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Anmol Yuktiyan

चित्त में आत्मप्रसाद स्थिर करने में सहायक रात्रि


शरद पूर्णिमाः 30 व 31 अक्तूबर 2020

शरद पूनम को चन्द्रमा पृथ्वी के विशेष निकट होता है और बारिश के महीनों के बाद खुले आकाश में चन्द्रमा दिखे तो चित्त विशेष आह्लादित होता है । यह धवल (श्वेत) उत्सव है । ‘अपना अंतःकरण प्राकृतिक पदार्थों को सत्य मानकर मलिन न हो बल्कि जो सत्यस्वरूप सबमें चमक रहा है उसकी स्मृति करके श्वेत हो, शुद्ध हो ।’ – ऐसा संकल्प करना चाहिए । जैसे श्वेत वस्त्र पर ठीक से रंग लग जाता है ऐसे ही श्वेत अंतःकरण, शुद्ध अंतःकरण प परमात्मबोध का रंग लग जाता है और व्यक्ति निर्लेप तत्त्व में ठहर जाता है । अपना चित्त इतना श्वेत करो कि आईने जैसा हो, कैमरे जैसा नहीं । कैमरा जो देखेगा वह अंदर भर लेगा लेकिन आईना जो देखेगा अंदर कुछ नहीं रखेगा, वापस कर देगा, वैसा ही दिखा देगा । ब्रह्मज्ञानी के चित्त और साधारण व्यक्ति के चित्त में इतना फर्क है कि साधारण व्यक्ति का चित्त कैमरे जैसा और ब्रह्मज्ञानी का चित्त आईने जैसा होता है । इसलिए ब्रह्मज्ञानी महापुरुष आनंदित व निर्भीक रहते हैं क्योंकि उनके चित्त पर कोई लेप नहीं लगता ।

शरद पूनम को चन्द्रमा से मानो अमृत टपकता है, जीवनीशक्ति के पोषक अंश टपकते हैं । रात्रि 12 बजे तक चन्द्रमा की पुष्टिदायक किरणें अधिक पड़ती हैं । अतः इस दिन चावल की खीर अथवा दूध में पोहे, मिश्री, थोड़ी इलायची व काली मिर्च आदि मिलाकर चन्द्रमा की चाँदनी में रख के 12 बजे के बाद खाना चाहिए ।

शरद पूनम को ‘पंचश्वेती उत्सव’ भी कहते हैं । दूध श्वेत, चावल श्वेत, मिश्री श्वेत, चौथा श्वेत चन्द्रमा की किरणें पड़ें और पाँचवाँ श्वेत सूती वस्त्र से ढक दें । हो सके तो सफेद चाँदी के गहने या बर्तन डाल सकते हैं । इससे आपकी सप्तधातुओं पर विशेष सात्त्विक प्रभाव पड़ता है । ‘भगवान का आध्यात्मिक तेज चन्द्रमा के द्वारा आज के दिन अधिक बरसा है और वे ही भगवान हमारे तन-मन-मति को पुष्ट रखें ताकि हम गलत जगहों से बचने में सफल हों, रोग बीमारियों से बच जायें और हमारी रोगप्रतिकारक शक्ति के साथ विकार-प्रतिकारक शक्ति का भी विकास हो ।’ – ऐसा चिंतन करके जो खीर या दूध-पोहा खाता है, वर्षभर उसका तन-मन तंदुरुस्त रहता है । मैं तो हर साल खाता हूँ ।

दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की तरफ देखते हुए एकाध मिनट आँखें मिचकाना, बाद में जितना एकटक देख सकें देखना । फिर श्वासोच्छवास को गिनना अथवा ऐसी भावना करना कि ‘चन्द्रमा की शीतल अमृतमयी शांतिदायी, आरोग्यदायी, पुण्यदायी किरणें हम पर बरस रही हैं । जैसे गुरुदेव हमारे आत्मदेव हैं वैसे ही चन्द्रमा भी हमारे आत्मस्वरूप हैं, सुख व आनंद देने वाले, औषधि पुष्ट करने वाले हैं, वे हमारा मन भी पुष्ट करें । शरद पूर्णिमा हमारे जीवन को पूर्ण परमेश्वर की तरफ ले जाय, हमारे चित्त में शीतलता लाये, सुख-दुःख में सम रहने की क्षमता लाये । लाभ-हानि, जय-पराजय, जीवन-मृत्यु – ये सब माया में हो रहे हैं लेकिन मुझ चैतन्य का कुछ नहीं बिगड़ता, इस प्रकार की आत्मनिष्ठावाली हमारी स्थिति लाये । जैसे ज्ञानवानों के चित्त में आत्मप्रसाद स्थिर रहता है, ऐसे ही हम भी अपने चित्त में आत्मप्रसाद स्थिर करें ।’

