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Sharir Swasthya

उपवास


भारतीय जीवनचर्या में व्रत एवं उपवास का विशेष महत्त्व है। इनका अनुपालन धार्मिक दृष्टि से किया जाता है परन्तु व्रतोपवास करने से शरीर भी स्वस्थ रहता है।

‘उप’ यानी समीप और ‘वास’ यानी रहना। उपवास का सही अर्थ होता है – ब्रह्म, परमात्मा के निकट रहना। उपवास का व्यावहारिक अर्थ है – निराहार रहना। निराहार रहने से भगवद भजन और आत्मचिंतन में मदद मिलती है। वृत्ति अंतर्मुख होने लगती है। उपवास पुण्यदायी, आमदोषहर, अग्निप्रदीपक, स्फूर्तिदायक तथा इंद्रियों को प्रसन्नता देने वाला माना गया है। अतः यथाकाल, यथाविधि उपवास करके धर्म तथा स्वास्थ्य लाभ करना चाहिए।

आहारं पचति शिखी दोषान् आहारवर्जितः।

अर्थात् पेट की अग्नि आहार को पचाती है और उपवास दोषों को पचाता है। उपवास से पाचन शक्ति बढ़ती है। उपवास काल में रोगी शरीर में नया मल उत्पन्न नहीं होता है और जीवनशक्ति को पुराना मल निकालने का अवसर मिलता है। मल-मूत्र विसर्जन सम्यक होने लगता है, शरीर से हलकापन आता है तथा अतिनिद्रा-तंद्रा का नाश होता है।

उपवास की महत्ता के कारण भारतवर्ष के सनातन धर्मावलम्बी प्रायः एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा या पर्वों पर व्रत किया करते हैं क्योंकि उऩ दिनों सहज ही प्राणों का ऊर्ध्वगमन होता है और जठराग्नि मंद होती है। शरीर-शोधन के लिए चैत्र, श्रावण एवं भाद्रपद महीने अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। नवरात्रियों के नव दिनों में भी व्रत करने का बहुत प्रचलन है। यह अनुभव से जाना गया ह कि एकादशी से पूर्णिमा तथा एकादशी से अमावस्या तक का काल रोग की उग्रता में भी सहायक होता है, क्योंकि जैसे सूर्य एवं चन्द्रमा के परिभ्रमण के परिणामस्वरूप समुद्र में उक्त तिथियों के दिनों में विशेष उतार-चढ़ाव होता है उसी प्रकार उक्त क्रिया के परिणामस्वरूप हमारे शरीर में रोगों की वृद्धि होती है। इसीलिए इन चार तिथियों में उपवास का विशेष महत्त्व है।

रोगों में लाभकारीः आयुर्वेद की दृष्टि से शारीरिक एवं मानसिक रोगों में उपवास का विधान हितकारी माना गया है।

शारीरिक विकारः अजीर्ण, उल्टी, मंदाग्नि, शरीर में भारीपन, सिरदर्द, बुखार, यकृत-विकार, श्वासरोग, मोटापा, संधिवात, सम्पूर्ण शरीर में सूजन, खाँसी, दस्त  लगना, कब्जियत, पेटदर्द, मुँह में छाले, चमड़ी के रोग, किडनी के विकार, पक्षाघात आदि व्याधियों में छोटे या बड़े रूप में रोग के अनुसार उपवास करना लाभकारी होता है।

