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Tatva Gyan

निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है…


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

कबीर जी कहते हैं-

निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है…..

बख्खड़ ऊपर गौ वीयाई उसका दूध बिलोता है।।

मक्खन मक्खन साधु खाये छाछ जगत को पिलाता है।

निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है…

निरंजन वन में…. अंजन माने इन्द्रियाँ। जहाँ इन्द्रियाँ न जा सके वह है निरंजन। उस निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है। उस वन में किसी साथी, किसी व्यक्ति का साथ में प्रवेश नहीं हो सकता। कई लोग तो सुबह के सुंदर वातावरण में घूमने जाते हैं तब भी अकेले नहीं जाते। अरे ! जन्म लेना अकेले, मरना अकेले, नींद करनी अकेले, पाप-पुण्य का फल भोगना अकेले, नींद करनी अकेले, पाप-पुण्य का फल भोगना अकेले। जब अकेले ही करना है तो किसी दूसरे पर भरोसा क्या करता ? अतः साधना-पथ में अकेले ही जाना चाहिए। इसीलिए कबीरजी ने कहा होगाः निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है। अतः अकेला आगे बढ़ना चाहिए।

ये शब्द बहुत सीधे-सादे हैं लेकिन पूरा वेदान्त कूट-कूटकर भर दिया है कबीर जी ने। वे पूरे अनुभव की बात कर रहे हैं। अज्ञानी मनुष्य दो भी होंगे तो हजार बातें होंगी लेकिन हजार ज्ञानी मिलकर भी बोलेंगे तो एक ही अनुभव की बात आ जाती है।

बख्खड़ ऊपर गो वियाई उसका दूध बिलोता है…

जैसे गाय बियाती है तो दूध देती है ऐसे ही इड़ा और पिंगला के मध्य स्थित सुषुम्ना का द्वार जब खुलता है तब वृत्ति ब्रह्मानंद देती है। ʹबख्खड़ ऊपरʹ तात्पर्य है ऊँची अवस्था। मक्खन मक्खन साधु खाये…. वास्तव में होना तो ऐसा चाहिए कि साधु खुद छाछ पियें और दूसरों को मक्खन खिलायें किन्तु यहाँ साधु स्वयं मक्खन खाते हैं और दूसरों को छाछ पिलाते हैं। यह कैसे ? वास्तव में कबीर जी यहाँ यह आध्यात्मिक मर्म बताना चाहते हैं कि शुद्ध ईश्वरीय मस्ती तो साधु लेते हैं और उनके अनुभव को छूकर आती हुई वाणी का लाभ लोग लेते हैं। जैसे मक्खनवाली छाछ में कुछ कण मक्खन के रह ही जाते हैं ऐसे ही शुद्ध ब्रह्मानुभव है मक्खन और उस अनुभव को छूकर आती हुई वाणी है छाछ। साधु स्वयं तो ब्रह्मानुभवरूपी मक्खन का स्वाद लेता है और कभी-कभार लोकहितार्थ कुछ बोल देता है तो उस छाछरूपी वाणी का पान करने का लाभ लोगों को मिल जाता है। अगर वे छाछ भी हजम कर लें तो उनका बेड़ा पार हो जाता है।

कबीर जी आगे कहते हैं-

तन की कुण्डी मन का सोटा हरदम बगल में रखता है।

पाँच-पच्चीस मिलकर आवे उनको घोंट मिलाता है।

निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है…

तन की कुण्डी मन का सोटा अर्थात् जैसे खरल दस्ते में ठण्डाई घोंटते हैं ऐसे ही साधु पुरुष तन-मनरूपी खरल दस्ते का उपयोग करके आत्मज्ञानरूपी ठण्डाई घोंट-घोंट कर लोगों को पिलाते हैं। जैसे खरल दस्ते को हम अपना साधन समझकर अपने नियंत्रण में रखते हैं वैसे ही साधु पुरुष तन-मन को बगल में रखते हैं अर्थात् अपने नियंत्रण में रखते हैं, अपने आदेश में रखते हैं। अपनी आज्ञा में ही क्यों रखते हैं ? क्या अहंकार सजाने के लिए ? नहीं नहीं, कोई आ जाये परमात्म-रस पीने वाले तो उनके लिए तन-मन का प्रयोग करके रामनाम का रस पिलाने के लिए तन-मन को अपनी आज्ञा में रखते हैं।

