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Tatva Gyan

‘बुद्धि’ अद्वैत में सोती है


आदमी दुःखी क्यों होता हैं और ईश्वर प्राप्ति में तकलीफ क्यों होती हैं? …कि ऐसा हो-ऐसा न हो, ऐसा मिले-ऐसा न मिले…।

पक्का कर लो, अपनी तरफ से अड़चन नहीं बनेंगे और आप-चाही सब होती हैं क्या? आज तक तुमने कितना-कितना चाहा? तो तुम्हारा चाहा सब हो गया क्या? जो चाहते हो वह सब होता नहीं, जितना होता है वह सब भाता नहीं और जो भाता है वह टिकता नहीं, फिर काहे को पकड़ करो।  होता हैं तो होता हैं, ठीक है नहीं तो वाह-वाह,  वाह-वाह..। ऐसा हो-ऐसा न हो, ऐसा न हो-ऐसा हो, ऐसा करके अपनी वासनाओं का पुतला मत बनो। आप रहो अपने ईश्वर स्वभाव में, अपने शांत-सम स्वभाव में। प्रयत्न करो, फिर जो हो- ‘सम’, इसको बोलते है ‘समत्वं योग उच्यते’। ये बड़ी भारी तपस्या है।

सब-कुछ त्यागकर मैं भिक्षा माँगकर रहूँगा अथवा सब-कुछ पाकर मैं बड़ा होकर रहूँगा…नहीं,  अभी जहाँ हैं, “मैं कौन हूँ?” …बस और “कौन पुरुष स्फुरित करता हैं?”, मेरे को बुरे विचार आते है, नहीं आये… तो लड़ो मत उनसे। बुरे विचार आते हैं तो वैसा करो मत, उससे उपराम, बस ईश्वर में… लेकिन ईश्वर में मन लगता नहीं… तो नहीं लगता तो कोई बात नहीं, ना लगे। ईश्वर में मन ना लगो तो ना लगो, जहाँ-तहॉं, जहाँ लगता हैं उसकी गहराई में ईश्वर हैं, चलो जाओ… गाय में लगा, कुत्ते में लगा, घोड़े में लगा, गधे में लगा… किसमें लगा? जहाज में लगा… ड्यूटी में लगा? …तो ड्यूटी में मन इधर भागा, उधर भागा.. तो ये भागने को जानता कौन हैं और किसकी सत्ता से भागते हो? ऐसा पूछो, अपने आप लग जायेगा, इसको बोलते हैं अविकम्‍प योग। एक तो मन लग गया… ‘समाधि’… वो हो गया समाधियोग लेकिन उसमें नहीं लगे तो इससे भी आसान तरीका हैं, चलते-फिरते ज्ञान की बैटरी डाल दो मन की गाड़ी में… अविकम्‍प योग हो गया। मन लगे तो लगे, न लगे तो फिर ज्ञान में, विचार में शांत हो जायेगा, मौन हो जायेगा। श्वाँस अंदर गया.. ॐ,  बाहर आये तो गिनती, अंदर गया तो शांति… बाहर आये तो गिनती।

‘साधना’ क्यों करनी पड़ती हैं? कि ‘असाधन’ हो गया इसीलिये साधन करना पड़ता है। ईश्वर भी है, हम भी है फिर पाने के लिये मेहनत क्यों? ईश्वर मिलना चाहते हैं और हम भी मिलना चाहते हैं फिर भी देरी क्यों? …कि वो गलत तरीके से जो सच्चा मान लिया हैं उसको निकालने के लिए गड़बड़ करनी पड़ती हैं। आप लोग पान-मसाला खाना छोड़ दो, तो आपके लिए क्या देरी है? पान-मसाला, जर्दा छोड़ना क्या देरी है?, खाते ही नहीं है लेकिन जो जर्दा खाने की आदत में फँसे है उनके लिये जर्दा छोड़ने के लिये मेहनत हैं। तो, साधन करते हैं लेकिन असाधन को पकड़ के रखते हैं। भजन करते है लेकिन अभजन की तरफ खींचने वाली चीजों को महत्व दे देते हैं, कहीं ये छूट न जाए, ऐसा न हो जाए, वैसा न हो जाए…। …वैसा न हो जाए?…काहे को फिकर करता हैं? माँ के गर्भ में था उस समय कौन था तेरा रक्षक? कौन था पोषक? माँ के शरीर का पोषक कौन था? किसने रक्तवाहिनियों में रक्त बहा के नाभि के द्वारा तेरा पोषण किया है? वो प्रभु चले गये है क्या? सो गये हैं क्या? अथवा उसकी सत्ता से उनकी जगह थोड़ी खाली हो गई हैं क्या? कोई दूसरा आ गया है क्या? दो भगवान हो गए है क्या सृष्टि में?  एकमेव अद्वितीय…

