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आत्मस्वरूप का भान


Hariom prabhuji,

Tamogun me aatmabhyas karna kathin kyon lagta hai? Satvagun me to lagta hai, ki ye sab guno ka khel hai. Lekin ye drishti bhi satvagun ke samay bhasit hoti hai, tamogun ke samay – prayatn karne par bhi apni asangta pratyaksha bhasit nahi hoti.

Tamogun me buddhi mand hone karan aisa lagta hai, lekin humara aatma to buddhi ke aashrit nahi hai. Fir uska bhan kyon nahi hota?

Aatmabhyas me kahan kami hai, kaise pata chale?
HariOm

Dhanyawad

—– उत्तर —–

हरि ॐ,
          अभ्यास मन, बुद्धि से ही किया जाता है और हम अपना अस्तित्व भी मन, बुद्धि से जुड़कर ही मानते है। मन, बुद्धि को छोड़कर हमारा मूल स्वरूप है उस में टिकते नहीं। इसलिए गुणों का प्रभाव हम पर पड़ता है ऐसी भ्रान्ति होती है।

आत्माभ्यास करने का तरिका सही है या नहीं ये जानने से उसकी कमी मालूम पड़ेगी। जब तक मन, बुद्धि के द्वारा आत्माभ्यास करेंगे तब तक आत्मा में नहीं टिक सकेंगे क्योंकि आत्मा मन, बुद्धि का विषय नहीं है, मन बुद्धि को त्यागने पर आत्मा का ज्ञान होगा। और मन, बुद्धि से अभ्यास करने पर वे बने रहेंगे.

विशेष जानकारी के लिए साथ में भेजी हुई फ़ाइल पढो।

Self Enquiry Method

– डॉ. प्रेमजी

स्वास्थ्यवर्धक हितकारी भोजन कैसा हो ?


सात्त्विक आहार से जीवन में सात्त्विकता और राजसिक-तामसिक आहार से आचरण में स्वार्थपूर्ण एवं पाशविक वृत्तियाँ बढ़ती हैं। हमारा आहार कैसा हो इस संबंध में नीचे कुछ बिंदु दिये जा रहे हैं।

भोजन नैतिक हो

अनैतिक स्रोतों से धन द्वारा निर्मित भोजन करने से मन में अशांति, भय, अस्थिरता रहती है, जिससे शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता घटती है, रोगों के पैदा होने की सम्भावनाएँ बढ़ने लगती हैं। जो भोजन अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर, दूसरों के अधिकार को छीने बिना, ईमानदारी से अर्जित साधनों से प्राप्त किया जाता है, वह भोजन नैतिक होता है। साधन-भजन में उन्नति तथा मन-बुद्धि की सात्त्विकता के लिए जरूरी है कि भोजन नैतिक हो।

शुद्ध भाव व सात्त्विकता से बनाया गया हो

भोजन बनाने वालों के भावों की तरंगें भी हमारे भोजन को प्रभावित करती हैं। होटल या बाजार के भोजन में घर में बने भोजन जैसी स्वच्छता, पवित्रता और उच्च भावों का अभाव होने से उससे मात्र पेट भरा जा सकता है, मन-बुद्धि में शुभ विचारों का निर्माण नहीं किया जा सकता। राजसी-तामसी भोजन जैसे – लहसुन, शराब, बासी खुराक, मासिक धर्मवाली महिला के हाथ का बना भोजन रजो-तमोगुण बढ़ाता है, सत्त्वगुण की ऊँचाई से गिरा देता है। शुद्ध भाव वाले, सात्त्विक व्यक्तियों द्वारा बनाया हुआ भोजन करना चाहिए।

मौसम के अनुकूल हो

जिस मौसम में जो फल, सब्जियाँ और अन्य खाद्य पदार्थ सहजता व सरलता से भरपूर मात्रा में उपलब्ध हों वे सारे पदार्थ प्रायः स्वास्थ्य के अनुकूल होते हैं।

पौष्टिक व संतुलित हो

अव्यवस्थित, असंतुलित और अऩुचित आहार शरीर को ऊर्जा देने के स्थान पर ऊर्जा का ह्रास करता है। भोजन में शरीर की शक्ति, पुष्टि प्रदान करने वाले प्रोटीन, शर्करा, वसा, खनिज, विटामिन्स उचित अनुपात और पर्याप्त मात्रा में होने चाहिए एवं भोजन षड् रस युक्त होना चाहिए ताकि शरीर में अच्छे कोषाणुओं का निरंतर सृजन होता रहे। भोजन में स्निग्ध पदार्थों का उपयोग हो, जैसे घी, तेल आदि। हलका भोजन शीघ्र ही पच जाता है तथा स्निग्ध और उष्ण भोजन शरीर के बल तथा पाचकाग्नि को बढ़ाता है। स्निग्ध (चिकनाईयुक्त) भोजन वात का शमन करता है, शरीर को पुष्ट व इन्द्रियों को दृढ़ करता है, अंग-प्रत्यंग के बल को बढ़ाता है एवं शरीर की रूक्षता को हटा के चिकनापन ला देता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2017, पृष्ठ संख्या 30 अंक 296

