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Prerak Prasang

भगवद्भक्त वृत्रासुर


एक बार असुरों ने चढ़ाई कर दी और देवता हार गये । ब्रह्मा जी की सम्मति से देवताओं ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को पुरोहित बनाया । विश्वरूप को ‘नारायण कवच’ का ज्ञान था । उसके प्रभाव से बलवान होकर इन्द्र ने असुरों को पराजित किया किंतु विश्वरूप की माता असुर-कन्या थीं । इन्द्र को संदेह हुआ कि विश्वरूप प्रत्यक्ष तो हमारी सहायता करते हैं पर गुप्तरूप से असुरों को भी हविर्भाग पहुँचाते हैं । इस संदेह से इन्द्र ने विश्वरूप को मार डाला । पुत्र की मृत्यु से दुःखी त्वष्टा ने इन्द्र से बदला लेने के लिए उसका शत्रु उत्पन्न हो, ऐसा संकल्प करके अभिचार यज्ञ किया । उस यज्ञ से अत्यंत भयंकर वृत्र का जन्म हुआ । यह वृत्रासुर पूर्वजन्म में भगवान के ‘अनंत’ स्वरूप का परम भक्त चित्रकेतु नामक राजा था । पार्वती जी के शाप से उसे य असुर देह मिली थी । असुर होने पर भी पूर्वजन्म के अभ्यास से वृत्र की भगवद्भक्ति उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी ।

साठ हजार वर्ष कठोर तप करके वृत्रासुर ने अमित शक्ति प्राप्त की । वह तीनों लोकों को जीतकर उनके ऐश्वर्य का उपभोग करने लगा । वृत्र असुर था, उसका शरीर असुर जैसा था किंतु उसका हृदय निष्पाप था । उसनें वैराग्य था और भगवान की निर्मल-निष्काम प्रेमरूपा भक्ति थी । भोगों की नश्वरता वह जानता था । एक बार संयोगवश वह देवताओं से हार गया । तब असुरों के आचार्य शुक्र उसके पास आये । उस समय आचार्य को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वृत्र के मुख पर राज्यच्युत होने का तथा पराजय का कोई खेद नहीं है । उन्होंने इसका कारण पूछा । उस महान असुर ने कहाः “भगवन् ! सत्य और तप के प्रभाव से मैं जीवों के जन्म-मृत्यु तथा सुख-दुःख के रहस्य को जान गया हूँ । इससे मुझे किसी भी अवस्था में हर्ष या शोक नहीं होता । भगवान ने कृपा करके मुझे अपने तत्त्व का ज्ञान करा दिया है, इससे जीवों के आवागमन तथा भोगों के मिलने-न मिलने में मुझे विकार नहीं होता । मैंने घोर तप करके ऐश्वर्य पाया और फिर अपने कर्मों से ही उसका नाश कर दिया । मुझे उस ऐश्वर्य के जाने का तनिक भी शोक नहीं है । इन्द्र से युद्ध करते समय मैंने अपने स्वामी श्रीहरि के दर्शन किये थे । मैं आपसे और कोई इच्छा न करके यही प्रार्थना करता हूँ कि किस कर्म से, किस प्रकार भगवान की प्राप्ति हो, यह आप मुझे उपदेश करें ।”