मानसिक विकारः मन  पर भी उपवास का बहुमुखी प्रभाव पड़ता है। उपवास से चित्त की वृत्तियाँ रुकती हैं और मनुष्य जब अपनी चित्त की वृत्तियों को रोकने लग जाता है, तब देह के रहते हुए भी सुख-दुःख, हर्ष-विषाद पैदा नहीं होते। उपवास से सात्त्विक भाव बढ़ता है, राजस और तामस भाव का नाश होने लगता है, मनोबल तथा आत्मबल में वृद्धि होने लगती है। अतः अतिनिद्रा, तन्द्रा, उन्माद (पागलपन), बेचैनी, घबराहट, भयभीत या शोकातुर रहना, मन की दीनता, अप्रसन्नता, दुःख, क्रोध, शोक, ईर्ष्या आदि मानसिक रोगों में औषधोपचार सफल न होने पर उपवास विशेष लाभ देता है। इतना ही नहीं अपितु नियमित उपवास के द्वारा मानसिक विकारों की उत्पत्ति भी रोकी जा सकती है।

उपवास पद्धतिः पहले जो शक्ति खाना हजम करने में लगती थी उपवास के दिनों में वह विचातीय द्रव्यों के निष्कासन में लग जाती है। इस शारीरिक ऊर्जा का उपयोग केवल शरीर की सफाई के लिए ही हो इसलिए इन दिनों में पूर्ण विश्राम लेना चाहिए। मौन रह सके तो उत्तम। उपवास में हमेशा पहले एक-दो दिन ही कठिन लगते हैं। कड़क उपवास एक दो बार ही कठिन लगता है फिर तो मन और शरीर दोनों की औपचारिक स्थिति का अभ्यास हो जाता है और उसमें आनन्द आने लगता है।

सामान्यतः तीन प्रकार के उपवास प्रचलित हैं- निराहार, फलाहार, दुग्धाहार।

निराहारः निराहार व्रत श्रेष्ठ है। यह दो प्रकार का होता है-निर्जल एवं सजल। निर्जल व्रत में पानी का भी सेवन नहीं किया जाता। सजल व्रत में गुनगुना पानी अथवा गुनगुने पानी में नींबू का रस मिलाकर ले सकते हैं। इससे पेट में गैस नहीं बन पाती। ऐसा उपवास दो या तीन दिन रख सकते हैं। अधिक करना हो तो चिकित्सक की देख-रेख में ही करना चाहिए। शरीर में कहीं भी दर्द हो तो नींबू का सेवन न करें।

फलाहारः इसमें केवल फल और फलों के रस पर ही निर्वाह किया जाता है। उपवास के लिए अनार, अंगूर, सेवफल और पपीता ठीक हैं। इसके साथ गुनगुने पानी में नींबू का रस मिलाकर ले सकते हैं। नींबू से पाचन तंत्र की सफाई में सहायता मिलती है। ऐसा उपवास 6-7 दिन से ज्यादा नहीं करना चाहिए।

दुग्धाहारः ऐसे उपवास में दिन में 3 से 8 बार मलाई विहीन दूध 250 से 500 मि.ली. मात्रा में लिया जाता है। गाय का दूध उत्तम आहार है। मनुष्य को स्वस्थ व दीर्घजीवी बनाने वाला गाय के दूध जैसा दूसरा कोई श्रेष्ठ पदार्थ नहीं है।

गाय का दूध जीर्णज्वर, ग्रहणी, पांडुरोग, यकृत के रोग, प्लीहा के रोग, दाह, हृदयरोग, रक्तपित्त आदि में श्रेष्ठ है। श्वास, टी.बी. तथा पुरानी सर्दी के लिए बकरी का दूध उत्तम है।

रूढ़िगत उपवासः 24 घण्टों में एक बार सादा, हल्का, नमक, चीनी व चिकनाई रहति भोजन करें। इस एक बार के भोजन के अतिरिक्त किसी भी पदार्थ के सेवन न करें। केवल सादा पानी अथवा गुनगुने पानी में नींबू ले सकते हैं।

सावधानीः जिन लोगों को हमेशा कफ, जुकाम, दमा, सूजन, जोड़ों में दर्द, निम्न रक्तचाप रहता हो वो नींबू के रस का उपयोग न करें।

