Monthly Archives: March 2018

न जानने को कौन जानता है ?


(श्री रमण महर्षि पुण्यतिथिः 14 अप्रैल 2018)

श्री रमण महर्षि के एक भक्त ने उनसे पूछाः “मैं रोज सुबह-शाम भगवन्नाम का जप करता हूँ। जप करते-करते बहुत विचार आते हैं। बहुत समय बीतने पर याद आता है कि उन विचारों की भीड़ में मैं जप तो भूल ही गया हूँ। मैं इससे बहुत परेशान हूँ। मुझे क्या करना चाहिए ?”

महर्षि जीः “उस समय भगवन्नाम को पकड़कर रखना चाहिए। आप नाम जप करते हो तो विचारों की भरमार में जब आपको याद आ जाता है कि आप नाम-जप भूल गये हैं तब इस बात का स्मरण बार-बार अपने आपको कराओ और बार-बार भगवन्नाम को पकड़ लो। इससे दूसरे विचार धीरे-धीरे शांत होते जायेंगे।”

संसार की वासनाएँ मिटाने के लिए भगवन्नाम का जप एक अमोघ साधन है। जप-साधना करते समय जब भी मन में व्यर्थ विचार आयें तो उन्हें मिथ्या, आने-जाने वाले समझ के उनके साक्षी बनकर उन्हें देखें। अगर यह सम्भव न हो पाये तो बार-बार भगवन्नाम का आश्रय लें। भगवन्नाम या ॐकार का कभी ह्रस्व, दीर्घ, कभी प्लुत (दीर्घ से भी अधिक लम्बा) उच्चारण करें तो कभी शांत भाव से जप करें। इससे तुरंत ही विचारों की श्रृंखला टूट जायेगी। जप-सातत्य से विचार शांत होते-होते जप के वास्तविक फल आत्मविश्रांति का अनुभव होने लगता है।

एक दिन अनजान यात्री रमण महर्षि के सत्संग में आया। वह कोई भक्त या जिज्ञासु नहीं था फिर भी उनके आश्रम में कुछ दिन रहा।

जाने से पहले बोलाः “स्वामी जी ! जिज्ञासु आपसे प्रश्न पूछते हैं। मुझे भी आपसे प्रश्न पूछने का मन हो रहा है पर मैं तो जानता ही नहीं हूँ कि मैं क्या पूछूँ तो मुझे कैसे मुक्ति मिलेगी ?”

महर्षि जी ने बड़े प्रेम से समझायाः “आपने कैसे जाना कि आप कुछ नहीं जानते ?”

“लोगों के प्रश्न और आपके उत्तर सुनकर मुझे लगा कि मैं तो कुछ भी नहीं जानता।”

“ठीक है, तुमने जान लिया कि तुम कुछ नहीं जानते। इतना काफी है। इससे बढ़कर और क्या चाहिए ?”

“पर स्वामी जी ! केवल इतना जान लेने भर से मुक्ति कैसे मिलेगी ?”

“क्यों नहीं ? कोई एक है जो जानता है कि ‘यह कुछ नहीं जानता।’ यदि तुम खोजकर यह जान लो कि यह ‘कोई’ कौन है तो पर्याप्त है। जब मनुष्य यह मान लेता है कि ‘मैं सब जानता हूँ’ तो उसका अहं बढ़ता है। इससे तो ‘आप कुछ नहीं जानते’ और फिर यह खोज करना कि मुक्ति कैसे मिले ?’ क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं ?”

वह व्यक्ति आनंदित होकर चलता बना। यदि कोई जीवभाव में रहते हुए ही कह दे कि ‘मैं सब जानता हूँ’ तो आत्मा को तो उसने बुद्धि में कैद कर लिया। हकीकत में जो व्यक्ति नम्र, श्रद्धावान, जिज्ञासु होकर संतों-सदगुरुओं का सत्संग सुने, गीता, उपनिषद, योगवासिष्ठ आदि वेदांत-परक ग्रंथों का स्वाध्याय करे और ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों के मार्गदर्शन में ‘मैं कौन हूँ? जानने को अथवा न जानने को – दोनों को जानने वाला तो मैं हूँ। ऐसा विलक्षण ज्ञाता मैं कौन हूँ?’ ऐसे विवेक जगाने वाले पुण्यमय प्रश्नों पर विचार करे, अपने-आपसे पूछता जाय, सत्संग में इनके हल खोजकर तदनुसार चिंतन-मनन करता जाय तो शीघ्र परम लाभ होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 13 अंक 303

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अवतरण दिवस पर क्या भेंट दें ?