शुक्राचार्य ने वृत्र की भगवद्भक्ति की प्रशंसा की । उसी समय सनकादि कुमार वहाँ घूमते हुए आ पहुँचे । शुक्राचार्य तथा वृत्र ने उनका आदरपूर्वक पूजन किया । शुक्राचार्य के पूछने पर सनत्कुमार जी ने कहाः “जो भगवान सम्पूर्ण विश्व में स्थित हैं, जो सृष्टि, पालन तथा संहार के परम कारण हैं, वे श्री नारायण शास्त्रज्ञान, उग्र तप और यज्ञ के द्वारा नहीं मिलते । मनसहित सब इन्द्रियों को सांसारिक विषयों से हटाकर उनमें लगाने से ही वे प्राप्त होते हैं । जो निरंतर दृढ़तर प्रयास से निष्कामभावपूर्वक भगवान को प्रसन्न करने के लिए कर्तव्यकर्म करते हैं और शम-दम आदि साधनों के करके चित्तशुद्धि प्राप्त कर लेते हैं, वे ही इस आवागमन चक्र से छूटते हैं । प्रबल प्रयत्न करने वाला पुरुष एक जन्म में भी हृदय को शुद्ध कर लेता है । बुद्धि के विषयासक्ति आदि दोष बार-बार के महान प्रयत्न से नष्ट हो जाते हैं । निर्मल हृदय पुरुष ज्ञान दृष्टि से सबको नारायणस्वरूप देखते हैं । इस समदृष्टि से वे ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाते हैं । जो इऩ्द्रियों को संयत करके सुख-दुःख में सम रहते हैं, जो निर्मल मन से परम पवित्र भगवद्भक्ति को जानना चाहते हैं, वे ब्रह्म साक्षात्कार करके दुर्लभ मोक्षस्वरूप अविनाशी परब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं ।”

वृत्रासुर अब दृढ़निश्चय से सर्वत्र, सबमें भगवान का अनुभव करने लगा । इन्द्रादि देवताओं ने उसे मारने का बहुत प्रयत्न किया पर वे सफल न हुए । मारने वालों के तेज को वह हरण कर लेता था और अस्त्र-शस्त्र निगल जाता था । तब देवताओं ने भगवान की शरण ली और भगवान की बहुत सी ज्ञानमयी स्तुति की । भगवान ने प्रकट होकर कहाः “देवताओ ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ । मेरे प्रसन्न होने पर जीव को कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता किंतु जिनकी बुद्धि अनन्यभाव से मुझमें लगी है, जो मेरे तत्त्व को जानते हैं, वे मुझे छोड़कर और कुछ नहीं चाहते ।”

दयामय भगवान देवताओं पर प्रसन्न थे, फिर भी वे भगवान को सर्वदा के लिए पाने की प्रार्थना नहीं कर रहे थे । अपार कृपासिंधु प्रभु ने देख लिया कि ये विषयाभिलाषी ही हैं । प्रभु को अपने परम भक्त वृत्र को असुर-शरीर से मुक्त करके अपने पास बुलाना था, अतः उन्होंने इन्द्र से कहाः “अच्छा, तुम महर्षि दधीचि के पास जाकर उनसे उनका शरीर माँग लो । उनकी हड्डियों से बने वज्र के द्वारा तुम असुरराज वृत्र को मार सकोगे ।”

