु जी को ऐसा नहीं करना चाहिए…. वैसा नहीं करना चाहिए….ʹ गुरु एक और शिष्य अनेक। लाखों शिष्यों के लाखों मन, उनकी लाखों कल्पनाएँ होती हैं। सब सोचते हैं- ʹगुरु को ऐसा करना चाहिए…. वैसा करना चाहिए….ʹ मानों, हम अपने-अपने ढाँचे में गुरु को ढालना चाहते हैं अथवा देखना चाहते हैं।

शिष्य नश्वर देह को ʹमैंʹ मानता है और जगत को सत्य मानता है जबकि सदगुरु न देह को अपना मानते हैं न ही जगत को सत्य। ऐसा भी नहीं है कि गुरु एक हैं तो सब शिष्य भी एक-से होते हैं। उनमें से भी कोई नर्क से आया है तो कोई स्वर्ग से आया है। सबके संस्कार अलग-अलग होते हैं, विचार अलग-अलग होते हैं।

उनमें आपसी मतभेद रहता है, मत-मतांतर रहता है। घर में छः लोग होते हैं तब भी मत-मतांतर होते हैं तो लाखों शिष्यों के बीच मत-मतांतर रहे यह स्वाभाविक ही है।

वे सब अपनी-अपनी मति से गुरु को तौलते रहते हैं, गुरु के व्यवहार को मापते रहते हैं। इन सबको सहते हुए, सँभालते हुए, समझाते हुए जो अपने पथ पर चलते हैं और लाखों लोगों को भी ले जाते हैं यह किसी साधारण व्यक्ति का काम नहीं है। हाँ-हाँ सबकी करना किन्तु अपनी गली न भूलना…. अपने-आप में डटे रहना यह कोई मजाक की बात नहीं है।

घर में दो-तीन बच्चों के होने पर ही माँ-बाप परेशान हो जाते हैं और तंग आकर उनकी पिटाई कर देते हैं तो जो लाखों-लाखों शिष्यों के हृदयों को एक ही धागे में बाँधकर यात्रा करवाते हैं वे सदगुरु कितने करूणासागर होंगे ! उनमें कितना धैर्य, आत्मबल और सामर्थ्य होगा !! स्नेह की वह रज्जू कितनी मजबूत होगी !!! परहित का हौसला उनका कितना बुलंद होगा !!!!

गुरु धोबी शिष्य कपड़ा, साबुन सर्जनहार।

सुरत शिला पर बैठकर, निकले मैल अपार।।

हम लोगों के जन्म-जन्मांतर के अपने-अपने कर्म हैं। किसी को धन का आकर्षण है तो किसी को सत्ता का, किसी को प्रसिद्धि का आकर्षण है तो किसी को सौन्दर्य का, किसी की कोई वासना है तो किसी की कोई मान्यता…  न जाने कितना-कितना कचरा भरा पड़ा है ! ऐसे लोगों की कितनी जिम्मेदारी उठानी पड़ती है गुरु को ! ऐसे शिष्यों के कल्याण के लिए भी गुरु अगर तैयार रहते हैं तो उनके हृदय की कितनी विशालता होगी ! उनका हृदय कितने स्नेह से भरा होगा !!

गुरु का स्नेह और उनकी करुणा न हो तो एक भी शिष्य टिक नहीं सकता क्योंकि शिष्य नश्वर देह में जीता है। उसे जो दिखता है उससे गुरु को बिल्कुल निराला दिखता है। फिर भी गुरु-शिष्य का संबंध बना रहता है तो गुरु की करुणा और शिष्य की श्रद्धा की डोर से ही।

शिष्य जगत को सत्य मानता है, देह को ʹमैंʹ मानता है और भगवान को कहीं और मानता है जबकि सदगुरु जगत को मिथ्या जानते हैं, देह को नश्वर मानते हैं और भगवान को अपने से तनिक भी दूर नहीं मानते। दोनों की समझ बिल्कुल भिन्न है। गुरु का अनुभव और शिष्य की मान्यता दोनों में पूर्व-पश्चिम का संबंध है। फिर भी गुरु-शिष्य परंपरा चली आ रही है क्योंकि शिष्य की थोड़ी पुण्याई से और गुरुमंत्र के प्रभाव से श्रद्धा का धागा टूटते-टूटते फिर सँध जाता है और सदगुरु उसे माफ कर अपना लेते हैं जिससे शिष्य पतन की खाई में गिरने से बच जाता है।

रामकृष्ण परमहंस जैसे सदगुरु में नरेन्द्र (स्वामी विवेकानन्द) जैसे शिष्य की भी श्रद्धा एक बार, दो बार, चार बार क्या सात-सात बार अश्रद्धा में बदल गयी थी लेकिन कुछ शिष्य के पुरुषार्थ से औऱ कुछ सदगुरु की कृपा से गुरु-शिष्य का नाता बना रहा और आखिर में काम बन गया।