(पूज्य बापू जी का 82वाँ अवतरण दिवसः 6 अप्रैल 2018)

भगवान की जयंतियाँ जैसे राम नवमी, जन्माष्टमी मनाते हैं तो हमको ही फायदा होता है, ऐसे ही संतों-महापुरुषों की जयंती, अवतरण दिवस मनाते हैं तो इससे समाज को ही फायदा होता है। ऐसे पर्वों, उत्सवों के निमित्त भगवान के निकट जाने की, दुःखों से छूटने की जो व्यवस्था है वह शास्त्रीय है।

किनका अवतरण दिवस मनायें ?

अपने शरीर का तो जन्मदिन मनाना ही नहीं चाहिए, तुम्हारे माँ-बाप, कुटुम्बी, पड़ोसी भले उसे मनायें। वे मनायें और अगर तुम असावधान रहे तो देहाध्यास पक्का हो जायेगा, यह जोखिम है। उन महापुरुषों का अवतरण दिवस मनाओ जिनके आने से दूसरों का कल्याण हुआ है – श्री कृष्ण, श्री राम, आद्य शंकराचार्य जी, स्वामी रामानंद जी, भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज आदि का मनाओ। अपने शरीर का जन्मदिन मनाना ही चाहो तो जितनी उम्र है उतने बड़दादा (आश्रम के बड़ बादशाह) के फेरे लगा लो और प्रार्थना करो कि ‘इतने वर्ष तो खत्म हो गये, जितने रहे उनकी यात्रा अच्छी हो।’ शरीर का जन्म हुआ, हमारा नहीं हुआ – ऐसा समझना चाहिए।

अपना अहं अर्पित करने की व्यवस्था

माता-पिता को बच्चे के कल्याण में जितना आनंद आता है उससे भी कई गुना ज्यादा आनंद संतों को हम लोगों के उत्थान को देखकर आता है। वे घरबार को, शरीर की सुविधाओं, ऐश आराम को छोड़ के जंगलों, गुफाओं में पहुँचे और हरि से दिल लगाया। जिस परमात्म-सुख के आगे इन्द्र का राज्य भी तुच्छ भासता है ऐसा एकांत समाधि का सुख छोड़कर वे समाज में केवल हमारा उत्थान करने आये हैं।

संतों के पास जाने से लोग संतत्व को उपलब्ध होते हैं। संतों की सेवा करने से लोगों का हृदय शुद्ध होता है। बाकी तो संतों की इन चीजों से कोई बढ़ोतरी नहीं होती है। उनके चरणों में फूल रखने से उनका कुछ बढ़ेगा नहीं और न रखने से कुछ घटेगा नहीं लेकिन फूल रखने के साथ-साथ अपना अहं भी थोड़ा बहुत घटता है, नम्रता का सद्भाव, सदगुण बढ़ता है। आत्मा और परमात्मा के बीच जो हमारा अहं का पर्दा है, इन चीजों को रखने से वह ढीला हो जाता है। ये चीजें हैं तो नश्वर लेकिन शाश्वत के बीच आने वाला जो पर्दा है उसको हटाने में सहायक हैं। गुरुदेव को हम और तो कुछ दे नहीं सकते पर एक माला गुरुमंत्र, आरोग्य मंत्र की जप के गुरुदेव के दीर्घायुष्य, उत्तम आरोग्य के लिए, उनके समाजहितकारी दैवी सेवाकार्य और बढ़ें इसके लिए संकल्प करके अर्पण कर सकते हैं।