इन्द्र के माँगने पर महर्षि दधीचि ने योग द्वारा शरीर छोड़ दिया । विश्वकर्मा ने उनकी हड्डियों से वज्र बनाया । वज्र लेकर ऐरावत पर सवार हो बड़ी भारी सेना के साथ इन्द्र ने वृत्र पर आक्रमण किया । इस प्रकार इन्द्र को अपने सामने देखकर वह महामना असुर तनिक भी घबराया या डरा नहीं । वह निर्भय, निश्चल हँसता हुआ युद्ध करने लगा । उसने ऐरावत पर एक गदा मारी तो ऐरावत रक्त वमन करता अट्ठाईस हाथ पीछे चला गया । अपने शत्रु को ऐसे संकट में पड़ा देख वृत्र उलटा आश्वासन और प्रोत्साहन देते हुए बोलाः “इन्द्र ! घबराओ मत ! अपने इस अमोघ वज्र से मुझे मारो । भगवान की सच्ची कृपा मुझ पर है । मैं अपने मन  को भगवान के चरणकमलों में लगाकर तुम्हारे वज्र द्वारा इस शरीर के बंधन से छूटकर योगियों के लिए भी दुष्प्राप्य परम धाम को प्राप्त कर लूँगा । इन्द्र ! जिनकी बुद्धि भगवान में लगी है, उन श्रीहरि के भक्तों को स्वर्ग, पृथ्वी या पाताल की संपत्ति भगवान कभी नहीं देते क्योंकि ये संपत्तियाँ राग-द्वेष, उद्वेग-आवेग, आधि-व्याधि, मद-मोह, अभिमान-क्षोभ, व्यसन-विवाद, परिश्रम-क्लेश आदि को ही देती हैं । अपने पर निर्भर अबोध शिशु को माता-पिता कभी अपने हाथों क्या विष दे सकते हैं ? मेरे स्वामी दयामय हैं, वे अपने प्रियजन को विषयरूप विष न देकर उसके अर्थ-धर्म-काम संबंधी प्रयत्न का ही नाश कर देते हैं । मुझ पर भगवान की कृपा है, इसी से तो मेरे ऐश्वर्य को उन्होंने छीन लिया और तुम्हें वज्र देकर भेजा कि तुम इस शरीर से मुझे छुड़ाकर उनके चरणों में पहुँचा दो । परंतु इन्द्र ! तुम्हारा दुर्भाग्य है । तुम पर प्रभु की कृपा नहीं है, इसी से अर्थ, धर्म, काम के प्रयत्न में तुम लगे हो । भगवान की कृपा का रहस्य तो उनके निष्किंचन भक्त ही जानते हैं ।”

असुरराज वृत्र भगवान की कृपा का अनुभव करके भावमग्न हो गया । वह भगवान को प्रत्यक्ष देखता हुआ-सा प्रार्थना करने लगाः “हरे ! मैं मरकर भी तुम्हारे चरणों के आश्रय में रहूँ, तुम्हारा ही दास बनूँ । मेरा मन तुम्हारे ही गुणों का सदा स्मरण करता रहे, मेरी वाणी तुम्हारे ही गुण-कीर्तन में लगी रहे, मेरा शरीर तुम्हारी सेवा करता रहे । मेरे समर्थ स्वामी ! मुझे स्वर्ग, ब्रह्मा का पद, सार्वभौम राज्य, पाताल का स्वामित्व, योगसिद्धि और मोक्ष भी नहीं चाहिए । मैं तो चाहता हूँ कि पक्षियों के जिन बच्चों के अभी पंख न निकले हों, वे जैसे भोजन लाने गयी हुई अपनी माता के आने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं, जैसे रस्सी से बँधे भूख से व्याकुल छोटे बछड़े अपनी माता गौ का स्तन पीने के लिए उतावले रहते हैं, जैसे पतिव्रता स्त्री दूर-देश गये अपने पति का दर्शन पाने को उत्कंठित रहती है, वैसे ही आपके दर्शन के लिए मेरे प्राण व्याकुल रहें । इस संसारचक्र में मैं अपने कर्मों से जहाँ भी जाऊँ, वहीं आपके भक्तों से मेरी मित्रता हो आपकी माया से जो यह देह-गेह, स्त्री-पुत्रादि में आसक्ति है, वह मेरे चित्त का स्पर्श न करे ।”