तुम्हारी बुद्धि रात  में किसमें सोती हैं? पता है? अद्वैत में सोती हैं… । अद्वैत में बुद्धि सोती हैं तो पुष्ट होती हैं और फिर द्वैत में आती हैं तो बिखरती हैं, फिर थक-थका के अद्वैत में जाती हैं। वहाँ कोई नही! तत्र पिता अपिता भवति, माता अमाता भवति, मित्र अमित्र भवति… गहरी नींद में मित्र, मित्र नहीं। पिता, पिता नहीं। माता, माता नहीं… अद्वैत एक सत्ता।

फूलों से सजी हुई सज्जा और इत्र छिटका हुआ कमरा और ललनाओं की हास्य-विलास और सेवा-चाकरी लेते-लेते राजा सो गया है। सोने से पहले खिड़की से निहारा कि एक युवक अपना कँबल बिछाकर लेट रहा हैं। क्या… उस युवक की जिंदगी हैं, भाग्य बेचारे का! मैं भी युवराज हूँ,  राज्याभिषेक हुआ और इतना राजमहल में ऐश करते-करते सो रहा हूँ और वो बेचारा युवक एक कँबल बिछाकर… साधु पड़ा है मंदिर के प्रांगण में…।

सुबह हुई, वह राजा सैर करने गया। वह महात्मा भी नदी किनारे सैर करते हुए… नहाकर, आगे को जाना था।

व्यंग्‍य में राजा ने कहा, युवराज ने –”क्यों महाराज! महल के सामने वाले मंदिर के प्रांगण में सोये थे रात को, वो ही हो न महाराज?” 
बोले-“हाँ”
“महाराज रात कैसी बीती?”

महाराज की चमकती आँखों ने उस युवराज के व्यंग को भाँप लिया और चमकते, अपने प्रातः स्फुरित होनेवाले अनुभव को स्मरण करते हुए राजाधिराज, महाराजाओं के बाप का बाप, नंगे पैर, नंगे सिर, कंधे पर कँबल लिये हुए महापुरुष ने कहा- “राजा! रात कैसी बीती! कुछ तो तुम्हारे जैसी और कुछ तुम्हारे से बहुत-बहुत बढ़िया।”

बोले- “कुछ रात मेंरे जैसी और कुछ मेंरे से बहुत-बहुत बढ़िया… ये कैसे?”

बोले- “तुम घोड़े से नीचे उतरो तब ना! यह रहस्य समझना हैं तो थोड़ा नम्रता का सद्गुण तो युवराज आप में होगा ही!”

मजबूर कर दिया उस मायावी सुखों में उलझे हुए युवराज को, सुलझे हुए युवक ने, अकिंचन युवराज ने…। सब-कुछ वैभव इकट्ठा कर के सुखी होने में भटकने वाले राजाधिराज को, आत्मा में संतुष्ट होने वाले महाराज ने मजबूर कर दिया नीचे उतरने को।

तले पर बैठ गये महाराज।

“राजा, कैसी बीती रात!, कुछ तो तुम्हारे जैसी, कुछ तुम्हारे से उत्तम…।  इसका उत्तर सुनो! गहरी नींद में आपको पता था कि मैं राजमहल में हूँ? फूलों की शैय्या पर हूँ?…नहीं। वहाँ शैय्या, शैय्या नहीं रहती और मुझे वो भी पता नहीं था कि कँबल पर हूँ और आपको वो भी पता नहीं था कि कोमल गद्दे पर हूँ। गहरी नींद में सब उसी परमेश्वर की गोद में चले जाते हैं। अद्वैत में बुद्धि सोती हैं। गहरी नींद में कोई भेद-भाव नहीं रहता हैं। सजावट तो तुम्हारे नकली शरीर और नकली अहं को खुश करती हैं, असलियत में कोई फर्क नहीं हैं। एक सड़ी-गली झोंपड़ी में गहरी नींद में पड़ा हुआ बुड्ढ़ा और एक राजमहल में लेटा हुआ युवराज, गहरी नींद में दोनों समान पुष्ट होते हैं। …तो तुम्हारे को जितनी देर गहरी नींद आई… और मेरे को आई… तो हम दोनों एक थे, लेकिन तुम जब करवट लेते थे या तुम जब जगे तो तुम्हारा सुख का आश्रय था ललनाएँ, फूल, सुगंध..।  नाक की नाली के द्वारा तुम सुख खोज रहे थे अथवा स्पर्श के द्वारा तुम सुख खोज कर भिखमंगे-से हो रहे थे। बुरा मत मानना… और मैं
“ॐ सच्‍च‍िदानंद, ॐ चैतन्यदेव, ॐ आत्मदेव…” …तो मैं तो बीच-बीच में ईश्वर के चिंतन में आत्म-रस पान करता था और तुम विषय-विकारों की नालियों में उलझ रहे थे इसलिए कुछ तो मेरी रात तुमसे बढ़िया गई और कुछ तुम्हारे बराबरी की गई।

सज्जनता का अंश रहा होगा उस युवराज में। बोले- “महाराज! आपने तो मेरी आँखें खोल दी। मुझ अभागे को ये दुर्भाग्यपूर्ण विलासिता नरकों में ले जाये, वह मिली है और आप सौभाग्यशाली हैं कि आपको ऐसी समझ मिली हैं। महाराज ये समझ कहाँ से लाये?”