तो गुरुदक्षिणा के बदले सेवा करिये

हमें तो आपका रुपया-पैसा नहीं चाहिए पर मुफ्त में सुनोगे तो ज्ञान पचेगा नहीं इसलिए गुरु जी को कुछ तो दक्षिणा रखना चाहिए। तो गुरुदक्षिणा के बदले सेवा करिये, जैसे कि आप कीर्तन करिये, सत्संग सुनिये, दूसरों को प्रोत्साहित करिये, आप तरिये और दूसरों को तारने में मददरूप बनिये…. ऋषि प्रसाद और सत्साहित्य उन तक पहुँचाइये, बचपन में बच्चों में अच्छे संस्कार पड़ें इसलिए उन्हें बाल संस्कार केन्द्र में भेजिये, बाल संस्कार केन्द्र आदि कोई सेवा चालू करिये।

देना ही चाहते हो तो ऐसा दो

कुछ वर्ष पहले की बात है। अवतरण दिवस पर कोई साधक मुझे कुछ भेंट करना चाहते थे। मैंने इन्कार किया लेकिन साधकों का मन दिये बिना मानता नहीं तो मैंने कहा कि “दक्षिणा का लिफ़ाफ़ा मुझे दोगे उससे मैं इतना राज़ी नहीं होऊँगा जितना साधना के संकल्प का लिफ़ाफ़ा देने से होऊँगा। यदि मेरे पास संकल्प लिख के रख दिया जाय कि ‘आज से लेकर आने वाले जन्म दिन तक मैं प्रतिदिन इतने घंटे या इतने दिन मौन रखूँगा अथवा इतने दिन एकांत में रहूँगा…. इतना योगवासिष्ठ का पारायण करूँगा…..’ और भी ऐसा कोई नियम ले लो। वह संकल्प का कागज अर्पण कर दोगे तो मेरे लिए वह तुम्हारी बड़ी भेंटे हो जायेगी।”

अवतरण दिवस पर कुछ देना है तो ऐसी चीज दो कि तुम्हारे अहं को ठोकर लगे और फिर भी तुम्हें दुःख न हो, तुम्हारे अहं को पुचकार मिले फिर भी तुमको आसक्ति न हो तो यह बड़ी उपलब्धि है। एक संकल्प का कागज बना लें कि ‘मैं इस साल कम से कम 10 बार अपमान के प्रसंग में समता रखूँगा।’ तुमने सत्संग तो सुन रखे हैं तो जिस साधन से तुम्हारी आध्यात्मिकता में ऊँचाई आ जाती हो ऐसे साधन का कोई संकल्प कर लो, जैसे कि ‘मैं हिले-डुले बिना इतनी देर एक आसन पर बैठूँगा। हर रोज आधा घंटा नियम से पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो आसन में बैठकर ध्यान करूँगा।’ आसन में बैठ गये, ज्ञान मुद्रा कर ली (अँगूठे के पास वाली पहली उँगली और अँगूठा – दोनों के अग्रभागों को आपस में मिला लिया), गहरा श्वास लिया और ‘ॐऽऽऽऽऽ…..’ का गुंजन किया। ऐसा 40 दिन तक रोज नियम से कम से कम आधा घंटा करो, ज्यादा करो तो और अच्छा है, आधा घंटा एक साथ करो या तो 2-3 बार में करो।

जिन कार्यों से हमारा जीवन, हमारी बुद्धि पवित्र होती है, जिन नियमों से हम परमात्मा के करीब जाते हैं उस प्रकार का कोई नियम हम अपने जीवन में रखें। मानो पिछले साल आप सप्ताह में 6 घंटा मौन रखते थे तो इस साल 8 घंटा रखिये, 10 घंटा रखिये । योगवासिष्ठ को एक या दो बार पढ़ चुके हैं लेकिन फिर से जब पढ़ेंगे तो उससे और गहरा रंग चढ़ेगा। इस प्रकार की किसी साधना को जीवन में लाइये।

जब तुम कोई नियम करोगे तो मन इधर-उधर छलाँग मारने को करेगा पर एक बार जो मन के ऊपर आपकी लगाम लग जायेगी तो दोबारा भी लग जायेगी, तिबारा भी लग जायेगी फिर मन आपके अधीन हो जायेगा, मन के आप स्वामी हो जायेंगे।