उपरोक्त उपवासों में केवल एक बात का ही ध्यान रखना आवश्यक है कि मल-मूत्र व पसीने का निष्कासन ठीक तरह होता रहे अन्यथा शरीर के अंगों से निकली हुई गन्दगी फिर से रक्तप्रवाह में मिल सकती है। आवश्यक हो तो एनिमा का प्रयोग करें।

लोग उपवास तो कर लेते हैं, लेकिन उपवास छोड़ने पर क्या खाना चाहिए ? इस पर ध्यान नहीं देते, इसीलिए अधिक लाभ नहीं होता। जितने दिन उपवास करें, उपवास छोड़ने पर उतने ही दिन मूँग का पानी लेना चाहिए तथा उसके दोगुने दिन तक मूँग उबालकर लेना चाहिए। तत्पश्चात खिचड़ी, चावल आदि तथा अंत में सामान्य भोजन करना चाहिए।

उपवास के नाम पर व्रत के दिन आलू, अरबी, सांग, केला, सिंघाड़े आदि का हलवा, खीर, पेड़े, बर्फी आदि गरिष्ठ भोजन भरपेट करने से रोग की वृद्धि ही होती है। अतः इनका सेवन न करें।

सावधानीः गर्भवती स्त्री, क्षय रोगी, अल्सर व मिर्गी(हिस्टीरिया) के रोगियों को व अति कमजोर व्यक्तियों को उपवास नहीं करना चाहिए। मधुमेह (डायबिटीज़) के मरीजों को वैद्यकीय सलाह से ही उपवास करने चाहिए।

शास्त्रों में अग्निहोत्री, तथा ब्रह्मचारी को अनुपवास्य माना गया है।

(साँईं श्री लीलाशाहजी उपचार केन्द्र, सूरत।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2001, पृष्ठ संख्या 27,28 अंक 102

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निद्रा और स्वास्थ्य


जब आँख, कान आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियाँ तथा मन अपने-अपने कार्यों में रत रहने के कारण थक जाते हैं तब नींद स्वाभाविक हो आ जाती है।  जो लोग नियत समय पर सोते और उठते हैं, उनकी शारीरिक शक्ति में ठीक से वृद्धि होती है। पाचकाग्नि प्रदीप्त होती है जिससे शरीर की धातुओं का निर्माण उचित ढंग से होता रहता है। उनका मन दिन भर उत्साह से भरा रहता है जिससे वे अपने सभी कार्य तत्परता से कर सकते हैं।

रात्रि के प्रथम प्रहर में सो जाना और ब्राह्ममुहूर्त में उठना स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हितकर है।

अच्छी नींद के लिए रात्रि का भोजन अल्प तथा सुपाच्य होना चाहिए। सोने से दो घंटे पहले भोजन कर लेना चाहिए। भोजन के बाद स्वच्छ, पवित्र तथा विस्तृत स्थान में अच्छे, अविषम एवं घुटनों तक के ऊँचाई वाले शयनासन पर पूर्व या दक्षिण की ओर सिर करके प्रसन्न मन से ईश्वरचिंतन करते-करते सो जाना चाहिए। शयन से पूर्व प्रार्थना करने मानसिक शांति मिलती है। एवं नसों में शिथिलता उत्पन्न होती है। इससे स्नायविक तथा मानसिक रोगों से बचाव व छुटकारा मिलता है। यह नियम अनिद्रा रोग एवं दुःस्वप्नों से भी बचाता है। यथाकाल निद्रा के सेवन से शरीर पुष्टि होती है तथा बल और उत्साह-चैतन्य की प्राप्ति होती है।

निद्रानाश के कारणः

कुछ कारणों से हमें रात्रि में नींद नहीं आती। कभी-कभी थोड़ी बहुत नींद आ भी गयी तो आँख तुरन्त खुल जाती है। वात-पित्त की वृद्धि होने पर अथवा फेफड़े, सिर, जठर आदि शरीरांगों से कफ का अंश क्षीण होने के कारण वायु की वृद्धि होने पर अथवा अति परिश्रम के कारण थक जाने से अथवा क्रोध, शोक भय से मन व्यथित होने पर नींद नहीं आती या कम आती है।