बोले- “बिनु सत्संग विवेक न होई। ये समझ सत्संग से मिली हैं। तुम इतना इकट्ठा करते हो फिर भी इतना निर्भीक सुख नहीं हैं, शाश्वत सुख नहीं हैं और मेरे पास कुछ भी नहीं हैं फिर भी राजन…।  

उस महापुरुष के मधुमय नेत्रों से खबर मिल रही थी कि पाया हुआ प्रभु को…। प्रभुमय निगाहों से विलासी राजा के जीवन को भी करवट दिला देता हैं। एक महापुरुष हजारों कंगाल दिलों को अपनी कृपा-दृष्टि से निहाल-खुशहाल कर देता हैं जबकि दस राजा मिलकर भी दस आदमी को भी निहाल-खुशहाल और परम-पद के पथिक नही बना सकते। काहे की इतनी आपा-धापी कर-करके परेशान हो रहे हैं? जो पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा वो चीजों को, उस स्थिति को पा-पाकर, खो-खोकर मरे जा रहे हैं। पतंगा भागता है मजा लेने के लिये लाईट के आगे और अंत में सजा मिलती हैं, ऐसे ही सब विषय-विकारों में मजा लेने को भागते हैं, अंत में थककर, निराश होकर खप जाते हैं। इसी को बोलते हैं माया, मा… या… । ‘मा’ माना जो नहीं, ‘या’ माना जो दिखे… इसको बोलते हैं धोखा।

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।

जो मुझ परमेश्वर को, चैतन्य को, सच्चिदानंद को प्रपन्न होता हैं, वह इस मेरी माया को तर जाता हैं। नजरिया कहाँ हैं? नश्वर पर है कि नश्वर की गहराई में छुपे हुए शाश्वत पर हैं? शत्रु पर है कि शत्रु की गहराई में छुपे हुए हितैषी पर हैं? नेत्र… कि नाक पर नजर है…  कि ललना के गाल पर नजर है कि ललुआ के गाल के ऊपर नजर हैं…  कि ललुआ और ललना के अंदर रक्तवाहिनियों में जो सत्ताधीश हैं और अंतःकरण में हैं और वही तुम्हारे अंतःकरण में सुबह स्फुरित करता हैं उसकी नजरिया हैं? बहुत कीमती समय हैं! व्यर्थ नहीं गँवाओ!

ऐसा ज्ञान पक्का हो जाये तो मौज ही मौज हो जायेगी


भगवतगीता के छठे अध्याय के 31 वें श्लोक में भगवान कहते हैं :

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।

सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते।।

बड़ी ऊँची बात भगवान कहते हैं, दुनिया के किसी पंथ और मजहब में ऐसी बात नहीं मिलेगी: 

‘‘मेरे में एकीभाव से स्थित हुआ जो योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है वह सब-कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरे में ही बर्ताव कर रहा है अर्थात वह पुरूष सर्वथा मेरे में ही स्थित है।’’   

 बहुत सूक्ष्म बात है, आम-आदमी न भी समझ सके फिर भी इस बात को सुनना तो बडा पुण्यदायी है। ‘‘मेरे में एकीभाव से स्थित हुआ जो योगी संपूर्ण प्राणियों में स्थित मेरा भजन करता है वह सब-कुछ बर्ताव करता हुआ भी मेरे में ही बर्ताव करता है अर्थात वह सर्वथा मेरे में ही रहता है, स्थित है।’’   

मरने के बाद भगवान मिलेंगे, ये बात दूसरी है लेकिन यहाँ जीते-जी ‘भगवान में आप और आपमें भगवान’- ऐसा अनुभव करने की बात गीता कहती है। ये भगवान का अनुग्रह है।

अनुग्रह किसको बोलते है? ‘अनु’ माना ‘पीछे’, ‘ग्रह’ माना ‘जो पकड़ ले’।  आप जा रहे हैं और आपका ऐसा कुछ रास्ता है कि आपके परम हितैषी मित्र चाहते हैं कि‍ ये चले जाएंगे, उधर ये हो रहा है, वो हो रहा है, कहीं फँस न जाए। आपको कल समझाया।  किसी के द्वारा आपको समझाया गया, फिर भी आप जा रहे हैं और वो चुपके से पीछे आकर आपको दो भुजाओं में जकड़ ले, पकड़ ले, पता ही न चले, उसको बोलते हैं ‘अनुग्रह’। ‘अनु’ माना ‘पीछे’, ‘ग्रह’ माना ‘ग्रहण कर ले, पकड़ ले’।  