आगे कबीर जी कहते हैं-

कागज की एक पुतली बनायी उसको नाच नचाता है।

आप ही नाचे आप ही गावै आप ही ताल मिलाता है।।

निरंजन वन में साधु अकेला खेलता है…

कागज की एक पुतली बनायी अर्थात् अपनी आत्माकार वृत्ति बनायी। कागज नाम क्यों दिया ? क्योंकि वृत्ति कोई भी हो वह ठोस नहीं होती, उसमें शाश्वतता नहीं होती। जैसे कागज की पुतली ठोस नहीं होती। साधु आत्माकार वृत्ति बनाकर उसको अपनी आत्मसत्ता से नचाता है। जैसे तरंग को सत्ता पानी की है ऐसे ही अपनी वृत्ति को वृत्ति के आधार परमात्मा की, आत्मा की सत्ता है। ʹआप ही नाचे…..ʹ उस वृत्ति में फिर वह स्वयं ही गाता है, स्वयं ही नाचता है और स्वयं ही ताल मिलाता है।

जैसे तरंग सरोवर से भिन्न नहीं, वैसे ही वृत्ति अपने अधिष्ठान परमात्मा से भिन्न नहीं होती। जैसे तरंगें भिन्न-भिन्न दिखती हैं वैसे ही एक ही वृत्ति के भिन्न-भिन्न नाम हैं। उस सच्चिदानंद परमात्मा से जो वृत्ति फुरती है, वह वृत्ति जब मनन करती है तब उसे ʹमनʹ कहते हैं, निश्चय करती है तब उसे बुद्धि कहते हैं, चिंतन करती है तब उसे ʹचित्तʹ कहते हैं, देह में अहं करती है तब उसे ʹअहंकारʹ कहते हैं और देह के साथ जुड़कर जब जीने की इच्छा रखती है तब उसे ʹजीवʹ कहते हैं।

ऐसा नहीं है कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और जीव – ये पाँच अंदर घुसे हुए हैं वरन् चैतन्य से फुरने वाली वृत्तियों के ही ये भिन्न-भिन्न नाम हैं। साधना करने की वृत्ति है तो साधक, भक्ति करने की वृत्ति है तो भक्त, योग करने की वृत्ति है तो योगी, भोग करने की वृत्ति है तो भोगी, त्याग करने की वृत्ति है तो त्यागी, साधना का जतन करने की वृत्ति है तो जति और तप करने की वृत्ति है तो तपस्वी। चैतन्य से स्फुरित होने वाली वही वृत्ति है किन्तु जैसे-जैसे संस्कार और गुण उससे जुड़ जाते हैं वैसा-वैसा उस मनुष्य का नाम हो जाता है। है सब वृत्तियों का ही खेल।

कभी-कभी शांत होकर वृत्तियों के खेल का निहारना चाहिए। ऐसा नहीं कि सारा दिन ʹराम… राम… राम…ʹ ही करते रहे। नहीं, कभी शांत होकर बैठें और जो वृत्ति उठे उसे देखें कि ʹअच्छा, मनन कर रही है, इसीलिए तेरा नाम मन पड़ा। तुझे सत्ता तो मैं ही दे रहा हूँ।ʹ इस प्रकार का प्रयोग करने से ऐसा अदभुत लाभ होगा कि महाराज ! तपस्वियों को 12-12 वर्ष तप करने से भी कई बार वैसा लाभ नहीं हो पाता।