निद्रानाश के परिणामः

निद्रानाश से बदनदर्द, सिर में भारीपन, जड़ता ग्लानि, भ्रम, अन्न का न पचना एवं वातजन्य रोग पैदा होते हैं।

शंखपुष्पी और जटामांसी का 1 चम्मच सम्मिश्रित चूर्ण सोने से पहले दूध के साथ लेना।

अपने शारीरिक बल से अधिक परिश्रम न करना।

ब्राह्मी, आँवला, भांगरा आदि शीत द्रव्यों से सिद्ध तेल सिर पर लगाना।

शुद्धे शुद्धे महायोगिनी महानिद्रे स्वाहा। इस मंत्र का जप 10 मिनट या अधिक करने स अनिद्रा निवृत्त होगी व नींद अच्छी आयेगी।

रात्रि का जागरण रूक्षताकारक एवं वायुवर्धक होता है। दिन में सोने से कफ बढ़ता है और पाचकाग्नि मंद हो जाती है जिससे अन्न का पाचन ठीक से नहीं होता। इससे पेट की अनेक प्रकार की बीमारियाँ होती हैं तथा त्वचा विकार, मधुमेह, दमा, संधिवात आदि अनेक विकार होने की संभावना होती है। बहुत से व्यक्ति दिन और रात दोनों काल में खूब सोते हैं। इससे शरीर में शिथिलता आ जाती है। शरीर में सूजन, मलावरोध, आलस्य तथा कार्य में निरुत्साह आदि लक्षण उत्पन्न होते हैं।

अतः दिन में सोने वाले सावधान ! मंदाग्नि और कफवृद्धि करके कफजनित रोगों को न बुलाओ। रात की नींद ठीक से लो। दिन मे सोकर स्वास्थ्य बिगाड़ने की आदत बन्द करो-कराओ। नन्हें मासूमों को, रात्रि में जागने वालों को, कमजोर व बिमारों को और जिनको वैद्य बताते हैं उनको दिन में सोने की आवश्यकता हो तो उचित है।

अति निद्रा की चिकित्सा

उपवास अथवा हल्का, सुपाच्य एवं अल्प आहार से नींद अधिक नहीं आती।

सुबह शाम 10-10 प्राणायाम करना भी हितकारी है।

नेत्रों में अंजन करने से तथा आधी चुटकी वचा चूर्ण (घोड़ावज) का नस्य लेने से नींद का आवेग कम होता है। इस प्रयोग से मस्तिष्क में कफ और बुद्धि पर जो तमोगुण का आवरण होता है, वह दूर हो जाता है।

स्वास्थ्य पर विचारों का प्रभाव

विचारों की उत्पत्ति में हमारी दिनचर्या, वातावरण, सामाजिक स्थिति आदि विभिन्न तथ्यों का असर पड़ता है। अतः दैनिक जीवन में विचारों का बड़ा ही महत्त्व होता है। कई बार हम केवल अपने दुर्बल विचारों के कारण रोगग्रस्त हो जाते हैं और कई बार साधारण से रोगी की स्थिति भयंकर रोग की कल्पना से अधिक बिगड़ जाती है और कई बार डाक्टर डरा देते है। कमीशन की लालच व अंधे स्वार्थ में आकर वे बिन जरूरी मशीनों से चेकअप व आपरेशन इंजेक्शनों के घाट उतार देते हैं। यदि हमारे विचार अच्छे हैं, दृढ़ हैं तो हम स्वास्थ्य-संबंधी नियमों का पालन करेंगे और साधारण रोग होने पर योग्य विचारों से ही हम उससे मुक्ति पाने मे समर्थ हो सकेंगे।