श्रीवशिष्ठजी महाराज कहते हैं- “हे राम जी ! जो गुरु में सामर्थ्य चाहिए वह मुझमें है। मुझे अपनी आत्मा हस्तामलकवत् भासती है। जैसे हाथ में आँवला होने पर किसी से पूछना नहीं पड़ता कि हाथ में आँवला है कि नहीं, ऐसे ही मुझे परमात्म तत्त्व का अनुभव हो गया है। ऐसा मेरा कोई शिष्य नहीं है जिसको मैंने आनंदित न किया हो। मैं समर्थ गुरु हूँ और तुम भी सत्पात्र शिष्य हो। शिष्य में जो सदगुण होने चाहिए-संयम, सदाचार, तत्परता औऱ गुरुभक्ति वह तुममें है और गुरु में जो सामर्थ्य होने चाहिए-ब्रह्मानिष्ठा, करूणा और अहैतुकी कृपा बरसाने का भाव वह मुझमें है। हे राम जी ! काम बन जायेगा।”

सदगुरु का पद बहुत ही जिम्मेदारी का पद है। स्वामी विवेकानंद कहते थे किः “संसार के दलदल में पड़े रहने वालों की अपेक्षा ईमानदारी से भगवान के रास्ते पर चलने वाले की स्थिति ऊँची है। उससे भी ऊँची है भगवदस्वरूप की जिज्ञासा… तत्त्वरूप से भगवान में और हमारे में क्या भेद है इसकी जिज्ञासा। उससे भी दुर्लभ है भगवद्-तत्त्व का ज्ञान होना, भगवद्-साक्षात्कार होना। इससे भी अत्यन्त ऊँची एवं दुर्लभ स्थिति है एकान्त में जीवन्मुक्त होकर रहना। इससे भी विलक्षण व आश्चर्यकारक बात तो यह है कि ब्राह्मी स्थिति की ऊँचाइयों की तरफ अग्रसर होने के लिए प्रोत्साहित करना, ले जाना। ईश्वर-प्राप्ति, जीवन्मुक्ति प्राप्त करने से भी यह विलक्षण विशालता करुणा दुर्लभ है… अत्यन्त कठिन आश्चर्यमयी है। ऐसे पुरुष धरती पर कभी-कभार, कहीं-कहीं होते हैं।”

धन्य हैं ऐसे सदगुरुओं को, जो अपनी आत्मानंद की मस्ती छोड़कर संसार में भटकते हुए जीवों का उद्धार करने में लगे हैं !

सृष्टि बनाने का और प्रलय करने का सामर्थ्य  आ जाये फिर भी सदगुरु की कृपा के बिना देह की परिच्छिन्नता नहीं मिटती। अंतःकरण में परिच्छिन्न चैतन्य औऱ व्यापक चैतन्य की अभिन्नता का अनुभव जब तक नहीं होता तब तक हमारा काम अधूरा ही रहता है।

गुरु बिनु भव निधि तरइ न कोई।

जों विरंचि संकर सम होई।।

(श्रीरामचरित. उत्तर. 92.3)

ज्यों-ज्यों शिष्य भीतर से समर्पित होता जाता है, त्यों-त्यों गुरुकृपा, ईश्वरकृपा उसके हृदय में विशेष रूप के उतरती जाती है। शिष्य जितने-जितने अहोभाव से गुरु को याद करता है, उतना-उतना उसके हृदय का कब्जा गुरु लेते जाते हैं और शिष्य शहंशाह होता जाता है। बीज जितना मिटता है वृक्ष उतना ही पनपता है। ऐसे ही जीवन में जीवत्व जितना मिटता है उतना ही अंदर का शिवत्व प्रगट होने लगता है।

बारिश के दिन में कोई भीगता हुआ हमारे दरवाजे पर आकर कहे किः ʹभाई ! दरवाजा खोलिये।ʹ ….तो हम उसे अपने घर में आश्रय देते हैं। वह आदमी पहले खड़ा रहता है…. फिर धीरे से बैठ जाता है.. कुछ देर के बाद पैर पसारता है… फिर तकिया लेकर आराम करने लगता है। फिर जब उससे कहा जाये किः ʹअब जाइये।ʹ तब वह कहे किः ʹमैं क्यों जाऊँ ? यह घर तो मेरा है।ʹ ऐसे ही गुरुदीक्षा के द्वारा गुरुकृपा किसी कोने में बैठ जाती है। फिर धीरे-धीरे अपने पैर पसारती है और हमारे अहं को कान पकड़कर बाहर निकाल देती है।