हम वृत्ति के साथ जुड़ जाते हैं, वृत्तियाँ इन्द्रियों के साथ जुड़ जाती हैं और इन्द्रियाँ जगत के साथ जुड़ जाती हैं, हमारा पतन हो जाता है। सबसे पहले है हमारा चैतन्य स्वरूप परमात्मा। फिर वृत्तियाँ। फिर इन्द्रियाँ और फिर जगत। इन्द्रियाँ मन को खींचे और उसके पीछे चले बुद्धि तो जीव हो गया अज्ञानी। लेकिन बुद्धि शुद्ध-अशुद्ध का निर्णय करके परमात्मा की ओर चले, मन उसमें सहयोग दे और इन्द्रियाँ उसके पीछे चलें तो हो जायेगा ज्ञान। बस, इतना ही है, ज्यादा कुछ नहीं है। इसी मे सब साधनाओं का सार आ गया। फिर चाहे तुम ʹहरि ʹ करो या ʹनमो अरिहंताणंʹ करो, ʹझूलेलालʹ करो या ʹराम-रामʹ करो। ये सब सात्त्विक स्थितियाँ हैं। अंत में परम लक्ष्य तो केवल परमात्मज्ञान ही है।

जैसे सरोवर की सत्ता से लहर उठती है वैसे ही अपना जो वास्तविक स्वरूप है, चैतन्यस्वरूप है, उसी की सत्ता से वृत्ति फुरती है। यदि वह वृत्ति निर्णयात्मक फुरती है तो उसे बुद्धि कहते हैं। वह परमात्मा के ज्यादा करीब है। परमात्मा के सबसे निकट हृदय होता है, फिर बुद्धि होती है, बाद में मन, इन्द्रियाँ और जगत होता है। संसार का सब कुछ त्याग करके भी जिसने परमात्मभाव बना लिया उसने लाभ का सौदा किया क्योंकि संसार की चीजें साथ में नहीं चलेंगी। साथ में चलेगा परमात्मभाव, साथ में चलेगा स्वभाव। रूपये, मकान बिगड़े तो बिगड़े लेकिन अपना स्वभाव नहीं बिगड़ना चाहिए और ʹस्वʹ माना ʹआत्माʹ अतः ʹआत्माʹ का भाव ʹस्वभावʹ नहीं बिगड़ना चाहिए।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 1997, पृष्ठ संख्या 9,10,27 अंक 48

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असीम ईश्वरीय सुख की प्राप्ति


पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

तन सुकाय पिंजर कियो धरे रैन दिन ध्यान।

तुलसी मिटे न वासना बिना विचारे ज्ञान।।

तप करना, तन को सुखाना, तितिक्षा सहना, इनसे परमात्मप्राप्ति नहीं होती। तप से शक्ति तो प्राप्त होती है और पुण्य से उत्कृष्ट भोग प्राप्त होते हैं किन्तु अमरत्व की, परमात्मप्रेम की प्राप्ति नहीं होती और जब तक परमात्मप्रेम की प्राप्ति नहीं होती तब तक मन स्थिर नहीं होता। इसलिए परमात्म-प्राप्ति की दिशा में मन की स्थिरता प्रमुख सोपान है।

देवर्षि नारद गये सनकादि ऋषियों के पास और उनसे प्रार्थना करते हुए बोलेः

“हे भगवन् ! लोगों की नजर में तो मैं बहुत बड़ा साधु हूँ, तीनों लोकों में मेरी अबाध गति है, ʹनारायण-नारायण….ʹ करते हुए कहीं भी पहुँच जाता हूँ लेकिन जहाँ जाना चाहिए, जिसे पाना चाहिए, जिसे पाकर फिर हर्ष-शोक नहीं होता उस परमात्मप्रेम का, उस मुक्ति का अनुभव नहीं हो रहा है। सामान्य आदमी को तीन ताप सताते हैं किन्तु मुझे चार ताप सता रहे हैं।”

अपने दोष को खोजकर निकालें, उसका नाम संत है और दूसरों पर दोष आरोपित करे वह साधारण जीव है।

देवर्षि नारद आगे कहते हैं- “हे ऋषिवर ! सामान्य आदमी को तो आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक ये तीन ताप सताते हैं किन्तु मुझे तो चार ताप सता रहे हैं। चार वेद, छः दर्शन, धनुर्वेद, स्थापत्य वेद आदि चार उपवेद – ये सारी विद्याएँ जानता हूँ, तंत्र मंत्रादि भी जानता हूँ किन्तु जिसको जानने के बाद और कुछ जानना शेष नहीं रहता, जिसमें स्थिर होने के बाद बड़े भारी दुःख से भी आदमी चलायमान नहीं होता उस निर्दुःख पद का, उस आत्मानुभव का आनंद अभी तक नहीं मिला। मुझे अभी तक हर्ष-शोक व्याप्त है। भगवन् ! मेरे हृदय की बात तो मैं ही जानता हूँ। लोग बिचारे क्या जानेंगे ?”