सात्त्विक विचारों की उत्पत्ति में सात्त्विक आहार, सत्शास्त्रों का पठन, महात्माओं के जीवन चरित्र का अध्ययन, ईश्वरचिन्तन, भगवन्नाम-स्मरण, योगासन और ब्रह्मचर्य-पालन बड़ी सहायता करते हैं।

श्रीरामचरितमानस में आता हैः

सदगुरु बैद वचन बिस्वासा। संयम यह न विषय के आसा।।

रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।।

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहीं जाहीं।।

सदगुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो। श्रीरघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायें, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते। (श्रीरामचरितमानस. उ.कां. 121.3-4)

वसंत ऋतुचर्या

वसंत ऋतु संधिकाल की ऋतु है। इन दिनों में चर्मरोग, सर्दी, जुकाम, खाँसी, बुखार, सिरदर्द, कृमि आदि रोग होते हैं। इस ऋतु में शीत ऋतु की तरह भारी, खट्टे, ठंडे व मधुर रसवाले पदार्थों का सेवन न करें। आइसक्रीम, ठंडे पेय पदार्थ, मावे से बनी मिठाइयाँ, केले, संतरा आदि कफवर्धक फल न खायें। आँवला, शहद, मूंग, अदरक, परवल, दालचीनी, धानी, चना, मुरमुरा आदि कफनिवारक पदार्थों का सेवन करना चाहिए।

चैत्र मास में नीम के नये पत्ते खाने की बड़ी महिमा है। 14 दिन सुबह 10-15 कोमल पत्ते खूब चबा-चबाकर खाने से या उसका रस निकाल कर पीने से शरीर में रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है तथा चर्मरोग, रक्तविकार, ज्वर और अन्य कफ व पित्तदोष के रोग नहीं होते।

शरीर से जहरीले हानिकारक द्रव्यों को निकालने के लिए इस ऋतु में 2 से 5 ग्राम हरड़ व शहद सममात्रा में नित्य प्रातः लेना चाहिए। इस ऋतु में सूर्योदय से पहले उठना, व्यायाम, दौड़, तेज चलना, रस्सीकूद, प्राणायाम, आसन अधिक हितकारी हैं।

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उपवासः विषय-वासना निवृत्ति का अचूक साधन

अन्न में मादकता होती है। इसमें भी एक प्रकार का नशा होता है। भोजन करने के तत्काल बाद आलस्य के रूप में इस नशे का प्रायः सभी लोग अनुभव करते हैं। पके हुए अन्न के नशे में एक प्रकार की पार्थिव शक्ति निहित होती है, जो पार्थिव शरीर का संयोग पाकर दुगनी हो जाती है। इस शक्ति को शास्त्रकारों ने ‘आधिभौतिक शक्ति’ कहा जाता है।

इस शक्ति की प्रबलता में वह आध्यात्मिक शक्ति जो हम पूजा-उपासना के माध्यम से एकत्र करना चाहते हैं, नष्ट हो जाती है। अतः भारतीय महर्षियों ने सम्पूर्ण आध्यात्मिक अनुष्ठानों में उपवास का प्रथम स्थान रखा है।

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।

गीता के अनुसार उपवास, विषय-वासना से निवृत्ति का अचूक साधन है। खाली पेट को फालतू की ‘मटरगस्ती’ नहीं सूझती। अतः शरीर, इन्द्रियों और मन पर विजय पाने के लिए जितासन और जिताहार होने की परम आवश्यकता है।

आयुर्वेद तथा आज का विज्ञान दोनों का एक ही निष्कर्ष है कि व्रत और उपवासों से जहाँ अनेक शारीरिक व्याधियाँ समूल नष्ट हो जाती हैं, वहाँ मानसिक व्याधियों के शमन का भी यह एक अमोघ उपाय है।

वैज्ञानिक कहते हैं कि सप्ताह में एक दिन तो व्रत रखना ही चाहिए। इससे आमाशय, यकृत एवं पाचनतंत्र को विश्राम मिलता है तथा उनकी स्वतः ही सफाई हो जाती है। इस रासायनिक प्रक्रिया से पाचनतंत्र मजबूत हो जाता है तथा व्यक्ति की आन्तरिक शक्ति के साथ-साथ उसकी आयु भी बढ़ती है।

धन्यवन्तरी आरोग्य केन्द्र, साबरमती, अमदावाद

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गोदुग्ध पृथ्वी का अमृत क्यों ?