घर के मालिक के लिए अपने एक किरायेदार को घर से निकालना आसान नहीं है तो जन्म-जन्मांतरों के संस्कार से बने शरीररूपी घर से अहं को निकालना यह कोई मजाक की बात है क्या ? ….किन्तु सदगुरु अपने शिष्य के अहं को निकालने के लिए बड़ा परिश्रम करते हैं क्योंकि वे उसे परम तत्त्व का दीदार कराना चाहते हैं और परम तत्त्व का साक्षात्कार अहं के मिटे बिना नहीं हो सकता।

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहीं।

प्रेम गली अति सांकरी, ता में दो न समाहीं।।

कैसी करूणा है उन सदगुरुओं की ! आज गुरूपूर्णिमा के पावन पर्व पर हम उन सभी सदगुरुओं को प्रणाम करते हैं…. नमन करते हैं !

हम व्यास भगवान को प्रणाम करते हैं ! तमाम शरीरों में साकार रूपों में जो आये हैं, आ गये हैं और आयेंगे उन सभी ब्रह्मज्ञानियों को इस व्यासपूर्णिमा के पर्व पर हम फिर-फिर से नमन करते हैं !

भगवान चाहे पत्ते के रूप में हो चाहे व्यासजी के रूप में, चाहे वल्लभाचार्य के रूप में हों या रामानुजाचार्य के रूप में, चाहे आद्य शंकराचार्य के रूप में हों या पतंजलि महाराज के रूप में, और भी अनेक महापुरुषों के रूप में हों, जिनके हृदय में भगवान प्रकट हुए हैं ऐसे सभी ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों को हमारा बार-बार प्रणाम है ! हमारे साधकों के अंतःकरण पर उन सभी की कृपा जल्दी-से-जल्दी बरसे और सारे दोष निकालकर निर्दोष नारायण की लहरें उछलने लगें, ऐसी आसाराम की भावना है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2000, पृष्ठ संख्या 3-5 अंक 91

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शरीर स्वास्थ्य


स्वास्थ्योपयोगी कुछ बातें

तुतलानाः सोते समय दाल के दाने के बराबर फिटकरी का टुकड़ा मुँह में रखकर सोयें। ऐसा नित्य करते रहने से तुतलाना ठीक हो जाता है।

मिरगीः 1. दस ग्राम हींग ताबीज की तरह कपड़े में सी कर गले में पहनने से मिरगी का दौरा रूक जाता है। 2. भुनी हुई हींग, सौंठ, काली मिर्च, पीपल, काला नमक समान मात्रा में पीसकर एक कप पेठे के रस मे इसका एक चम्मच चूर्ण मिलाकर नित्य पीते रहने से मिरगी का दौरा आना बंद हो जाता है। 3. रेशम के धागे में 21 जायफल पिरोकर गले में पहनने से भी मिरगी में लाभ होता है।

मधुमेहः 15 बिल्वपत्र (जो शिवजी को चढ़ते हैं) और 5 काली मिर्च पीसकर चटनी बना लें। उसे एक कप पानी में घोलकर पीने से मधुमेह (पेशाब और रक्त में शक्कर आना) ठीक हो जाता है। इसे लम्बे समय तक एक-दो साल लेने से मधुमेह स्थायी रुप से ठीक हो जाता है।

दूध कैसे पियें- दूध के झाग बहुत लाभदायक होते हैं। इसलिए जब भी दूध पियें, उसे खूब उलट-पुलटकर, बिलोकर, झाग पैदा करके पियें। झागों का स्वाद लेकर चूसें। जितने ही ज्यादा झाग दूध में होंगे, वह दूध उतना ही लाभदायक होगा।

गठियाः छाछ में समान मात्रा 4 में पिसी हुई सौंठ, जीरा, काली मिर्च, अजवायन, काला तथा सेंधा नमक मिलाकर एक-एक गिलास छाछ दिन में तीन बार नित्य पियें। गठिया ठीक हो जायेगी।

दीर्घायुः यदि आप लंबी जिन्दगी जीना चाहते हैं तो छोटी हर्र (हरड़े) रात को पानी में भिगो दें। पानी इतना ही डालें कि ये सोख लें। प्रातः उनको देशी घी में तलकर काँच के बर्तन में रख लें। नित्य एक-एक हरड़ सुबह शाम दो माह तक खाते रहें। शरीर हृष्ट पुष्ट होगा।

लू, गरमी से बचने के लिए रोजाना शहतूत खायें। पेट, गुर्दे और पेशाब की जलन शहतूत खाने से दूर होती है। आँतों के घाव और यकृत ठीक होते हैं। नित्य शहतूत खाते रहने से मस्तिष्क को ताकत मिलती है।