साधारण व्यक्ति जो भी कर्म करता है सुख पाने की इच्छा से करता है, दुःख मिटाने और अच्छा कहलाने के लिए करता है, कुछ पाने, कुछ हटाने की इच्छा से करता है। इच्छा से कर्म बंधनरूप हो जाते हैं। कर्म परहित के लिए करें तो कर्म का प्रवाह प्रकृति में चला जाता है और कर्ता अपने ‘स्व’ स्वभाव – आत्मस्वभाव में विश्रांति पाता है।

अवतरण दिवस के पीछे उद्देश्य

जो त्यौहार किसी महापुरुष के अवतरण दिवस या जयंती के रूप में मनाये जाते हैं, उनके द्वारा समाज को सच्चरित्रता, सेवा, नैतिकता, सद्भावना आदि की शिक्षा मिलती है।

सनातन धर्म में त्यौहारों को केवल छुट्टी का दिन अथवा महापुरुषों की जयंती ही न समझ कर उनसे समाज की वास्तविक उन्नति तथा चहुँमुखी विकास का उद्देश्य सिद्ध किया गया है।

-पूज्य बापू जी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 303

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अपने से नाराज हुए बिना दूसरे से नाराजगी सम्भव नहीं


एक परिवार में तीन बहुएँ थीं। बड़ी बहू की कोई कितनी ही सेवा करे पर वह  हमेशा मुँह फुलाये रहती थी। मँझली बहू किसी आत्मवेत्ता गुरु की शिष्या थी और सत्संग प्रेमी, विवेकी, सेवा भक्तिवाली, उदार एवं शांतिप्रिय थी। छोटी बहू साधारण श्रेणी की थी। राज़ी करके उससे चाहे जितना काम करा लो परंतु बकवास, निंदा-चुगली करने वालों के काम में हाथ नहीं लगाती थी, अतः अपनी बड़ी जेठानी की सेवा तो वह कर ही कैसे सकती थी ! लेकिन छोटी जेठानी की खूब सेवा करती थी। और मँझली बहू का तो कहना ही क्या ! वह सबसे  प्रेमभरा, आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करते हुए सबकी सेवा करती थी।

आखिर एक दिन छोटी बहू ने मँझली से पूछ ही लियाः “दीदी ! बड़ी दीदी आप पर सदा नाराज रहती हैं। कभी अपशब्द भी बोल देती हैं, फिर भी आप उनकी सेवा करती हैं। उनके प्रति मैंने कभी आपसे कोई शिकायत नहीं सुनी, बात क्या है ?”

मँझली बहू ने कहाः “बहन ! बड़ी दीदी की गाली मुझ तक पहुँचती ही नहीं। वाणी की पहुँच कानों तक ही तो है। मुझ तक तो मेरी बुद्धि की भी पहुँच नहीं है, जो इस सृष्टि का सबसे बड़ा औजार है। और वे सदा नाराज रहती हैं तो अपने से रहती हैं। क्या कोई अपने से नाराज हुए बिना दूसरे से नाराज हो सकता है? स्वयं बुरा बनकर ही कोई दूसरों का बुरा कर सकता है। उनकी नाराजगी मुझ तक पहुँचती ही नहीं है क्योंकि जहाँ नित्य, अविनाशी आनंद-ही-आनंद है, वहाँ उत्पत्ति-विनाशशील नाराजगी कैसे पहुँच सकती है, क्या कर सकती है ? मेरे गुरुदेव ने बताया है कि ‘दूसरों के अधिकार की रक्षा  और अपने अधिकार का त्याग करने वाला कभी दुःखी नहीं हो सकता।’ इस प्रकार नाराजगी को हर पहलू से समझने पर नाराजगी का महत्त्व ही नहीं रहता। संसार अपना, चिद्घन चैतन्यस्वरूप आत्मा अपना…. जहाँ राज़ी-नाराजगी हो-होकर मिट जाती है उस अपने आत्मदेव में जगना ही सार है, बाकी सब बेकार है।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मार्च 2018, पृष्ठ संख्या 21 अंक 303

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