अपना साक्षी आप है निज मन माहिं विचार।

नारायण जो खोट है उसको तुरत निकाल।।

जो कमियाँ हैं, उन्हें ढूँढकर निकालने लग जाओ तो तुरंत कल्याण हो जाये।

देवर्षि नारद की विनययुक्त प्रार्थना सुनकर सनकादि ऋषियों ने कहाः यो वै भूमा तत् सुखम्। उस भूमा, व्यापक ब्रह्म परमात्मा को ज्यों-का-त्यों जान। आकृतियों में जो देवी-देवता हैं, वे सब अच्छे हैं लेकिन ये सारी आकृतियाँ जहाँ से प्रकट होती हैं, जिसकी सत्ता से बोलती हैं और जिसमें विलय हो जाती हैं, उस भूमा ईश्वर को जानोगे, तब पूर्ण सुखी हो जाओगे।”

तब सनकादि ऋषियों के तत्त्वज्ञान के उपदेश से नारदजी हर्ष-शोक से परे उस भूमा तत्त्व में स्थित हुए।

यो वै भूमा तत् सुखम्। वास्तव में पूर्णता ही सत्य है। सबमें वही एक चैतन्य तत्त्व विराजमान है। उस एकत्व के अज्ञान से ही राग, द्वेष, अभिनिवेश, भय, शोक आदि पैदा होते हैं। सारे दुःखों की सृष्टि होती है। कलह, विद्रोह आदि सब उस एक के अज्ञान से ही उत्पन्न होते हैं। कबीर जी ने ठीक ही कहा हैः

एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाये।

बहुत कुछ साध लिया, बहुत कुछ पा लिया लेकिन उस एक को छोड़कर पाया है तो वह सब टिकेगा नहीं और पूर्ण विश्रान्ति भी नहीं देगा। नरसिंह मेहता ने भी कहाः

ज्यां लगी आत्मतत्त्व चीन्यो नहि।

त्यां लगी साधना सर्व झूठी।।

अतः हमें चाहिए कि उसी एक को पाने के प्रयत्न में लगें और यह तभी संभव होगा जब हम अपने दोषों को, अपनी दुर्बलताओं को जानकर उसे उखाड़ फेंकने के लिए कटिबद्ध हो जायें।

दुर्बलता, कमजोरी दो प्रकार की हैः प्रेमपात्र से भेद मानना, ʹवह पराया है… दूर है… मरने के बाद मिलेगा…ʹ ऐसा बेवकूफीभरा विचार यह पहली कमजोरी है। जो ʹआद सत् जुगाद सत् है भी सत् नानक होसे भी सत्ʹ है ऐसे उस व्यापक परब्रह्म परमेश्वर के लिए यह मानना कि ʹभाई ! हम तो संसारी हैं। हम कैसे पा सकते हैं…? हम भक्त तो हैं पर उस सुख को पाना हमारे बस की बात कहाँ….?ʹ यह बड़ी भारी मूर्खता है।

उस प्रेमास्पद को पराया मानना, उसमें भेद मानना अथवा तो ऐसा कहो कि भक्त होकर भी उससे विभक्त रहना यह बड़ी कमजोरी है, हमारे मन की दुर्बलता है। अपने से वह अलग है या अपने से वह भिन्न सत्ता है – यह मानना बड़ी भारी भूल है।

अपने से भिन्न मानकर फिर उसकी खोज करना यह दूसरी दुर्बलता है। जैसे, छोटा-सा बालक आईने में अपने ही प्रतिबिंब को दूसरा बालक मान बैठता है या चिड़िया आईने में अपने प्रतिबिंब को ही दूसरी चिड़िया मानकर, अपने से भिन्न मानकर चोंचें ठोकती है।