भारतीय नस्ल की गाय की रीढ़ में सूर्यकेतु नामक एक विशेष नाड़ी होती है। जब इस नाड़ी पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं तब यह नाड़ी किरणों से सुवर्ण के सूक्ष्म कणों का निर्माण करती है। इसीलिए गाय के दूध, मक्खन तथा घी में पीलापन रहता है। यह पीलापन शरीर में उपस्थित विष को समाप्त अथवा बेअसर करने में लाभदायी सिद्ध होता है। गोदुग्ध का नित्य सेवन दवाओं के दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) से उत्पन्न विष का भी शमन करता है।

गोदुग्ध में प्रोटीन की इकाई ‘अमीनो एसिड’ की प्रचुर मात्रा होने से यह सुपाच्य तथा चर्बी की मात्रा कम होने से ‘कोलेस्ट्रोल’ रहित होता है।

गाय के दूध में उपस्थित ‘सेरीब्रोसाइडस’ मस्तिष्क को ताजा रखने एवं बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए उत्तम टानिक का निर्माण करते हैं।

रूस के वैज्ञानिक गाय के दूध को आण्विक विस्फोट से उत्पन्न विष को शमन करने वाला मानते हैं।

कारनेल विश्विद्यालय में पशुविज्ञान विशेषज्ञ प्रोफेसर रोनाल्ड गोरायटे के अनुसार गाय के दूध में MDGI प्रोटीन होने से शरीर की कोशिकाएँ कैंसरयुक्त होने से बचती हैं।

गोदुग्ध पर अनेक देशों में और भी नये-नये परीक्षण हो रहे हैं तथा सभी परीक्षणों से इसकी नवीन विशेषताएँ प्रगट हो रही हैं। धीरे-धीरे वैज्ञानिकों की समझ में आ रहा है कि भारतीय ऋषियों ने गाय को माता, अवध्य तथा पूजनीय क्यों कहा है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2001, पृष्ठ संख्या 28-30, अंक 99

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रसायन चिकित्सा


रसायन चिकित्सा आयुर्वेद के अष्टांगों में से एक महत्त्वपूर्ण चिकित्सा है। रसायन का सीधा सम्बन्ध धातु के पोषण से है। यह केवल औषध-व्यवस्था न होकर औषधि, आहार-विहार एवं आचार का एक विशिष्ट प्रयोग है जिसका उद्देश्य शरीर में उत्तम धातुपोषण के माध्यम से दीर्घ आयुष्य, रोगप्रतिकारक शक्ति एवं उत्तम बुद्धिशक्ति को उत्पन्न करना है। स्थूल रूप से यह शारीरिक स्वास्थ्य का संवर्धन करता है परन्तु सूक्ष्म रूप से इसका सम्बन्ध मानस स्वास्थ्य से अधिक है। विशेषतः मेध्य रसायन इसके लिए ज्यादा उपयुक्त है। बुद्धिवर्धक प्रभावों के अतिरिक्त इसके निद्राकारक, मनोशांतिकर एवं चिन्ताहर प्रभाव भी होते हैं। अतः इसका उपयोग विशेषकर मानस विकारजन्य शारीरिक व्याधियों में किया जा सकता है।