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सर्वपापनाशक, सर्वहितकारी, मंगलमय मंत्र-विज्ञान


पूज्य बापू जी के सत्संग-अमृत में आता हैः “ॐकार का, भगवन्नाम जप करने से आपको स्वास्थ्य के लिए दुनियाभर की दवाइयों, टॉनिकों, कैप्सूलों और इंजेक्शनों की शरण नहीं लेनी पड़ेगी। भक्तिरस से ही स्वास्थ्य बना रहता है। खुशी के लिए क्लबों में जूठी शराब, जूठे डिनरों का सहारा नहीं लेना पड़ता।

भगवान का नाम लेना कोई कर्म या क्रिया नहीं है, अपनत्व की पुकार है। इस पुकार से पुराने संस्कार, वासनाएँ मिटती हैं। सतयुग में तो 12 साल सत्यव्रत धारण करें तब कुछ मिले, त्रेता में तप करें, द्वापर में यज्ञ करें, ईश्वरोपासना करें तब कुछ पुण्याई मिले, पाप-ताप नष्ट हों लेकिन कलियुग में तो केवल भगवन्नाम-जप जापक के पाप-ताप ऐसे नष्ट कर देता है कि सोच भी नहीं सकते।

जब ही नाम हृदय धर्यो भयो पाप को नास।

जैसे चिनगी आग की पड़ी पुराने घास।।

जैसे सूखी घास के ढेर को एक चिनगारी मिल गयी तो सारी घास चट ! ऐसे ही जब भगवन्नाम गुरु के द्वारा मिलता है और अर्थसहित जपते हैं तो वह सारे अनर्थों की निवृत्ति कर देता है, जन्म-जन्मांतरों के संस्कार मिटते जाते हैं और भगवद शांति, प्रीति और आनंद बढ़ता है तथा जीवात्मा अपने परमात्मवैभव को पाकर तृप्त हो जाता है, परम अर्थ – ब्रह्मज्ञान को पा लेता है।

भगवन्नाम जब से अंतर में रस जागृत होगा व बढ़ेगा। आप केवल प्रीतिपूर्वक, आदरपूर्वक, अर्थसहित, नियमित जपते जायें। यह आपको परमात्मदेव में, परमात्मसुख में प्रतिष्ठित कर देगा। जब तक भगवत्प्राप्ति नहीं हुई तब तक गुरुमंत्र आपका पीछा नहीं छोड़ता, मरने के बाद भी वह आपको यात्रा कराकर भगवान तक ले जाता है।

ताकि पतन न हो……

24 घंटों में 1440 मिनट होते हैं। इन 1440 मिनटों में से 440 मिनट ही परमात्मा के लिए लगाओ। यदि 440 मिनट नहीं लगा सकते तो 240 मिनट ही लगाओ। अगर इतने भी नहीं लगा सकते तो 140 मिनट ही लगाओ। अगर इतने भी नहीं तो 100 मिनट अर्थात् करीब पौने दो घंटे ही उस परमात्मा के लिए लगाओ तो वह दिन दूर नहीं होगा जब – जिसकी सत्ता से तुम्हारा शरीर पैदा हुआ है, जिसकी सत्ता से तुम्हारे दिल की धड़कनें चल रही हैं, वह परमात्मा तुम्हारे हृदय में प्रकट हो जायेगा।

24 घंटे हैं आपके पास….. उनमें से 6 घंटे सोने में और 8 घंटे कमाने में लगा दो तो 14 घंटे हो गये। फिर भी 10 घंटे बचते हैं। उनमें से अगर 5 घंटे भी आप-इधर, गपशप में लगा देते हैं तब भी 5 घंटे भजन कर सकते हैं। 5 घंटे नहीं तो 4, 4 नहीं तो 3, 3 नहीं तो 2, 2 नहीं तो 1.5 घंटा तो रोज़ अभ्यास करो ! यह 1.5 घंटे का अभ्यास आपका कायाकल्प (पूर्णतः रूपांतरण) कर देगा।