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2020, पृष्ठ संख्या 13 अंक 334

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दोषों को नष्ट करने हेतु – पूज्य बापू जी


अपने में जो कमजोरी है, जो भी दोष है उनको इस मंत्र द्वारा स्वाहा कर दो । दोषों को याद करके मंत्र के द्वारा मन-ही-मन उनकी आहुति दे डालो, स्वाहा कर दो ।

मंत्रः ॐ अहं ‘तं’ जुहोमि स्वाहा । ‘तं’ की जगर पर विकार या दोष का नाम लें ।

जैसेः ॐ अहं ‘वृथावाणीं’ जुहोमि स्वाहा ।

ॐ अहं ‘कामविकारं’ जुहोमि स्वाहा ।

ॐ अहं ‘चिंतादोषं’ जुहोमि स्वाहा ।

जो विकार तुम्हें आकर्षित करता है उसका नाम लेकर मन में ऐसी भावना करो कि मैं अमुक विकार को भगवत्कृपा में स्वाहा कर रहा हूँ ।’

इस प्रकार अपने दोषों को नष्ट करने लिए मानसिक यज्ञ अथवा वस्तुजन्य (यज्ञ सामग्री से) यज्ञ करो । इससे थोड़े ही समय में अंतःकरण पवित्र होने लगेगा, चरित्र निर्मल होगा, बुद्धि फूल जैसी हलकी व निर्मल हो जायेगी, निर्णय ऊँचे होंगे । इस थोड़े से श्रम से ही बहुत लाभ होगा । आपका मन निर्दोषता में प्रवेश पायेगा और ध्यान-भजन में बरकत आयेगी ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2020, पृष्ठ संख्या 32 अंक 333

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पाचनतंत्र ठीक करने की रहस्यमय कुंजी


पाचनतंत्र कमजोर है और खाना पचाना है तो यह मंत्र हैः

अगस्त्यं कुम्भकर्णं च शनिं च वडवानलम् ।

आहारपरिपाकार्थं स्मरेद् भीमं च पञ्चमम् ।।

ढाई चुल्लू में समुद्र-पान कर जाने वाले महर्षि अगस्त्य, बहुभोजी महाकाय कुम्भकर्म, जिनकी एक नजर पड़ने से ही अकाल पड़ जाता है ऐसे शनिदेव, सब कुछ भस्मसात् कर देने वाली समुद्र के अंदर की प्रबल बड़वाग्नि और अत्यंत तीव्र जठराग्निवाले भीमसेन – इन पाँचों का भोजन के सम्यक् परिपाक के लिए स्मरण करना चाहिए ।

उपरोक्त मंत्र जपते हुए पेट पर बायाँ हाथ घुमाना चाहिए । कहीं-कहीं घड़ी के काँटे घूमने की दिशा में हाथ घुमाने की बात आती है, कहीं-कहीं उसके विपरीत दिशा में हाथ घुमाने की बात आती है । अंतःप्रेरणा से बायें से दायें घुमायें या दायें से बायें, फायदा होगा । इससे आमाशय में पहुँचे भोजन को मलाशय की ओर गतिशील होने में मदद मिलती है ।

उपरोक्त प्रयोग के बारे में पूज्य बापू जी के सत्संग में आता हैः “किसी को भोजन नहीं पचता है मानो अजीर्ण है तो दवाईयाँ, टेबलेट लेते हैं अथवा और कुछ उपचार करते हैं, फाँकी मारते हैं अथवा हाजमा-हजम खाते हैं । उसकी अपेक्षा यह (उपरोक्त) मंत्र है हाजमा-हजम का । यह प्रयोग रहस्यमय है ।

अगस्त्य ऋषि, कुम्भकर्म, शनिदेव, बड़वानल और भीम – इन पाँचों का भोजन पचाने मे हम सुमिरन करते हैं । देशी भाषा में ऐसा भी कहोगे तो चल सकता है ।

जब भी खायें, थोड़ा खायें, संभल के खायें । खाने के बाद मंत्र पढ़ के हाथ पेट पर घुमायें तो पेट का भारीपन ठीक हो जायेगा क्योंकि जठराग्नि प्रदीप्त होगी इस मंत्र के प्रभाव से । अब ठाँस-ठाँस के खाओगे और यह मंत्र-प्रयोग करते रहोगे तो काम नहीं करेगा । कायदे से खाओगे और कभी-कभीर इसका फायदा लोगे तो ठीक है ।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2020, पृष्ठ संख्या 31 अंक 332

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