देशी घी में पान का पत्ता डालकर गर्म करें। फिर छान लें। ऐसा घी बहुत दिनों तक अच्छा रहता है।

हर्र-हरीतकी- Chebullic Myrobalan

सेवन विधिः हर्र चबाकर खाने से भूख बढ़ती है। पीसकर इसकी फंकी लेने से मल साफ आता है। सेंककर खाने से त्रिदोषों को नष्ट करती है। पौष्टिक और शक्तिवर्धक रूप में खाना खाते समय खायें। जुकाम, फ्लू, पाचनशक्ति ठीक करने के लिए भोजन करने के बाद सेवन करें। मात्राः 3 से 4 ग्राम।

सावधानीः गर्म प्रकृतिवाले, गर्भवती स्त्रियाँ, दुर्बल व्यक्ति सावधानी से इसका सेवन करें। जरा भी हानि प्रतीत होने लगे तो सेवन तुरंत बंद कर दें।

घंट की ध्वनि का औषध-प्रयोग

सर्पदंश में- अफ्रीका निवासी घंटा बजाकर जहरीले साँप की चिकित्सा करते हैं।

क्षय में- मास्को सैनीटोरियम में घंटा की ध्वनि से क्षय ठीक करने का सफल प्रयोग चल रहा। घंटा ध्वनि से क्षयरोग ठीक होता है। इससे अन्य कई शारीरिक कष्ट दूर होते हैं।

प्रसव में- अभी बजा हुआ घंटा आप पानी से धो डालिये और उस पानी को उस स्त्री को पिला दीजिये जिस स्त्री को अत्यन्त प्रसव वेदना हो रही हो और प्रसव न होता हो। फिर देखिये, एक घंटे के अंदर ही सारी आपत्तियों को हटाकर सफलता पूर्वक प्रसव हो जाता है।

(सत्पुरुषों के वचनामृत से संकलित)

चॉकलेट का अधिक सेवन हृदयरोग का देता है आमंत्रण

आज विज्ञापन तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ यह तय करती हैं कि हमें क्या खाना चाहिए, किस तरह जीना चाहिए। ʹफास्ट फूडʹ, ठण्डे पेय तथा चॉकलेट आदि अनावश्यक वस्तुएँ खाद्य पदार्थों के नाम पर लोकप्रिय होते जा रहे हैं।

क्या आप जानते हैं कि चॉकलेट में कई ऐसी चीजें भी हैं जो शरीर को धीरे-धीरे रोगी बना सकती हैं ? प्राप्त जानकारी के अनुसार चॉकलेट का सेवन मधुमेह एवं हृदयरोग को उत्पन्न होने में सहाय करता है तथा शारीरिक चुस्ती को भी कमजोर कर देता है। यदि यह कह दिया जाय कि चॉकलेट एक मीठा जहर है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

कुछ चॉकलेटों में ʹइथाइल एमीनʹ नामक कार्बोनिक यौगिक होता है जो शरीर में पहुँचकर रक्तवाहिनियों की आतंरिक सतह पर स्थित तंत्रिकाओं को उद्दीप्त करता है। इससे हृदयजन्य रोग पैदा होते हैं।

हृदयरोग विशेषज्ञों का मानना है कि चॉकलेट के सेवन से तंत्रिका कोषों पर जो उद्दीपन होता है उससे डी.एन.ए. जीन्स सक्रिय होते हैं जिससे हृदय की धड़कने बढ़ जाती हैं। चॉकलेट के माध्यम से शरीर में प्रवेश करने वाले रसायन पूरी तरह पच जाने तक अपना दुष्प्रभाव छोड़ते रहते हैं। अधिकांश चॉकलेटों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाली निकिल धातु हृदयरोगों को बढ़ाती है।

इसके अलावा चॉकलेट के अधिक प्रयोग से दाँतों में कीड़ा लगना, पायरिया, दाँतों का टेढ़ा होना, मुख में छाले होना, स्वरभंग, गले में सूजन व जलन, पेट में कीड़े, मूत्र में जलन आदि अऩेक रोग पैदा हो जाते हैं।

वैसे भी शरीर-स्वास्थ्य एवं आहार के नियमों के आधार पर किसी व्यक्ति को चॉकलेट की आवश्यकता नहीं है। यह एक अनावश्यक वस्तु है जिसे धन बटोरने वाली कंपनियाँ आकर्षक विज्ञापनों द्वारा आवश्यक वस्तु की तरह प्रदर्शित करके जनता को मूर्ख बनाती हैं। अतः अपने शरीर को निरोग रखने के इच्छुक लोगों को अपने पसीने की कमाई का दुरुपयोग न करके चॉकलेट जैसी अनावश्यक तथा बीमारियाँ पैदा करने वाली वस्तुओं का दूर से ही त्याग कर देना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 90

