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आँवला


आयुर्वेद के मतानुसार, आँवले थोड़े खट्टे, कसैले, मीठे, ठंडे, हल्के, त्रिदोष (वात-पित-कफ) का नाश करने वाले, रक्तशुद्धि करने वाले, रुचिकर, मूत्रल, पौष्टिक, वीर्यवर्धक, केशवर्धक, टूटी अस्थि जोड़ने में सहायक, कांतिवर्धक, नेत्रज्योतिवर्धक, गर्मीनाशक एवं दाँतों को मजबूती प्रदान करने वाले होते हैं।

आँवले वातरक्त, रक्तप्रदर, बवासीर, दाह, अजीर्ण, श्वास, खांसी, दस्त, पीलिया एवं क्षय जैसे रोगों में लाभप्रद होते हैं। आँवले के सेवन से आयु, स्मृति, कांति एवं बल बढ़ता है, हृदय एवं मस्तिष्क को शक्ति मिलती है, आँखों का तेज बढ़ता है और बालों की जड़ मजबूत होकर बाल काले होते हैं।

औषधि प्रयोगः

श्वेत प्रदरः 3 से 5 ग्राम चूर्ण को मिश्री तथा दूध की मलाई के साथ प्रतिदिन दो बार लेने से अथवा इस चूर्ण को शहद के साथ चाटने से श्वेत प्रदर ठीक होता है।

सिरदर्दः आँवले के 3 से 5 ग्राम चूर्ण को घी एवं मिश्री के साथ लेने से पित्त तथा वायु दोष से उत्पन्न सिरदर्द में राहत मिलती है।

प्रमेह(धातुक्षय) आँवले के रस में ताजी हल्दी का रस अथवा हल्दी का पाउडर व शहद मिलाकर सुबह-शाम पियें अथवा आँवले एवं हल्दी का चूर्ण रोज सुबह-शाम शहद अथवा पानी के साथ लें। इससे प्रमेह मिटता है। पेशाब के साथ धातु जाना बंद होता है।

वीर्यवृद्धि के लिएः आँवले के रस में घी तथा मिश्री मिलाकर रोज पीने से वीर्यवृद्धि होती है।

कब्जियतः गर्मी के कारण हुई कब्जियत में आँवले का चूर्ण घी एवं मिश्री के साथ चाटें अथवा त्रिफला (हरड़, बहेड़ा, आँवला) चूर्ण आधे से एक चम्मच रोज रात्रि को पानी के साथ लें। इससे कब्जियत दूर होती है।

अत्यधिक पसीना आने परः हाथ पैर में अत्यधिक पसीना आता हो तो प्रतिदिन आँवले के 20 से 30 मि.ली. रस में मिश्री डालकर पियें अथवा त्रिफला चूर्ण लें। आहार में गर्म वस्तुओं का सेवन न करें।

दाँत की मजबूतीः आँवले के चूर्ण को पानी में उबालकर उस पानी से कुल्ले करने से दाँत मजबूत एवं स्वच्छ होते हैं।

आँवला एक उत्तम औषधि है। जब ताजे आँवले मिलते हों, तब इनका सेवन सबके लिए लाभप्रद है। ताजे आँवले का सेवन हमें कई रोगों से बचाता है। आँवले का चूर्ण, मुरब्बा तथा च्यवनप्राश वर्ष भर उपयोग किया जा सकता है।

(साँईं श्री लीलाशाह जी उपचार केन्द्र, जहाँगीरपुरा, वरियाव रोड, सूरत)

गोघृत

गोघृत सब स्नेहों में सबसे उत्तम माना जाता है। गाय का घी स्निग्ध, गुरु, शीत गुणों से युक्त होता है तथा यह संस्कारों से अन्य औषध द्रव्यों के गुणों का अनुवर्तन करता है। स्निग्ध होने के कारण वात को शांत करता है, शीतवीर्य होने से पित्त को नष्ट करता है और अपने समान गुणवाले कफदोष को कफघ्न औषधियों के संस्कार द्वारा  नष्ट करता है। गोघृत रसधातु, शुक्रधातु और ओज के लिए हितकारी होता है। यह दाह को शांत करता है, शरीर को कोमल करता है और स्वर एवं वर्ण को प्रसन्न करता है। गोघृत से स्मरणशक्ति और धारणाशक्ति बढ़ती है, इन्द्रियाँ बलवान होती हैं तथा अग्नि प्रदीप्त होती है।

शरद ऋतु में स्वस्थ मनुष्य को घृत का सेवन करना चाहिए क्योंकि इस ऋतु में स्वाभाविक रूप से पित्त का प्रकोप होता है। ʹपित्तघ्नं घृतम्ʹ के अनुसार गोघृत पित्त और पित्तजन्य विकारों को दूर करने के लिए श्रेष्ठ माना गया है। समग्र भारत की दृष्टि से 16 सितम्बर से 14 नवम्बर तक शरद ऋतु मानी जा सकती है।

पित्तजन्य विकारों के लिए शरद ऋतु में घृत का सेवन सुबह या दोपहर में करना चाहिए। घृत पीने के बाद गरम जल पीना चाहिए। गरम जल के कारण घृत सारे स्त्रोतों में फैलकर अपना कार्य करने में समर्थ होता है।

अनेक रोगों में गाय का घी अन्य औषध द्रव्यों के साथ मिलाकर दिया जाता है। घी के द्वारा औषध का गुण शरीर में शीघ्र ही प्रसारित होता है एवं औषध के गुणों का विशेष रूप से विकास होता है। अनेक रोगों में औषधद्रव्यों से सिद्ध घृत का उपयोग भी किया जाता है जैसे, त्रिफला घृत, अश्वगंधा घृत आदि।