मैंने सुनी है एक कहानीः

गुलाम नबीर जा रहा था खेत में। रास्ते में उसे ʹएक दर्पण का टुकड़ा मिला। यह बात तब की है जब दर्पण इतना प्रसिद्ध नहीं हुआ था। जैसे ही गुलाम नबीर ने उसमें देखा तो अपना प्रतिबिंब देखकर उसे लगाः ʹअरे, यह तो अब्बाजान का चित्र है !ʹ उसके अब्बाजान गुजर चुके थे अतः उन्हें याद करके रो पड़ा और बोलाः ʹअब्बाजान ! मेरी औरत ने तुम्हें बहुत सताया था… अब मैं तुम्हें घर ले चलूँगा, रोज तुम्हारा दीदार करूँगा, अब्बाजान !ʹ

था तो स्वयं का प्रतिबिंब, किन्तु अब्बाजान का चित्र मानकर उसे घर ले आया। पत्नी भैंस दोह रही थी, उससे बोलाः “तू इधर मत देखना, मैं खास काम कर रहा हूँ”। यह कहकर चुपके से एक पेटी में उस फोटो (दर्पण के टुकड़े) को छुपा दिया और खेत पर चल दिया।

उसके जाने के बाद उसकी पत्नी की जिज्ञासा हुई कि ʹपता नहीं क्या है ? देखने का मना कर गये हैं ! लाओ, जरा देखूँ !ʹ इन्कार भी तो आमंत्रण देता है। ढूँढते-ढूँढते वह दर्पण का टुकड़ा उसके हाथ लग गया। उसमें देखते ही उसने समझा कि यह गुलाम नबीर की प्रेयसी का फोटो है और वह गरज उठीः ʹयह औरत ? इसने ही मेरा घर बरबाद कर दिया….ʹ

दर्पण में प्रतिबिंब तो उसी का था। अपने ही प्रतिबिंब को अब्बाजान का चित्र समझकर गुलाम नबीर प्यार करता है और अपने ही प्रतिबिंब को दूसरी स्त्री समझकर उसकी पत्नी द्वेष करती है।

राग भी पराये में होता है और द्वेष भी पराये में होता है। अपने में तो सिर्फ प्रेम ही होता है। हमारा वास्तविक स्वरूप प्रेमास्पद ही है। उसी प्रेमास्पद में विश्रान्ति पाना है और यह कोई कठिन काम नहीं है लेकिन जिनके कठिन नहीं लगता है ऐसे ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों का मिलना कठिन है…. और यदि मिल भी जायें तो उनमें श्रद्धा होना कठिन है।

अष्टावक्रजी कहते हैं राजा जनक सेः

श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः।

ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः।।

ʹहे सौम्य ! हे प्रिय ! श्रद्धा कर, श्रद्धा कर। इसमें मोह मत कर। तू ज्ञानरूप ईश्वर परमात्मा प्रकृति से परे है।ʹ (अष्टावक्रगीताः 15.8)

काला-गोरा होने वाला चमड़ा तू नहीं है, भूख-प्यास जिसको लगती है वह प्राण तू नहीं है। यह पंचभौतिक शरीर तू नहीं है, सुखी-दुःखी होने वाला मन तू नहीं है, राग-द्वेष से पचने वाली बुद्धि तू नहीं है। प्रकृति से परे तू अपने-आप में आ जा।

कोई समझता हैः ʹचलो, गाड़ी मिल गयी, बंगला मिल गया, हाश !ʹ लेकिन यह हाश ! यह अहा !! कब तक ? असुविधा में दुःखी होना और सुविधा में हर्षित होना – यह भी एक कमजोरी है। सुविधा भी जाने वाली चीज है और असुविधा भी जाने वाली चीज है।

कोई हाल मस्त कोई माल मस्त।

कोई तूती मैना सुए में।।

कोई खान मस्त पहरान मस्त।

कोई राग-रागिनी दोहे में।।

कोई अकल मस्त कोई शकल मस्त।

कोई चंचलताई हाँसी में।।

इक शुद मस्ती बिन और मस्त।

सब बँधे अविद्या फाँसी में।।

जो अविद्यमान शरीर है, अविद्यमान परिस्थिति है उसमें बँध जाते हैं। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः। ʹसुख आ जाये चाहे दुःख आ जाये, उससे प्रभावित नहीं होता, मेरे मत में वह परम योगी है।ʹ