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महात्मा गाँधी की नजर में ईसाई मिशनरियाँ


लेखकः डॉ. कमल किशोर गोयनका

ईसाई मिशनरियों का विचार था कि गाँधी को ईसाई बना लिया जाय तो भारत को ईसाई देश बनाना बहुत आसान हो जायेगा।

दक्षिण अफ्रीका में कई बार ऐसे प्रयत्न हुए और भारत आने पर कई पादरियों, ईसाई मिशनरियों तथात 80 वर्ष के ए.डब्ल्यू बेकर, 86 वर्ष की एमिली किनेर्डके जैसे अनेक ईसाइयों ने उऩ्हें ईसाई बनाने के लिए प्रेरित किया और यहाँ तक कहा किः ʹयदि आपने ईसा मसीह को स्वीकार नहीं किया तो आपका उद्धार नहीं होगा।ʹ

(ʹहरिजनःʹ 4 अगस्त 1940)

गाँधी जी ईसा मसीह और उनके जीवन तथा ʹबाइबिलʹ एवं ईसाई सिद्धान्तों की परम्परागत ईसाई व्याख्या को अस्वीकार करते हुए अपनी व्याख्या प्रस्तुत करते थे। उन्होंने 16 जून, 1927 को डबल्यू. बी. स्टोवर को पत्र में लिखा भी था किः “मैं बाईबिलʹʹ या ʹईसाʹ के जीवन की परम्परागत व्याख्या को स्वीकार नहीं करता हूँ।”

गाँधी जी ने प्रमुख रूप से ईसा के ʹदेवत्वʹ तथा ʹअवतारʹ स्वरूप का खंडन किया।

उन्होंने आर.ए.ह्यूम को 13 फरवरी, 1926 को पत्र में लिखाः “मैं ईसा मसीह को ईश्वर का एकमात्र पुत्र या ईश्वर का अवतार नहीं मानता, लेकिन मानव जाति के एक शिक्षक के रूप में उनके प्रति मेरी बड़ी श्रद्धा है।”

गाँधी जी ने अनेक बार कहा और लिखा कि वे ईसा को अन्य महात्माओं और शिक्षकों की तरह ʹमानव प्राणीʹ ही मानते हैं। ऐसे शिक्षक के रूप में वे ʹमहान्ʹ थे परन्तु ʹमहानतम्ʹ नहीं थे। (गाँधी वाङमयः खंड 34, पृष्ठ 11)

गाँधी जी ने ईसा का ईश्वर का एकमात्र पुत्रʹ होने की ईसाई धारणा का भी खंडन किया और 4 अगस्त 1940 को हरिजन में लिखाः “वे ईश्वर के एक पुत्र भर थे, चाहे हम सबसे कितने ही पवित्र क्यों न रहे हों। परन्तु हम में से हर एक ईश्वर का पुत्र है और हर कोई वही काम करने की क्षमता रखता है जो ईसा मसीह ने कर दिखाया था, बशर्ते कि हम अपने भीतर विद्यमान दिव्यत्व को व्यक्त करने की कोशिश करें।” इसके साथ गाँधी जी ने ईसा के चमत्कारों का सतर्क भाषा में खंडन किया।

महात्मा गाँधी ने ईसाई अंधविश्वासों का अनेक रूपों में खंडन किया। ʹईसा मुक्ति के लिए आवश्यक है….ʹ उनकी इस मान्यता का उन्होंने अस्वीकार किया।

(11 दिसम्बर, 1927 का पत्र)

उन्होंने ईसा द्वारा सारे पापों को घी डालने की बात का भी सतर्क खंडन किया।

(यंग इंडियाः 22 दिसम्बर, 1927)

गाँधी जी ने यह भी अस्वीकार किया कि ʹधर्मांतरण ईश्वरीय कार्य है।ʹ उन्होंने ए.ए. पॉल को उत्तर देते हुए ʹहरिजनʹ के 28 दिसम्बर, 1935 के अंक में लिखा कि ईसाई धर्म  प्रचारकों का यह कहना कि ʹवे लोगों को ईश्वर के पक्ष में खींच रहे हैं और ईश्वरीय कार्य कर रहे हैं…ʹ तो मनुष्य ने यह कार्य उसके हाथों से क्यों ले लिया है ? ईश्वर से कोई कार्य छीनने वाला मनुष्य कौन होता है तथा क्या सर्वशक्तिमान् ईश्वर इतना असहाय है कि वह मनुष्यों को अपनी ओर नहीं खींच सकता ?