तो ये भगवान का…  ‘गीता’ भगवान का ‘अनुग्रह’ है, ‘धरती’ भगवान का ‘अनुग्रह’ है, ‘जल’ भगवान का ‘अनुग्रह’ है।  भगवान ‘अनुग्रह’ करते हैं तो भगवान के उपजाये हुए पाँच भूत भी भगवान के अनुग्रह के भाव से संपन्न है।  पृथ्वी कितनी कृपा करती है कि‍ हमको ठौर देती है और हम धान बोते हैं और अनंत गुना करके देती हैं।  चाहे उस पर गंदगी फेंको, चाहे खोदो, चाहे कुछ करो लेकि‍न पृथ्‍वी मनुष्यों को, जीवों को अनुग्रह करके ठौर देती है, रहने की जगह देती है, धन-धान्य, अन्न-फल आदि देती हैं। ऐसे ही ‘पृथ्‍वी’ पर अनुग्रह कर रहा है ‘जल’। ‘जल’ भी हम पर अनुग्रह कर रहा है और ‘पृथ्‍वी’ को भी स्थित रखता है। ‘जल’ पर अनुग्रह है ‘तेज’ का,  ‘तेज’ पर अनुग्रह है ‘वायु’ का और ‘वायु’ पर अनुग्रह है ‘आकाश’ का…  ‘आकाश’ उसको ठौर देता है और ‘वायु’ उसमें ही विचरण करता है और ‘आकाश’ पर अनुग्रह है ‘प्रकृति’ का और ‘प्रकृति’ भगवान की ‘शक्ति’ है। भगवान की शक्ति और भगवान दिखते दो हों फिर भी एक हैं। जैसे ‘पुरूष’ और ‘पुरूष’ की ‘शक्ति’ भिन्न नहीं हो सकती। भई आप तो रोज का दिहाड़ी का साठ रूपया दीजिये और आपकी शक्ति का सौ रूपया अलग, ऐसा नहीं होता। कोई भी पुरूष अपनी ‘शक्ति’ अपने से ‘अलग’ दिखा नहीं सकता। जय रामजी की… । ‘आप’ में जो ‘शक्ति’ है, ‘आप’ अलग हो जायें और ‘शक्ति’ अलग हो जाये, ये नहीं होता।

तो शक्ति और शक्तिवान एक, ऐसे भगवान और भगवान की शक्ति, आद्यशक्ति जिसको ‘जगदम्बा’ भी कहते हैं,  ‘काली’ भी कहते हैं, ‘भगवती’ भी कहते हैं, वैष्णव लोग जिसे ‘रा…धा’ कहते हैं, वैष्णव लोग जिसे ‘श्री’ कहते हैं। ‘श्री’ भगवान की अभिन्न शक्ति है और भगवान की अभिन्न शक्ति जो ‘श्री’ देवी हैं वो ‘राधा’ हैं।  ‘रा…धा’ उलटा दो तो ‘धा…रा’। आपके अंतरात्‍मा की जो सुरता है, जो धारा है वो अंतरात्‍मा से अलग नहीं हो सकती। अब उस धारा को केवल ठीक से समझ कर ठीक से बहने दो तो आपको ‘धारा’ कृष्ण से मिला देगी। अगर धारा को ठीक से समझा नहीं, ठीक से बहाया नहीं तो वो धारा आपको चौरासी लाख जन्मों में घुमाएगी। वो लोग सचमुच में महा अभागे हैं जिनको सत्संग नहीं मिलता।  

जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना… जिन्होंने मनुष्य जीवन पाकर अपने कानों से भगवतकथा नहीं सुनी उनके कान साँप के बिल जैसे हैं।

संत तुलसीदासजी कहते हैं : 

                    जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहि‍ भवन समाना।। 

                         जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।।

जो भगवदगुणगान नहीं करते उनकी जिव्‍हा मेंढक की जिव्‍हा जैसी है । मनुष्य में दो शक्ति है- एक देखने की शक्ति और दूसरी चिंतन करने की शक्ति। आप भगवान के श्रीविग्रह को देखो। भगवान की करुणा कृपा से ये पाँचभूत कितने-कितने उदार हैं उनको देखो।  कल-कल, छल-छल बह रहा है जल, उसमें देखो कि भगवतीय अनुग्रह ही तो बह रहा हैं।  इसी जल से औषधि‍याँ बनती है, इसी जल से अन्न बनता है, इसी जल से गन्‍ना बनता है और इसी जल से मिर्च बनती है। यह भगवान का जल पर अनुग्रह है और जल का हम पर अनुग्रह है। वाह प्रभु! तेरी लीला अपरंपार है… आप हो गये – यो मां पश्यति सर्वत्र… 