तस्मात् योगी भवार्जुन।

ʹइसलिए हे अर्जुन ! तू योगी बन।ʹ

मैं अपने साधकों से कहता हूँ किः

तस्मात् योगी भव मम साधक। दृढ़ निश्चय कर लो कि इसी जन्म में उस प्रेमास्पद का, उस दुलारे का अनुभव करना है। इसी जन्म में, इसी शरीर में और अभी ही जो आद सत् जुगाद सत् है भी सत नानक ! होसे भी सत् है उस अकाल को, उस परमेश्वर को पराया मानने की गल्ती को निकाल देंगे और वह हमें नहीं मिलेगा इन नकारात्मक विचारों को निकाल फेंकेगे।

हरि ૐ…. ૐ….. ૐ….

जब भेद बुद्धि होती है तब राग-द्वेष, भय-चिंता, विकार और कलह उत्पन्न होते हैं और जब अभेदज्ञान हो जाता है कि एक ही सत्ता है, एक ही आत्मतत्त्व है और वही मेरा अपना आपा है तब सब चिंता, विकार, परेशानियाँ दूर हो जाती हैं, रोम-रोम उस अन्तर्यामी राम की मस्ती से सराबोर होने लगता है और साधक सहज ही में कह उठता हैः

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

न छेड़ो मुझे यारों ! मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।

अष्टावक्र कहते हैं जनक सेः

श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व…. ʹश्रद्धा कर तात ! श्रद्धा कर। तू प्रकृति से परे है। तू सुख-दुःख से परे है। तू सुख-दुःख का भोक्ता मत बन।ʹ

जब सुख और दुःख का भोक्ता बनने की आदत कम होती जायेगी तो दुःखहारी श्रीहरि का अनुभव तुम्हारा अनुभव होता जायेगा, सुखस्वरूप आत्मा का अनुभव तुम्हारा अनुभव होता जायेगा। यह काम कठिन नहीं है किन्तु अटपटा है, झटपट समझ में नहीं आता और एक बार समझ में आ जाये तो सारी खटपट मिट जाती है, महाराज !

….और यह सच्ची समझ आती है योगवाशिष्ठ, उपनिषदों आदि के अध्ययन एवं ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के सान्निध्य से।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जनवरी 1997, पृष्ठ संख्या 6,7,8 अंक 49

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सनातन धर्म


ज्ञान-प्रेम-माधुर्य का महासागर

पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू

दुनिया के हर प्राचीन धर्म ने, दुनिया के हर सुलझे हुए संप्रदाय और कई प्रबुद्ध महापुरुषों ने और राजा-महाराजाओं ने जिसका सहर्ष स्वीकार किया और अनुभूतियाँ की हैं, सारी पृथ्वी पर, अतल, वितल, महातल, रसातल, स्वर्गलोक, भूर्लोक, भूवर्लोक, जनलोक, तपलोक पर जिसका साम्राज्य छाया हुआ है वह सार्वभौम ब्रह्माण्डव्यापी धर्म है सनातन धर्म।