(गाँधी वाङमयः खंड 61, पृष्ठ 87 तथा 494)

गाँधी जी ने लंदन में 8 अक्टूबर, 1931 को ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की मिशनरी संस्थाओं के सम्मेलन में ईसाइयों के सम्मुख कहा कि ʹगॉड के रूप में ईश्वर की, जो सबका पिता है, पूजा करना मेरे लिए उचित नहीं होगा। यह नाम मुझ पर कोई प्रभाव नहीं डालता, पर जब मैं ईश्वर को राम के रूप में सोचता हूँ तो वह मुझे पुलकित कर देता है। ईश्वर को गॉड के रूप में सोचने से मुझमें वह भावावेश नहीं आता जो ʹरामʹ के नाम से आता है। उसमें कितनी कविता है ! मैं जानता हूँ कि मेरे पूर्वजों ने उसे ʹरामʹ के रूप में ही जाना है। वे राम के द्वारा ही ऊपर उठे हैं और मैं जब राम का नाम लेता हूँ तो उसी शक्ति से ऊपर उठता हूँ। मेरे लिए गॉड नाम का प्रयोग, जैसा कि वह बाइबिल में प्रयुक्त हुआ है, सम्भव नहीं होगा। उसके द्वारा सत्य की और मेरा उठना मुझे सम्भव नहीं लगता। इसलिए मेरी समूची आत्मा आपकी इस शिक्षा को अस्वीकार करती है कि ʹरामʹ मेरा ईश्वर नहीं है।ʹ

(गाँधी वाङमयः खंड 48, पृष्ठ 141)

महात्मा गाँधी ने 2 मई, 1933 को पं. जवाहरलाल नेहरू को पत्र में लिखाः “हिन्दुत्व के द्वारा मैं ईसाई, इस्लाम और कई दूसरे धर्मों से प्रेम करता हूँ। यह छीन लिया जाये तो मेरे पास रह ही क्या जाता है ?” …..और इसीलिए वे हिन्दू धर्म की रक्षा करना चाहते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं किः “हिन्दू धर्म की सेवा और हिन्दू धर्म की रक्षा को छोड़कर मेरी कोई दूसरी प्रवृत्ति ही नहीं है।”

(गाँधी वाङमयः खंड 37, पृष्ठ 100)

गाँधी जी एक और तर्क देते हैं। वे कहते हैं किः “धर्म ऐसी वस्तु नहीं जो वस्त्र की तरह अपनी सुविधा के लिए बदला जा सके। धर्म के लिए तो मनुष्य विवाह, घर-संसार तथा देश तक को छोड़ देता है।”

(मणिलाल गाँधी को लिखे पत्र से, 3 अप्रैल 1926)

ईसाई मिशनरियों का यह तर्क था कि वे भारत को शिक्षित, संस्कारी तथा धार्मिक बनाना चाहते हैं, तो गाँधी जी ने इन मिशनरियों से कहा किः “जो भारतवर्ष का धर्मपरिवर्तन करना चाहते हैं, उनसे यही कहा जा सकता है किः हकीमजी पहले अपना इलाज कीजिये न ?”

(ʹयंग इंडियाःʹ 23 अप्रैल, 1931)

गाँधी जी आगे कहते हैं किः “भारत को कुछ सिखाने से पहले यहाँ से कुछ सीखना, कुछ ग्रहण करना होगा।”

(ʹयंग इंडियाʹ 11 अगस्त, 1927)

ʹक्या मनुष्य का धर्मान्तरण हो सकता है ?ʹ महात्मा गाँधी ने अनेक बार इस प्रश्न का भी उत्तर दिया था। उनका मत था कि यह सम्भव नहीं है, क्योंकि कोई भी पादरी या धर्म प्रचारक नये अनुयायी को यह कैसे बतलायेगा कि ʹबाइबिलʹ का वह अर्थ ले जो वह स्वयं लेता है ? कोई भी पादरी या मिशनरी ʹबाइबिलʹ से जो प्रकाश स्वयं लेता है, उसे किसी भी दूसरे मनुष्य के हृदय में शब्दों के द्वारा उतारना सम्भव नहीं है।”

(ʹहरिजनʹ 12 दिसम्बर, 1936)

गाँधी जी कई बार नये बने ईसाइयों की दुश्चरित्रता तथा मिशनरियों के कुकृत्यों का उल्लेख करते हैं। वे अपनी युवावस्था की एक घटना की चर्चा करते हुए कहते हैं-