प्रार्थना करते-करते वृत्र ध्यानमग्न हो गया । कुछ देर में सावधान होने पर वह इन्द्र की ओर त्रिशूल उठाकर दौड़ा । इन्द्र ने वज्र से वृत्र की वह दाहिनी भुजा काट दी । वृत्र ने फिर परिघ (भाला) उठाकर बायें हाथ से इन्द्र की ठोढ़ी पर मारा । इस आघात से इन्द्र के हाथ से वज्र गिर पड़ा और वे लज्जित हो गये । इन्द्र को लज्जित देख असुर वृत्र ने हँसकर कहाः “शक्र ! यह खेद करने का समय नहीं है । वज्र हाथ से गिर गया तो क्या हुआ, उसे उठा लो और सावधानी से मुझ पर चलाओ । सभी जीव सर्वसमर्थ भगवान के वश में हैं । सबको सर्वत्र विजय नहीं मिलती । कठपुतली के समान सभी जीव भगवान के हाथ के यंत्र हैं । जो लोग नहीं जानते कि ईश्वर के अनुग्रह के बिना प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, पंचभूत, इन्द्रियाँ, मन आदि कुछ नहीं कर सकते, वे लोग ही अज्ञानवश पराधीन देह को स्वाधीन मानते हैं । प्राणियों का उत्पत्ति विनाश काल की प्रेरणा से ही होता है । जैसे प्रारब्ध एवं काल की प्रेरणा से बिना चाहे दुःख, अपयश, दरिद्रता मिलती है, उसी प्रकार भाग्य से ही लक्ष्मी, आयु, यश और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं । जब ऐसी बात है, तब यश-अपयश, जय-पराजय, सुख-दुःख, जीवन-मरण के लिए कोई क्यों हर्ष-विषाद करे । सुख-दुःख तो गुणों के कार्य हैं और सत्त्व, रज, तम – ये तीनों गुण प्रकृति के हैं, आत्मा के नहीं । जो अपने को तीनों गुणों का साक्षी जानता है, वह सुख-दुःख से लिप्त नहीं होता ।”

इन्द्र ने वृत्रासुर के निष्कपट दिव्य भाव की प्रशंसा कीः “दानवेन्द्र ! तुम तो सिद्धावस्था को प्राप्त हो गये हो । तुम सबको मोहित करने वाली भगवान की माया से पार हो चुके हो । आश्चर्य की बात है कि रजोगुणी स्वभाव होने पर भी तुमने अपने चित्त को दृढ़ता से सत्वमूर्ति भगवान वासुदेव में लगा रखा है । तुम्हारा स्वर्गादि के भोगों में अनासक्त होना ठीक ही है । आनंदसिंधु भगवान की भक्ति के अमृतसागर में जो विहार कर रहा है, उसे स्वर्गादि सुख जैसे नन्हें गड्ढों में भरे खारे गंदे जल से प्रयोजन भी क्या !”

इसके बाद वृत्र ने मुख फैलाकर ऐरावतसहित इन्द्र को ऐसे निगल लिया, जैसे कोई बड़ा अजगर हाथी को निगल ले । निगले जाने पर भी इन्द्र ‘नारायण कवच’ के प्रभाव से मरे नहीं । वज्र से असुर का पेट फाड़कर वे निकल आये और फिर उसी वज्र से उन्होंने उस दानव का सिर काट डाला । वृत्र के शरीर से एक दिव्य ज्योति निकली, जो भगवान के स्वरूप में लीन हो गयी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2009, पृष्ठ संख्या 14-16 अंक 200

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महापुरुषों की युक्ति !


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

संसारियों को कई गुत्थियों का हल नहीं मिल पाता । यदि मिल भी जाता है तो एक को राज़ी करने के लिए दूसरे को नाराज़ करना पड़ता है । जबकि ज्ञानियों के लिए उन गुत्थियों को हल करना आसान होता है ज्ञानी महापुरुष ऐसी दक्षता से गुत्थी सुलझा देते हैं कि किसी भी पक्ष को खराब न लगे । इसीलिए देवर्षि नारद जी की बातें देव-दानव दोनों मानते थे ।

ऐसी ही एक घटना मेरे गुरुदेव के साथ परदेश में घटी थीः एयरपोर्ट पर गुरुदेव को लेने के लिए बड़ी-बड़ी हस्तियाँ आयी थीं । कई लोग अपनी-अपनी बड़ी आलीशान गाड़ियों में गुरुदेव को बैठाने के लिए उत्सुक थे । एक दो आगेवानों के कहने से और सब तो मान गये लेकिन दो भक्त हठ पर उतर गयेः “गुरुदेव बैठेंगे तो मेरी ही गाड़ी में !” मामला जटिल हो गया । दोनों में से एक भी टस से मस होने को तैयार न था । इन दोनों भक्तों की जिद अन्य भक्तों के लिए सिरदर्द बन गयी ।