भिन्न-भिन्न देश, काल और परिस्थिति के अनुसार पृथक-पृथक धर्म बने हैं किन्तु सनातन धर्म सम्पूर्ण मानव जाति के विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। सनातन सत्य रूप धर्म जीवमात्र के भीतर, हर दिल में धड़कनें ले रहा है। सनातन सत्य हर दिल में छुपी हुई परमात्मा की वह सुषुप्त शक्ति है जिसके जागृत होने से मनुष्य का सर्वांगीण विकास होता है, पूर्ण आत्मिक विकास होता है। जितने अंश में मानव सनातन सत्य के निकट होता है, उतने अंश में उसका जीवन मधुर होता है। जितने अंश में उसका सनातन सत्य से संबंध जुड़ता है, जितने अंश में अपनी सुषुप्त शक्तियाँ सनातन चेतना से प्राप्त करता है, उतने अंश में वह अपने-अपने क्षेत्र में उन्नत होता है। यह एक हकीकत है कि जितना-जितना मनुष्य देह को सत्य मानकर संकीर्ण कल्पनाएँ रचता है, उतना-उतना सच्चे सुख से दूर होता जाता है। आज का मनुष्य शरीर के भोगों में बड़े-बड़े सुख-सुविधा से संपन्न महलों में रहने में, भौतिक ऐश आरामों में रचे-पचे रहने में ही सच्चा सुख मान बैठा है और उसे ही प्राप्त करने में अपना सारा समय बरबाद कर देता है। फलस्वरूप वह अपने आत्मा परमात्मा के ज्ञान से वंचित ही रह जाता है।

भागवत के प्रसंग में आता है कि रहुगण राजा, राज-पाट का सुख भोगते-भोगते विचार करते हैं- ʹजिस देह को जला देना है, उस देह को आज तक तो बहुत भोगों में रमाया लेकिन ज्यों ही मृत्यु का एक झटका आयेगा तो सब कुछ पराया हो जायेगा। मृत्यु आकर सब छीन ले उसके पहले उस सनातन शान्ति से मुलाकात कर लें तो अच्छा रहेगा।ʹ

जहाँ में उसने बड़ी बात कर ली।

जिसने अपने दिलबर से मुलाकात कर ली।।

सनातन धर्म हमें अपने वास्तविक स्वरूप अर्थात् स्व-स्वरूप को प्रकट करने की आज्ञा देता है। हमारा आदि धर्म हमें सिखाता है कि पंचभूतों का बना शरीर ʹहमʹ नहीं हैं। वास्तव में हम स्वयं ब्रह्म हैं, जो सृष्टि का कर्त्ता और धर्त्ता है। ʹमैं और तुमʹ- ऐसे भेद हमने बनाये हैं। वास्तव में हम अभेद ब्रह्म हैं। सारा जगत ब्रह्मस्वरूप ही है। माया के पाश में बँधे हुए एक दूसरे को हिन्दू, मुसलमान, सिख आदि मानते हैं और संकीर्ण विचारधाराओं में बहने लगते हैं। दुःख, अशान्ति, झगड़े, चिन्ता आदि में हम उलझते गये हैं, वरना सनातन धर्म एकोहम् द्वितीयो नास्ति। हम सभी एक हैं, भिन्न नहीं हैं… यह दिव्य सन्देश विश्व को दे रहा है और यही तो सनातन सत्य भी है। इस सनातन सत्यरूपी व्यापक दृष्टिकोण का प्रभाव समाज पर जितने अंश में होता है, उतने ही अंश में स्नेह, आनंद, भाईचारा, दया, करूणा, अहिंसा आदि दैवी गुणों से समाज संपन्न होता है। इस सत्य के साथ अपना नाता जोड़ना ही व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक जगत में प्रगति का मूलमंत्र है, मधुर जीवन की कुँजी है। फिर चाहे रमण महर्षि हों, साँई टेऊँराम हों, याज्ञवाल्क्य हों चाहे रामावतार या कृष्णावतार हो चाहे कोई राजनैतिक जगत में सेवा करने वाला हो।

ऐसा नहीं कि उन्होंने जो पाया है, वह हम नहीं पा सकते। हममें भी वही योग्यता है। सिर्फ ठीक मार्गदर्शन से सही पथ पर लगने की आवश्यकता है। स्वामी रामतीर्थ अपने दिलबर से मुलाकात करके ऐसे छलके कि सनातन धर्म के अमृत को बाँटते-बाँटते वे अमेरिका पहुँचे। उस समय (सन् 1899-1901) अमेरिका के राष्ट्रपति रूझवेल्ट ने स्वामी रामतीर्थ की उदारता को अखबारों द्वारा सुना और उससे वे इतने प्रभावित हुए कि स्वयं चलकर रामतीर्थ के दर्शन करने गये। अखबार वालों को स्वामी रामतीर्थ के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा थाः