आप श्रद्धापूर्वक गुरुमंत्र का जप करेंगे तो आपके हृदय में विरहाग्नि पैदा होगी, परमात्म-प्राप्ति की भूख पैदा होगी। जैसे उपवास के दौरान सहन की गयी भूख आपके शरीर की बीमारियों को हर लेती है, वैसे ही भगवान को पाने की भूख आपके मन व बुद्धि के दोषों को, शोक को व पापों को हर लेगी।

कभी भगवान के लिए विरह पैदा होगा तो कभी प्रेम…. प्रेम से रस पैदा होगा और विरह से प्यास पैदा होगी। भगवन्नाम जप आपके जीवन में चमत्कार पैदा कर देगा। परमेश्वर का नाम प्रतिदिन 1000 बार तो लेना ही चाहिए। अर्थात् भगवन्नाम की 10 मालाएँ तो फेरनी ही चाहिए ताकि उन्नति तो हो और पतन न हो। अपने गुरुमंत्र का अर्थ समझकर प्रीतिपूर्वक जप करें। इससे बहुत लाभ होगा।

शास्त्र में आता है

देवाधीनं जगत्सर्वं मंत्राधीनाश्च देवताः।

‘सारा जगत देव के अधीन है और समस्त देव मंत्र के अधीन हैं।’

संत चरनदासजी महाराज ने बहुत ऊँची बात कही हैः

श्वास-श्वास सुमिरन करो यह उपाय अति नेक।।

संत तुलसीदास जी ने कहा हैः

बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं।

जनम अनेक रचित अघ दहहीं।। (श्री रामचरित. बां. कां. 118.2)

जो विवश होकर भी भगवन्नाम जप करते हैं उनके अनेक जन्मों के पापों का दहन हो जाता है।

कोई डंडा मारकर, विवश करके भी भगवन्नाम जप कराये तो भी अनेक जन्मों के पापों का दहन होता है तो जो प्रीतिपूर्वक भगवान का नाम जपते हैं, भगवान का ध्यान करते हैं उऩके उज्जवल भविष्य का, पुण्याई का क्या कहना !

शक्तियों का पुंज-गुरुमंत्र

भगवन्नाम की बड़ी भारी महिमा है। यदि हमने ‘अहमदाबाद’ कहा तो उसमें केवल अहमदाबाद ही आया, सूरत, गांधीनगर रह गये। अगर हमने गुजरात कहा तो सूरत, गांधीनगर, राजकोट आदि सब उसमें आ गये परंतु मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि रह गये…. किंतु तीन अक्षर का नाम भारत कहने से देश के सभी राज्य और नगर उसमें आ गये। ऐसे ही केवल पृथ्वीलोक ही नहीं वरन् 14 लोक और अनंत ब्रह्मांड जिससे व्याप्त हैं, उस भगवद्-सत्ता, गुरु-सत्ता के नाम अर्थात् भगवन्नामयुक्त गुरुमंत्र में पूरी दैवी शक्तियों तथा भगवदीय शक्तियों का समावेश हो जाता है।

साधक को चाहिए कि निरंतर जप करे। सतत भगवन्नाम जप विशेष हितकारी है। मनोविकारों का दमन करने में, विघ्नों का शमन करने में और 15 दिव्य शक्तियाँ जगाने में मंत्र भगवान अदभुत सहायता करते हैं।

बार-बार भगवन्नाम जप करने से एक प्रकार का भगवदीय रस, भगवदीय आनंद और भगवदीय अमृत प्रकट होने लगता है। जप से उत्पन्न भगवदीय आभा आपके पाँचों शरीरों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय शरीर) को तो शुद्ध रखती ही है, साथ ही आपके अंतःकरण को भी तृप्त करती है।

जिन गुरुमुखों ने, भाग्यशालियों ने, पुण्यात्माओं ने सदगुरु के द्वारा भगवन्नाम पाया है, उनका चित्त परमात्मसुख से तृप्त होने लगता है। फिर उऩको दुनिया की कोई चीज वस्तु आकर्षित करके अंधा नहीं कर सकती। फिर वे किसी भी चीज वस्तु से प्रभावित होकर अपना हौसला नहीं खोयेंगे। उनका हौसला बुलंद होता जायेगा। वे ज्यों-ज्यों जप करते जायेंगे, सदगुरु की आज्ञाओं का पालन करते जायेंगे, त्यों-त्यों उनके हृदय में आत्म-अमृत उभरता जायेगा।”

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2017, पृष्ठ संख्या 4,5,9 अंक 296

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