       आँख बंद करके भगवान का ध्यान करनेवाले योगियों की तरह आप सब समाधि लगाओं, ये संभव नहीं लेकिन योगियों को जो फल मिलता है वह फल आपको खुली आँख, खेत-खली, मकान-दुकान और घर में, जहाँ-तहॉं आपको फलित हो जायेगी, ऐसा ज्ञान बता रहे हैं.. कृष्ण।  

हवा लगी, आहा..  ठंडी हवा लगी, उसके बदले में क्या दिया?  ये वायुदेव का अनुग्रह है और वायु में चलने की सत्ता का अनुग्रह मेरे प्रभु का है। मेरे रब तेरी जय हो… ।  गरमी लगी तो हाय! गरमी। लू आ रही है, सर्दी के बाद गर्मी आती है, शरीर में जो कफ जमा हो गया है नाडियों में, उसको पिघलाने के लिये । तो वायु को गरम करके बाहर आयें तो तेरी लीला अपरंपार है ।  जय रामजी बोलना पडेगा ।  

नन्हा-मुन्ना:  पापा…  माँ…  अरे मेरे बेटे…, बेटे को स्नेह तो करो लेकिन बेटे के दिल में तो धडकनें तुम्‍हारे परमेश्वर की ही है, वो परमेश्वर तुम्‍हारा माँ बोल रहा है, मैं तो प्रभु तेरी माँ हूँ, ऐसा विचार करो  । तो मुन्ने की माँ होकर, ममता करके, मुन्ना बड़ा होगा.. डॉक्टर बनेगा…  लोगों का शोषण करेगा..  मर्सीडिस लायेगा…  ऐसी दुआ करने की जरूरत ही नहीं । बच्चा बड़ा बनेगा… और सब में अपने पिया को देखेगा। अभी तो वो बच्चा मेरा नारायण रूप है… मेरा रामजी रूप है… मेरा तो बच्चा । वहां ममता नहीं भगवान की प्रीति करो, वो आपका भजन हो गया, बच्चे को प्यार करना भी आपका भजन बन गया, जय रामजी बोलना पड़ेगा।

चलो तो चलें जरा आसमान देखें, नजदीक जाकर निहारे…

आसमान में सब तारा..   तारों का चाँद भी तू…  

तेरा मकान आला…  जहाँ-तहॉं बसा है तू...

चलो तो चलें जरा बाजार देखें, बाजार जाकर निहारे…

बाजार में सब आदम... आदम का दम भी तू,

तेरा मकान आला…  जहाँ-तहॉं बसा है तू...

मेरे रब तेरी जय हो… कहीं जाटरूप तो कहीं बनियारूप, कहीं वकीलरूप तो कहीं नेतारूप तो कहीं जनता रूप, कहीं चोररूप तो कहीं सिपाहीरूप । तेरे क्‍या-क्‍या रूप और क्या क्या लीला है। हे मेरे प्रभु तेरी जय हो ।  आपके बाप का जावे क्या और भजन होवे पूरा, तेल लगे न फिटकरी..  रंग चोखो आवे, चोखो रंग आवे चोखो… ।  आप एक बात पक्की मान लो कि आप संसार में भैंसे की नाईं बोझा ढोने के लिये पैदा नहीं हुए, आप संसार में पच मरने के लिये, चिंता की चक्‍की में पिस मरने के लिए नहीं आए, आप टेंशन के शिकार होने के लिये संसार में नहीं आए।  हाय! हाय! हाय! हाय! कमाय! खाय! कमाया खाया… धरा और मृत्यु का झटका लगा और मर गये और प्रेत होकर भटके, मर गये और भैंसे बन गये, मर गये और किसी योनि में चले गये, इसलिए आप संसार में नहीं आए हैं।  आप तो संसार में आए कि संसार का कामकाज करते हुए, संसार के स्वामी की सत्ता से सब करते है, और उसी की सत्ता से उसी को देखकर खुशहाल होते हुए उससे निहाल हो जाने के लिये आए हैं।  ये पक्का कर लो।

A WILL WILL FIND A WAY... जहाँ चाह, वहॉं राह...

आप अपना हौंसला बुलंद और ईरादा शुद्ध कर लो बस।  घर से निकले, इरादा किया मंच पर पहुंचेंगे, सत्‍संग में पहुंचेगें तो आ गये न, ऐसे ही जीवन में ईरादा बना लो, परमात्मा तक पहुंचेंगे, परमात्मा का सुख उभारेंगे, परमात्मा का ज्ञान पाएंगे, परमात्मा का आनंद पाएंगे और अंत में परमात्मा से एक हो जाएंगे। ऐसा निर्णय करने से आपका तो भला हो जाएगा, आपके जो दीदार करेगा उसका भी पुण्य उभरने लग जायेगा। भाई साहब ऐसी बढि़या बात है… जय रामजी की।  