“मैंने आज तक सुना था कि जीसस सनातन सत्य के अमृत को पाये हुए थे लेकिन भारत के इस साधु को तो अमृत बाँटते देखा। मेरा जीवन सफल हो गया।”

आज हम अपने जीवन में सनातन सत्य के अमृत को पाने की आकांक्षा नहीं रखते इसलिए हम सुविधाओं के बीच पैदा होते हैं, पलते हैं फिर भी जिंदगी भर परेशान ही रहते हैं और आखिर मर जाते हैं, जीवन व्यर्थ गँवा देते हैं।

धन, सौन्दर्य से हम सुन्दर नहीं होते वरन् सुन्दर से भी सुंदर आत्मस्वरूप के करीब पहुँचने पर हम सुंदर होते हैं। जितने हम भीतर के धन से खोखले या कंगाल होते हैं उतनी बाह्य भोग-पदार्थों की गुलामी करनी पड़ती है क्योंकि सुख इन्सान की जरूरत है। जब तक हमें आत्मिक आनंद नहीं मिलता तब तक हम विषय-वासना में सुख ढूँढते हैं किन्तु दुःख-परेशानी के अलावा कुछ हाथ नहीं लगता। इससे विपरीत, जितने हम भीतर के धन से संपन्न होते हैं, आत्मसुख से तृप्त होते हैं उतना हम बाह्य भोग-पदार्थों की ओर से बेपरवाह होते हैं।

अष्टावक्र के शरीर में आठ कमियाँ थीं। छोटा कद, टेढ़ी टाँगें थीं और उम्र 12 वर्ष थी। फिर भी संसार से विरक्त होकर सरकने वाली चीजों से, देह और मन के निर्णयों, आकर्षणों से पार होकर मुक्तिपद प्राप्त किये हुए थे तो राजा जनक उनके चरणों में प्रणाम करके उनके आगे प्रश्न करते हैं- “भगवन ! आत्मसुख कैसे प्राप्त होता है ?”

सनातन सत्य के सुख को पाने की चाह हर मनुष्य में होती है परन्तु सच्ची दिशा न मिलने पर वह संसारसुख में भटक जाता है। मिथ्या जगत के नश्वर सुख में सत्यबुद्धि करके हम क्षणिक सुख प्राप्त करने में लगे रहते हैं फिर चाहे कितने ही विघ्न क्यों न आएँ ? पैसे कमाने के लिए न जाने क्या-क्या करना पड़ता है ? यदि धन बहुत हो तो शरीर में रोग घुसा होता है, किसी के घर में पुत्र नहीं है तो किसी के माँ-बाप अकस्मात चल बसते हैं। जीवन है तो कुछ न कुछ आफतें आती ही रहती हैं। अरे ! भगवान स्वयं जब श्रीरामचन्द्र जी तथा श्रीकृष्ण के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए तब उन्हें भी विघ्न-बाधाएँ आयी थीं किन्तु फर्क है तो इतना कि हम जब विघ्न-बाधाएँ आती हैं तो उनमें बहकर हताश-निराश हो जाते हैं जबकि संत-महापुरुष, सत्य-स्वरूप ईश्वर के साथ अपना सनातन संबंध जोड़े हुए होते हैं जिससे वे लेशमात्र भी विघ्न-बाधाओं में बहते नहीं हैं। वे निराश या हताश बिल्कुल नहीं होते वरन् मुसीबतें उनके जीवन को चमकाने, प्रसिद्धि दिलाने एवं पूजनीय बनने का कारण बन जाती हैं। भगवान श्रीरामचन्द्रजी को 14 साल का वनवास मिला था। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म ही काल-कोठरी में हुआ था। महीने भर के थे पूतना जहर पिलाने आ गयी थी। कंस मामा ने लगातार कई षडयंत्र रचे। फिर भी श्रीकृष्ण और रामजी सदैव अपने सनातन सत्य स्वरूप में प्रतिष्ठित रहे, मुस्कराते रहे।

यही तो है जीव को अपने आत्मस्वरूप में जगाने का सनातन धर्म का उद्देश्य।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2012, पृष्ठ संख्या 7,8, 15 अंक 48

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