रसायन सेवन में वय, प्रकृति, सात्म्य, जठराग्नि तथा धातुओं का विचार आवश्यक है। भिन्न-भिन्न वय तथा प्रकृति के लोगों की आवश्यकताएँ भिन्न-भिन्न होने के कारण तदनुसार किये गये प्रयोगों से ही वांछित फल की प्राप्ति होती है।

1 से 10 साल तक के बच्चों को 1 से 2 चुटकी वचाचूर्ण शहद में मिलाकर चटाने से बाल्यावस्था में स्वभावतः बढ़ने वाले कफ का शमन होता है, वाणी स्पष्ट व बुद्धि कुशाग्र होती है।

11 से 20 साल तक किशोरों एवं युवाओं को 2-3 ग्राम बलाचूर्ण 1-1 कप पानी व दूध में उबालकर देने से रस, मांस तथा शुक्रधातु पुष्ट होती है एवं शारीरिक बल की वृद्धि होती है।

21 से 30 साल तक के लोगों को 1 चावल के दाने के बराबर शतपुटी लौहभस्म गोघृत में मिलाकर लेने से रक्तधातु की वृद्धि होती है। इसके साथ 1 चम्मच आँवला चूर्ण सोने से पहले पानी के साथ लेने से नाड़ियों की शुद्धि होकर शरीर में स्फूर्ति व ताजगी का संचार होता है।

31 से 40 साल तक के लोगों को शंखपुष्पी का 10 से 15 मि.ली. रस अथवा उसका 1 चम्मच चूर्ण शहद में मिलाकर देने से तनावजन्य मानसिक विकारों में राहत मिलती है। नींद अच्छी आती है। उच्च रक्तचाप कम करने एवं हृदय को शक्ति प्रदान करने में भी यह प्रयोग बहुत हितकर है।

41 से 50 वर्ष की उम्र के लोगों को 1 ग्राम ज्योतिष्मती चूर्ण 2 चुटकी सोंठ के साथ गरम पानी में मिलाकर देने तथा ज्योतिष्मती के तेल से अभ्यंग करने से इस उम्र में स्वभावतः बढ़ने वाले वातदोष का शमन होता है एवं संधिवात, पक्षाघात (लकवा) आदि वातजन्य विकारों से रक्षा होती है।

51 से 60 वर्ष की आयु में दृष्टिशक्ति स्वभावतः घटने लगती है जो 1 ग्राम त्रिफला चूर्ण तथा आधा ग्राम सप्तामृत लौह गोघृत के साथ दिन में 2 बार लेने से बढ़ती है। सोने से पूर्व 2-3 ग्राम त्रिफला चूर्ण गरम पानी के साथ लेना भी हितकर है। गिलोय, गोक्षुर एवं आँवला से बना रसायन चूर्ण 3-10 ग्राम तक सेवन करना अति उत्तम है।

मेध्य रसायनः शंखपुष्पी, जटामांसी और ब्राह्मी चूर्ण समभाग मिलाकर 1 ग्राम चूर्ण शहद के साथ लेने से ग्रहणशक्ति व स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है। इससे मस्तिष्क को बल मिलता है, नींद अच्छी आती है एवं मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

आचार रसायनः केवल सदाचार के पालन से भी शरीर व मन पर रसायनवत् प्रभाव पड़ता है और रसायन के सभी फल प्राप्त होते हैं।

सत्यवादी, क्रोधरहित, अहिंसक, उदार, धीर, प्रियभाषी, अहंकाररहित, ब्रह्मचर्य का पालन व नित्य दान करने वाला, गुरु एवं वयोवृद्ध तपस्वियों की पूजा तथा सेवा सुश्रुषा में रत, संयमी, जप तप एवं धर्मशास्त्रों का स्वाध्याय करने वाला पुरुष नित्य रसायन सेवी है – ऐसा समझना चाहिए।

संत श्री आसारामजी आश्रम संचालित धन्वन्तरि आरोग्य केन्द्र, अमदावाद।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2001, पृष्ठ संख्या 29,30 अंक 98

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