सासु कहती है- ये क्या जाने, कल की छोरी, मेरे बेटे को क्या रूचता है और क्या खाने से बेटा बीमार होता है, और क्या खाने से तंदरुस्त होता है ! हॅूं..  चल दूर बैठ! मैं खाना बनाती हूँ, बेटे इसके हाथ का मत खाना… छिनाल का। मैं देती हॅूं बनाकर…।  बहू कहती है- चल री बुढिया, तुझे क्या पता, ये तो मेरा प्राणनाथ है, मेरा पति है, मैं इससे शादी करके आयी हूँ, तेरे साथ थोड़ी शादी की है मैनें। हम और हमारे पति.. हम खाएंगे-पीएंगे, मौज करेंगे, तू जल्‍दी मर…। ननंद कहती है कि भाभी! ऐसा बक मत नहीं तो तेरी चोटी खींच लूंगी, मेरे भैया को तो मैं जानती  हूँ।  

अब भैया को तो प्यार तो  बहन भी करती है, भैया को प्यार तो माँ भी करती है, उसी व्यक्ति को प्यार पत्नी भी करती है, लेकिन अपना भेद बनाकर…। सासू-बहू, ननंद-भाभी लड़ाई-झगड़ा करती है… अपनी संकीर्णता है। जय राम जी की। जो व्यक्ति तेरा, ननंद का भैया है वही भाभी का पति है और वही माँ का बेटा है। ऐसे ही वही सभी का है बाप, सभी का बेटा, सभी का मित्र और सभी का साथी है, ऐसा ज्ञान जब पक्का हो जाए तो मौज ही मौज हो जाए।  

चलो तो चलें जरा बाजार देखें

बाजार में सब आदम, आदम का दम भी तू

तेरा मकान प्यारा, आला! सबमें बसा है तू

चलो तो चलें जरा किश्‍ती देखें दरिया में

दरिया में मिले राहिब, राहिब का रब भी तू

तेरा मकान आला, जहा तंहा बसा है तू

कीड़ी में तू नानो लागे, हाथी में तू मोटो क्यूं

बण महावत ने माथै बैठो, हाँकण वालो तू को तू

ऐसो खेल रच्‍यो मेरे दाता, जहाँ देखूँ वहाँ तू को तू

बण बालक ने रोवा लाग्‍यो…  उंवाँ… उंवाँ… उंवाँ…. अरे रे रे रे… ये देखो चुहिया! क्‍या नाम है गुगलु… ये देख ले! वो रोनेवाले में भी तू बैठा है और चुप कराने वाले में कौन बैठा है..

बण बालक ने रोवा लाग्‍यो, छानो राखण वालो तू

ले झोली ने मागण लाग्यों… ऐ बेन… रोटी टुकडा दे दे… भूखी-प्यासी हॅूं… ऐ भईया आजा…  इधर ले ये मोहनथाल…. ले जा…  मेरी बहू को मत बताना नहीं तो मरे को डांट देगी… आजकल की पढ़ाई की लडकियाँ…  ये सासू की इज्‍जत नहीं करती… फिर बोलेगी इतना सारा दे दिया… बेटी तू भूखी है न.. लेजा.. लेजा… अपने बच्चों को खिलाना, लेजा मोहनथाल लेजा…  पर बहू को मत बताना, चुपके से ले जा, ये पांच रुपये ले जा.. ।

वो भि‍खारन मैं भी तू बैठा है और वो सासू में भी तू बैठा है और वो जिससे लड़ रही है उस बहू में भी तू बैठा है…।  लड़नेवाला-डरनेवाला मन अलग-अलग है लेकिन मन की गहराई में सत्ता देनेवाला वो एक ही है। पंखे अलग-अलग कंपनी के, फ्रीज अलग-अलग घर के और लाईट और  बल्ब अलग-अलग है लेकिन पावरहाउस का करंट एक का एक । ऐसे सब के पावरहाउसों का पावरहाउस परब्रह्म परमात्मा रोम-रोम में रम रहा है, वो सच्चिदानंद परमात्मा एक का एक।  

          घने जंगल से जा रहे हो, डर लगता है कहीं आ न जाए कोई लूटनेवाला, मारनेवाला, कोई शेर और वरगड़ा लेकिन पास में, साथ में अगर एक बंदूकधारी साथ में चलता है न, तो हौंसला बढ़ जाता है कि क्‍या कर लेगा कोई भी जानवर, आदमी क्या कर लेगा, संतरी मेरे साथ है। एक संतरी चार पैसे का साधन लेकर चलता है तो हिम्मत आ जाती है, ऐसे विश्वनीयंता परमात्मा मेरा आत्‍मा है… भगवान मेरे साथ हैं… हरि ॐ…  हरि ॐ…  करके तू आगे बढ़ता चला जा तो कितना भला हो जाएगा। जो संतरी का,  मंत्री का, कोई इसका-उसका सहारा ढूंढते है और अंदर वाले का खयाल नहीं रखते उनका फि‍र कभी भी बुरा हाल हो जाता है। जय रामजी की। और जो अंदर वाले परमात्मा से मेल जोड़ करके फि‍र मंत्री-संतरी से मिलते है फिर वो तो काम ठीक रहता है ।  

कबीरा यह जग आय केबहुत से कीने मीत

इस दुनिया में आकर बहुत ही यार-दोस्त बनाए, बहुतों को रीझाया, बहुतों को मस्का मारा..