“मुझे याद है, जब मैं नौजवान था उस समय एक हिन्दू ईसाई बन गया था। शहर भर जानता था कि नवीन धर्म में दीक्षित होने के बाद वह संस्कारी हिन्दू ईसा के नाम पर शराब पीने लगा, गोमांस खाने लगा और उसने अपना भारतीय लिबास छोड़ दिया। आगे चलकर मुझे मालूम हुआ, मेरे अनेक मिशनरी मित्र तो यही कहते हैं कि अपने धर्म को छोड़ने वाला ऐसा व्यक्ति बन्धन से छूटकर मुक्ति और दारिद्रय से  छूटकर समृद्धि प्राप्त करता है।”

(यंग इंडियाः 20 अगस्त, 1925)

“अभी कुछ दिन हुए, एक मिशनरी एक दुर्भिक्षपीड़ित अंचल में पैसा लेकर पहुँच गया। अकाल पीड़ितों को उसने पैसा बाँटा, उन्हें ईसाई बनाया, फिर उनका मंदिर हथिया लिया और उसे तुड़वा डाला। यह अत्याचार नहीं तो क्या है ? जिन हिन्दुओं ने ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया था, उनका अधिकार तो उस मंदिर पर नहीं रहा था और ईसाई मिशनरी का भी उस पर कोई हक नहीं था, पर वह मिशनरी वहाँ पहुँचता है और जो कुछ ही समय पहले यह मानते थे कि उस मंदिर में ईश्वर का वास है, उन्हीं के हाथ से उसे तुड़वा डालता है।”

(गाँधी वाङमयः खंड 61, पृष्ठ 49)

गाँधी जी ईसाई धर्म के एक और ʹव्यंग्य चित्रʹ की ओर मिशनरियों का ध्यान आकर्षित करते हैं कि यदि मिशनरियों की संख्या बढ़ती है तो हरिजनों में आपस में ही लड़ाई-झगड़े और खून खराबे की घटनाएँ बढ़ेंगी।

गाँधी जी इसी कारण ईसाइयों के धर्मान्तरण को ʹअशोभनʹ, ʹदूषितʹ, ʹहानिकारकʹ, ʹसंदेह एवं संघर्षपूर्णʹ, ʹअध्यात्मविहीनʹ, ʹभ्रष्ट करने वालाʹ, ʹसामाजिक ढाँचे को तोड़ने वालाʹ तथा ʹप्रलोभनों से पूर्णʹ कहते हैं। गाँधी जी का सम्पूर्ण वाङमय पढ़ जायें, ऐसी ही कटु आलोचनाओं से भरा पड़ा है।

गाँधी जी ने ईसाई मिशनरियों द्वारा चिकित्सा एवं शिक्षा के क्षेत्र में किये गये कार्यों की कई बार प्रशंसा भी की, किन्तु उन्होंने इसके मूल में विद्यमान प्रलोभनों तथा उनके धर्म परिवर्तन के उद्देश्य पर गहरी चोट करते हुए एक मिशनरी से कहाः “जब तक आप अपनी शिक्षा और चिकित्सा संस्थानों से धर्मपरिवर्तन के पहलू को हटा नहीं देते, तब तक उनका मूल्य ही क्या है ? मिशन स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को ʹबाइबिलʹ की कक्षाओं में भाग लेने को बाध्य क्यों किया जाता है या उनसे इसकी अपेक्षा ही क्यों की जाती है ? यदि उनके लिए ईसा के संदेशों को समझना जरूरी है तो बुद्ध और मुहम्मद के संदेश को समझना जरूरी क्यों नहीं है ? धर्म की शिक्षा के लिए शिक्षा का प्रलोभन क्यों देना चाहिए ?”

(हरिजनः 17 अप्रैल,1937)

चिकित्सा क्षेत्र में गाँधी जी ने ईसाइयों द्वारा कोढ़ियों की सेवा करने की भी तारीफ की, लेकिन यह भी कहा कि “ये सारे रोगियों और सारे सहयोगियों से यह अपेक्षा करते हैं कि वे धर्मपरिवर्तन करके ईसाई बन जायें।”

(हरिजनः 25 फरवरी, 1939)

गाँधी जी इन प्रलोभनों की धर्मनीति से व्याकुल थे। वे जानते थे कि अमेरिका तथा इंग्लैण्ड से ईसाई मिशनरियों के पास खूब धन आता है और उसका उपयोग मूलतः धर्मपरिवर्तन के लिए ही होता है। अतः उन्होंने स्पष्ट कहा कि  “आप ʹईश्वरʹ और ʹअर्थ-पिशाचʹ दोनों की सेवा एक साथ नहीं कर सकते।”

(यंग इंडियाः 8 दिसम्बर 1927)