एक न कहाः “यदि पूज्य गुरुदेव मेरी गाड़ी में नहीं बैठेंगे तो मैं गाड़ी के नीचे सो जाऊँगा ।”

दूसरे ने कहाः “पूज्य गुरुदेव मेरी गाड़ी में नहीं बैठेंगे तो मैं जीवित न रहूँगा ।”

ऐसी परिस्थिति में क्या करें, क्या न करें यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था । दोनों बड़ी हस्तियाँ थीं, अहं का दायरा भी बड़ा था । दोनों में से किसी को भी बुरा न लगे ऐसा सभी भक्त चाहते थे । इतने में तो मेरे गुरुदेव का जहाज हवाई अड्डे पर आ गया । पूज्य गुरुदेव बाहर आये तब समितिवालों ने गुरुदेव का भव्य स्वागत करके खूब नम्रता से परिस्थिति से अवगत कराया एवं पूछाः “साँईं ! अब क्या करें ?”

ब्रह्मवेत्ता महापुरुष कभी-कभी ही परदेश पधारते हैं । अतः स्वाभाविक है कि प्रत्येक व्यक्ति निकट का सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयत्न करे । प्रेम से प्रयत्न करना अलग बात है और नासमझ की तरह जिद करना अलग बात है । संत तो प्रेम से वश हो जाते हैं जबकि जिद के साथ नासमझी उपरामता ले आती है । लोगों ने कहाः “दोनों का पास एक दूसरे से टक्कर ले ऐसी गाड़ियाँ एवं निवास हैं । बहुत समझाया पर मानते नहीं हैं । हमारी गाड़ी में बैठकर हमारे घर आयें ऐसी जिद लेकर बैठे हैं । अब आप ही  इसका हल बताने की कृपा करें । हमें कुछ सूझता नहीं है ।”

पूज्य गुरुदेव बड़ी सरलता एवं सहजता से बोलेः “भाई ! इसमें चिंता करने जैसी बात ही कहाँ है ? सीधी बात है और सरल हल है । जिसकी गाड़ी में बैठूँगा उसके घर नहीं जाऊँगा और जिसके घर जाऊँगा उसकी गाड़ी में नहीं बैठूँगा । अब निश्चय कर लो ।”

उस जटिल गुत्थी को गुरुदेव ने चुटकी बजाते हल कर दिया कि ‘एक की गाड़ी, दूसरे का घर !’

दोनों पूज्य गुरुदेव के आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गयेः “गुरुदेव ! आप जिस गाड़ी में बैठना चाहते हैं उसी में बैठें । आपकी मर्जी के अनुसार ही होने दें ।”

थोड़ी देर पहले तो हठ पर उतरे थे परंतु संत के व्यवहार-कुशलतापूर्ण हल से दोनों ने जिद छोड़कर निर्णय भी संत की मर्जी पर ही छोड़ दिया ! प्राणिमात्र के परम हितैषी संतजनों द्वारा सदैव सर्व का हित ही होता है ।

ब्रह्मगिआनी ते कछु बुरा न भइया ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2009, पृष्ठ संख्या 21 अंक 200

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भाव से भलाई


(पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

राजा रंतिदेव को अकाल के कारण कई दिन भूखे प्यासे रहना पड़ा । मुश्किल से एक दिन उन्हें भोजन और पानी प्राप्त हुआ, इतने में एक ब्राह्मण अतिथि के रूप में आ गया । उन्होंने बड़ी श्रद्धा से ब्राह्मण को भोजन कराया । उसके बाद एक शूद्र अतिथि आया और बोलाः “मैं कई दिनों से भूखा हूँ,  अकालग्रस्त हूँ ।” बचे भोजन का आधा हिस्सा उसको दे दिया । फिर रंतिदेव भगवान को भोग लगायें, इतने में कुत्ते को लेकर एक और आदमी आया । बचा हुआ भोजन उसको दे दिया । इतने में एक चाण्डाल आया, बोलाः “प्राण अटक रहे हैं, भगवान के नाम पर पानी पिला दो ।”