कबीरा यह जग आय केबहुत से कीने मीत

जिन्ह दिल बाँधा एक से वो सोए निश्चिंत… तो  आप एक दिल से बांधो ।  

ॐ… ॐ… ॐ… ॐ… ॐ…

नित्य उपासना की आवश्यकता क्यों ?


‘ऋग्वेद’ (1.113.11) में कहा गया हैः

ईयुष्टे ये पूर्वतरामपश्यन्व्युच्छन्तीमुषसं मर्त्यासः।

अस्माभिरू नु प्रतिचक्ष्याभूदो ते यन्ति ये अपरीषु पश्यान् ।।

‘जो मनुष्य ऊषा के पहले शयन से उठकर आवश्यक (नित्य) कर्म करके परमेश्वर का ध्यान करते हैं वे बुद्धिमान और धर्माचरण करने वाले होते हैं । जो स्त्री-पुरुष परमेश्वर का ध्यान करके प्रीति से आपस में बोलते-चालते हैं वे अनेक प्रकार के सुखों को प्राप्त होते हैं ।’

परमात्मा के नित्य पूजन, ध्यान, स्तुति के महत्त्व को महर्षि वेदव्यासजी ने महाभारत के अनुशासन पर्व (149.5-6) में बताया है कि “उसी विनाशरहित पुरुष का सब समय भक्ति से युक्त होकर पूजन करने से, उसी का ध्यान, स्तवन एवं उसे नमस्कार करने से पूजा करने वाला सब दुःखों से छूट जाता है । उस जन्म, मृत्यु आदि 6 भावविकारों से रहित, सर्वव्यापक, सम्पूर्ण लोकों के महेश्वर, लोकाध्यक्ष देव की निरंतर स्तुति करने से मनुष्य सब दुःखों से पार हो जाता है ।”

परमेश्वर की उपासना-अर्चना करने से आत्मिक शांति मिलती है । जाने अनजाने किये हुए पाप नष्ट होते हैं । देवत्व का भाव मन में पैदा होता है । आत्मविश्वास बढ़ता है । सत्कार्यों में मन लगता है । अहंकाररहित होने की प्रेरणा मिलती है । बुराई से रक्षा होने लगती है । चिंता और तनाव से मन मुक्त होकर प्रसन्न रहता है । जीवन को शुद्ध, हितकारी, सुखकारी, आत्मा-परमात्मा में एकत्ववाली ऊँची सूझबूझ प्राप्त होती है । ऊँचे-में-ऊँचे ब्रह्मज्ञान की सूझबूझ से शोकरहित, मोहरहित, चिंतारहित, दुःखरहित, बदलने वाली परिस्थितियों में अबदल आत्मज्ञान का परम लाभ मिलता है ।

आत्मलाभात् परं लाभं न विद्यते ।

आत्मसुखात् परं सुखं न विद्यते ।

आत्मज्ञानात् परं ज्ञानं न विद्यते ।

पुण्यात्मा, धर्मात्मा, महानात्मा, दर्शनीय, चिंतनीय, मननीय, आदरणीय, सर्वहितकारी, पूर्ण परोपकारी, पूर्णपुरुष, आत्मसाक्षात्कारी, ब्रह्मवेत्ता के लिए महर्षि वसिष्ठ जी कहते हैं- “हे राम जी ! जैसे सूक्ष्म जीवाणुओं से कीड़ी बड़ी है । कीड़ी से कीड़ा-मकोड़ा, कच्छ (कछुआ), बिल्ला, कुत्ता, गधा, घोड़ा दि बड़े है पर सबसे बड़ा है हाथी । परंतु हे राम जी ! सुमेरु पर्वत के आगे हाथी का बड़प्पन क्या है ? ऐसे ही त्रिलोकी में एक-से-एक मान करने योग्य लोग हैं । देवाओं में मान योग्य एवं सुख-सुविधाओं में सबसे बड़ा इन्द्र है । किंतु ज्ञानवान के आगे इन्द्र का बड़प्पन क्या है ?”

संत तुलसीदासजी ने लिखा हैः

तीन टूक कौपीन की, भाजी बिना लूण ।

तुलसी हृदय रघुवीर बसे तो इन्द्र वापड़ो कूण ।।’

पीत्वा ब्रह्मरसं योगिनो भूत्वा उन्मतः ।

इन्द्रोऽपि रंकवत् भासते अन्यस्य का वार्ता ?