इसके दस वर्ष के बाद गाँधी जी जॉन आर. मॉट से यही बात कहते हुए बोले कि “मेरा निश्चित मत है कि अमेरिका और इंगलैण्ड मिशनरी संस्थाओं के निमित्त जितना पैसा देता है, उससे लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक हुई है। ईश्वर और धनासुर (मेमन) को एक साथ नहीं साधा जा सकता। मुझे तो ऐसी आशंका है कि भारत की सेवा करने के लिए धनासुर को ही भेजा गया है, ईश्वर पीछे रह गया है। परिणामतः वह एक-न-एक दिन उसका प्रतिशोध अवश्य करेगा।”

(हरिजनः 26 दिसम्बर, 1936)

महात्मा गाँधी राष्ट्रीय और मानवीय दोनों ही दृष्टियों से ईसाई मिशनरियों से अपनी रीति-नीति, आचरण-व्यवहार तथा सिद्धान्त-कल्पनाओं को बदलने तथा विवेक सम्पन्न बनाने का आह्वान करते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि परोपकार का काम करो, धर्मान्तरण बन्द करो।

(हिन्दूः 28 फरवरी, 1916)

गाँधी जी 14 जुलाई 1927 को ʹयंग इंडियाʹ में लिखते हैं कि “मिशनरियों को अपना रवैया बदलना होगा। आज वे लोगों से कहते हैं कि उनके लिए ʹबाइबिलʹ और ईसाई धर्म को छोड़कर मुक्ति का और कोई मार्ग नहीं है। अन्य धर्मों को तुच्छ बताना तथा अपने धर्म को मोक्ष का एकमात्र मार्ग बताना उनकी आम रीति हो गयी है। इस दृष्टिकोण में आमूल परिवर्तन होना चाहिए।”

एक ईसाई मिशनरी से बातचीत में उन्होंने कहाः “अगर मेरे हाथ में सत्ता हो और मैं कानून बना सकूँ तो मैं धर्मांतरण का यह सारा कारोबार ही बन्द करा दूँ। इससे वर्ग-वर्ग के बीच निश्चय ही निरर्थक कलह और मिशनरियों के बीच बेकार का द्वेष बढ़ता है। यों किसी भी राष्ट के लोग सेवाभाव से आयें तो मैं स्वागत करूँगा। हिन्दू कुटुम्बों में मिशनरी के प्रवेश से वेशभूषा, रीति-रिवाज, भाषा और खान-पान तक में परिवर्तन हो गया है और इन सबका नतीजा यह हुआ है कि सुन्दर हरे-भरे कुटुम्ब छिन्न-भिन्न हो गये हैं।”

(हरिजनः 11 मई, 1935)

महात्मा गाँधी जैसे सहिष्णु एवं विवेकी व्यक्ति भी स्वतंत्र भारत में कानून बनाकर ईसाई धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध का प्रस्ताव करते हैं और निःसंकोच अपना संकल्प ईसाइयों के सम्मुख करते हैं।

गाँधी जी के उत्तराधिकारियों जैसे पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि ने उनके विचारों की उपेक्षा की और उसका दुःखद परिणाम आज सामने है। देश के कुछ प्रदेशों में ईसाईकरण ने सुरक्षा और एकता के लिए समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं और अब वे पंजाब, हिमाचल प्रदेश आदि नये स्थानों पर भी गिरिजाघर बनाने जा रहे है। विदेशी धन का प्रवाह पहले से कई गुना बढ़ गया है और ईसाई मिशनरियाँ आक्रामक बनती जा रही हैं।

गाँधी जी ने अपने विवेक, दूरदृष्टि तथा मानव-प्रेम के कारण ईसाइयों के उद्देश्यों को पहचाना था तथा उनके बीच जाकर उन्हें अधार्मिक तथा अमानवीय कार्य करने से रोकने का भी प्रयत्न किया था। उनके इस राष्ट्रीय कार्य को अब हमें क्रियान्वित करना है। ईसाई मिशनरियों को धर्मान्तरण से रोकना होगा। हमारी सरकार को इसे गम्भीरता से लेना चाहिए, अन्यथा गाँधी जी के अनुसार संघर्ष और रक्तपात को रोकना असम्भव हो सकता है।

गाँधी जी की कामना थी कि आदिवासियों (भील जाति) के मंदिर में राम की मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठ हो, ईसा मसीह की नहीं, क्योंकि इससे ही इन जातियों में नये प्राणों का संचार होगा।

(नवजीवनः 18 अप्रैल, 1936)

राष्ट्र के मानवमंदिर में भी स्वदेशी ईश्वर की प्राणप्रतिष्ठा से ही कल्याण हो सकता है और यह ʹहरा-भरा देशʹ छिन्न-भिन्न होने से बचाया जा सकता है।

विशेष सूचनाः कोई भी इस लेख के परचे छपवाकर देश को तोड़ने वालों से भारत देश की रक्षा कर सकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2000, पृष्ठ संख्या 19-21, अंक 90

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