अब राजा रंतिदेव के पास जो थोड़ा पानी बचा था, वह उन्होंने चाण्डाल और कुत्ते को दे दिया ।

इतने कष्ट के बाद रंतिदेव को मुश्किल से रूखा-सूखा भोजन और थोड़ा पानी मिला था, वह सब उन्होंने दूसरों को दे दिया । बाहर से तो शरीर को कष्ट हुआ लेकिन दूसरों को कष्ट मिटाने का जो आनंद आया, उससे रंतिदेव बहुत प्रसन्न हुए तो वह प्रसन्नस्वरूप, सत्-चित्-आनंदस्वरूप परमात्मा जो अंतरात्मा होकर बैठा है साकार होकर नारायण के रूप में प्रकट हो गया, बोलाः “रंतिदेव ! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ, क्या चाहिए ?”

रंतिदेव बोलेः

“न कामयेऽहं गतिमीश्वरात् परा-

मष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा ।

आर्तिं प्रपद्येऽखिलदेहभाजा-

मन्तःस्थितो येन भवन्त्यदुःखाः ।।

“मैं भगवान से आठों सिद्धियों से युक्त परम गति नहीं चाहता । और तो क्या, मैं मोक्ष की भी कामना नहीं करता । मैं चाहता हूँ तो केवल यही कि मैं संपूर्ण प्राणियों के हृदय में स्थित हो जाऊँ और उनका सारा दुःख मैं ही सहन करूँ, जिससे और किसी भी प्राणी को दुःख न हो ।” (श्रीमद्भागवतः 9.21.12)

प्रभु ! मुझे दुनिया के दुःख मिटाने में बहुत शांति मिलती है, बहुत आनंद मिलता है । बस, आप ऐसा करो कि लोग पुण्य का फल सुख तो स्वयं भोगें लेकिन उनके भाग्य का जो दुःख है, वह मैं उनके हृदय में भोगूँ ।”

भगवान ने कहाः “रंतिदेव ! उनके हृदय में तो मैं रहता हूँ, तुम कैसे घुसोगे ?”

बोलेः “महाराज ! आप रहते तो हो लेकिन करते कुछ नहीं हो । आप तो टकुर-टकुर देखते रहते हो, सत्ता देते हो, चेतना देते हो और जो जैसा करे ऐसा फल पाये…. मैं रहूँगा तो अच्छा करे तो उसका फल वह पाये और मंदा करे तो उसका फल मैं पा लूँ । दूसरे का दुःख हरने में बड़ा सुख मिलता है महाराज ! मुझे उनके हृदय में बैठा दो ।”

जयदयाल गोयंदकाजी कहते थेः “भगवान मुझे बोलेंगेः तुझे क्या चाहिए ? तो मैं बोलूँगाः महाराज ! सबका  उद्धार कर दो ।”

तो दूसरे संत ने कहा कि “अगर भगवान सबका उद्धार कर देंगे तो फिर भगवान निकम्मे रह जायेंगे, फिर क्या करेंगे ? सबका उद्धार हो गया तो सारा संसार मुक्त हो गया, फिर तो भगवान निकम्मे हो जायेंगे ।”

उन्होंने कहा कि “भगवान निकम्मे हो जायें इसलिए मैं नहीं माँगता हूँ और सबका उद्धार हो जाय यह संभव भी नहीं, यह भी मैं जानता हूँ । लेकिन सबका उद्धार होने की भावना से मेरे हृदय का तो उद्धार हो जाता है न !”

जैसे किसी का बुरा सोचने से उसका बुरा नहीं होता लेकिन अपना हृदय बुरा हो जाता है, ऐसे ही दूसरों की भलाई सोचने से, भला करने से अपना हृदय भला हो जाता है ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2009, पृष्ठ संख्या 16,19 अंक 200

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