ब्रह्मवेत्ता के आगे इन्द्र भी रंकवत् भासता है । इन्द्र को सुख के लिए अप्सराओं का नृत्य, साजवालों के साज,  और भी बहुत सारी सामग्री की आवश्यकता पड़ती है जैसे पृथ्वी के बड़े लोगों को सुख के लिए बहुत सारी सामग्री और लोगों की आवश्यकता पड़ती है लेकिन आत्मज्ञानी आत्मसुख में, आत्मानुभव में परितृप्त होते हैं । तीन टूक लँगोटी पहनकर और बिना नमक की सब्जी खा के भी आत्मज्ञानी आत्मदेव में परम तृप्त होते हैं ।

स तृप्तो भवति। स अमृतो भवति ।

स तरति लोकांस्तारयति । (नारदभक्तिसूत्रः 4 व 50)

तस्य तुलना केन जायते । (अष्टावक्र गीताः 18.81)

उस आत्मज्ञान के सुख में सुखी महापुरुष के दर्शन से साधक, सज्जन, धर्मात्मा उन्नत होते हैं, परितृप्त होते हैं और उन महापुरुष को मानने वाले गुरुभक्त देर-सवेर सफल हो जाते हैं । भगवान शिवजी ने कहा हैः

धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोद्भवः ।

धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरुभक्तता ।।

‘जिसके अंदर गुरुभक्ति हो उसकी माता धन्य है, उसका पिता धन्य है, उसका वंश धन्य है, उसके वंश में जन्म लेने वाले धन्य हैं, धरती धन्य है !’

उपासना से इन सभी लाभों की प्राप्ति तभी हो सकती है जब सच्चे मन, श्रद्धा एवं भावना से उपासना की जाय । जैसे जमीन की गहराई में जाने से बहुमूल्य पदार्थों की प्राप्ति होती है, ठीक वैसे ही श्रद्धापूर्वक ईश्वरोपासना द्वारा अंतर्मन में उतरने से दैवी सम्पदा प्राप्त होती है ।

उपासना की मूल भावना यही है कि जल की तरह निर्मलता, विनम्रता, शीतलता, फूल की तरह प्रसन्न एवं महकता जीवन, अक्षत की तरह अटूट निष्ठा, नैवेद्य की तरह मिठास-मधुरता से युक्त चिंतन व व्यवहार, दीपक की तरह स्वयं व दूसरों के जीवन में प्रकाश, ज्ञान फैलाने का पुरुषार्थ अपनाया जाय ।

भगवान श्रीकृष्ण गीता (18.46) में कहते हैं-

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।।

‘उस परमेश्वर की अपने कर्मों से पूजा करके मनुष्य सिद्धि (स्वतः अपने आत्मस्वरूप में स्थिति) प्राप्त करता है ।’

पूज्य बापूजी कहते हैं- “पूजा-अभिषेक में 40 किलो दूध चढ़ाओ या 40 ग्राम, पर पूजा करते-करते तुम मिटते जाते हो कि बनते जाते हो, ईश्वर में खोते जाते हो कि अहंकार में जगते जाते हो – इसका ख्याल करो तो बेड़ा पार हो जायेगा । शिवजी तुम्हारे चार पैसे के दूध के लिए भूखे हैं क्या ? तुम्हारे घी और शक्कर के भूखे हैं क्या ? नहीं…. वे तुम्हारे प्यार के, उन्नति के भूखे हैं । प्यार करते-करते तुम खो जाओ और तुम्हारे हृदय में शिव-तत्त्व प्रकट हो जाय । यह है पूजा का रहस्य !”

एक बार चैतन्य महाप्रभु से एक श्रद्धालु ने पूछाः “गुरुदेव ! भगवान सम्पन्न लोगों की पूजा से सन्तुष्ट नहीं हुए और गोपियों की छाछ व विदुर के शाक उन्हें पसंद आये । लगता है कि पूजा के पदार्थों से उनकी प्रसन्नता का संबंध नहीं है ।”

चैतन्य महाप्रभुः “ठीक समझे वत्स ! प्रभु के ही बनाये हुए सभी पदार्थ हैं फिर उन्हें किस बात की कमी ? वास्तव में पूजा तो साधक के भाव-जागरण की पद्धति है । वस्तुएँ तो प्रतीकमात्र हैं, उनके पीछे छिपा हुआ भाव भगवान ग्रहण करते हैं । भावग्राही जनार्दनः । पूजा में जो-जो वस्तुएँ भगवान को चढ़ायी जाती है, वे इस बात का भी प्रतीक हैं कि उन पूजा सामग्रियों को निमित्त बनाकर हम अपने पंचतत्त्वों से बने तन, तीन गुणों में रमण करने वाले मन, बुद्धि, अहं, इन्द्रिय-व्यवहार को किस प्रकार उन्हें अर्पण कर अपने अकर्ता-अभोक्ता स्वभाव में जग जायें ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अप्रैल-मई 2020, पृष्ठ संख्या 38,39 अंक 328-329

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