गाय का घी अन्य औषधद्रव्यो से संस्कारित कराने की विधि इस प्रकार हैः

औषधद्रव्य का स्वरस अथवा कल्क 50 ग्राम लें। उसमें गाय का घी 200 ग्राम और पानी 800 ग्राम डालकर उसे धीमी आँच पर उबलने दें। जब सारा पानी जल जाय और घी कल्क से अलग एवं स्वच्छ दिखने लगे तब घी को उतारकर छान लें और उसे एक बोतल में भरकर रख लें।

सावधानीः शहद और गाय के घी का समान मात्रा में सेवन विषतुल्य होता है। अतः इनका प्रयोग विषम मात्रा में ही करना चाहिए।

अत्यन्त शीत काल में या कफप्रधान प्रकृति के मनुष्यों द्वारा घृत का सेवन रात्रि में किया गया तो यह आफरा, अरुचि, उदरशूल और  पाण्डु रोग को उत्पन्न करता है। अतः ऐसी स्थिति में दिन ही घृतपान करना चाहिए। जिन लोगों के शरीर में कफ और मेद बढ़ा हो, जो नित्य मंदाग्नि से पीड़ित हों, अन्न में अरुचि हो, सर्दी, उदररोग, आमदोष से पीड़ित हों ऐसे व्यक्तियों को उन दिनों में घृत का सेवन नहीं करना चाहिए।

औषधि प्रयोगः

गर्भपातः सगर्भावस्था में अशोक चूर्ण को घी के साथ लेने पर गर्भपात से रक्षा होती है।

वीर्यदोषः अश्वगंधा चूर्ण घी और मिश्री में मिलाकर देने से  अथवा आँवले का रस घी के साथ देने से वीर्य की वृद्धि तथा शुद्धि होती है। शुक्रनाश में इलायची और हींग 200 से 300 मि.ग्रा. घी के साथ देने से लाभ होता है।

(धन्वन्तरि आरोग्य केन्द्र, साबरमती अमदावाद)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2000, पृष्ठ संख्या 29, 30 अंक 94

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अहंकार का खेल


संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से

प्रकृतेः क्रियामाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

ʹवास्तव में सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं। परन्तु अहंकार से मोहित हुआ पुरुष ʹमैं कर्ता हूँʹ ऐसा मान लेता है।ʹ (भगवदगीताः 3-27)

किसी छोटे किसान के घर लड़की वाले लड़का देखने आने वाले थे। किसान ने अपने घर में किसी के दौ बैल लाकर बाँध दिये, किसी का घोड़ा लाकर रख दिया और किसी पंचायती धर्मशाला में अपनी गद्दी बिछाकर बैठ गया। आस-पास में हरे भरे खेत भी थे।

लड़की वाले आये तो उसने कह दिया किः “ये बैल, घोड़ा और मकान मेरे हैं। ये हरे भरे खेत भी अपने ही हैं।” लड़की वालों ने सोचा किः ʹयह तो कोई बड़ा साहूकार है ! चलो, यहाँ मँगनी पक्की कर लो।ʹ

मकान तो पंचायती है, घोड़ा बैल पड़ोसियों के हैं लेकिन कह दिया कि ʹये मेरे हैं।ʹ ऐसे ही ये इन्द्रियाँ और पाँच भूतों का मकान पंचायती है। इस पंचभौतिक (पंचायती) शरीर को ʹमैंʹ मानकर तथा इन इन्द्रियरूपी घोड़ों को ʹमेराʹ मानकर मनुष्य इनमें आसक्त होकर कर्म करता है। इसीलिए वह कर्मबंधन में बँध जाता है। कर्म तो होते हैं पंचायती मकान में, कर्म होते हैं इन्द्रियों के द्वारा लेकिन यह जीव अपने को उनका कर्त्ता मान लेता है।

जैसे, आँख देखती है परन्तु जीव कहता है कि ʹमैं देखता हूँ।ʹ कान सुनते हैं तो बोलता है कि ʹमैं सुन रहा हूँ।ʹ मन सोचता है तो कहता है कि ʹमैं सोचता हूँ।ʹ बुद्धि निर्णय करती है तो बोलता है कि ʹयह मेरा निर्णय है।ʹ इन्द्रियों के साथ मन को जोड़ता है और मन के साथ बुद्धि को जोड़कर उनके साथ स्वयं भी घुल-मिल जाता है। इस बात का उसे पता ही नहीं होता कि उसकी आत्मा शुद्ध-बुद्ध, चैतन्यस्वरूप, अकर्त्ता एवं अभोक्ता है। अहंकार के कारण मूढ़ हुआ यह जीव कर्म के फंदे में फँस जाता है। जिसकी सत्ता से कर्म हो रहे हैं उस परमेश्वर को वह नहीं जानता है और न ही उस प्रकृति को जानता है जिसमें कर्म हो रहे हैं, जो कर्म करती है। अविद्या के कारण यह जीव बीच में अपनी टाँग अड़ा देता है।

जैसे, विद्युत की सत्ता से बिजली के सारे उपकरण चलते हैं। लग तो रहा है कि बल्ब प्रकाश दे रहा है, टयूबलाईट रोशनी दे रही है लेकिन टयूबलाइट की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। आवाज को ʹस्पीकरʹ तक पहुँचाने की ʹमाइकʹ की अपनी स्वतंत्र सत्ता नहीं है प्रत्युत जिसकी सत्ता लेकर यह जड़ माया सत्य जैसी दिख रही है, उस परमेश्वर की सत्ता है। वह परमेश्वर जीव का सनातन सखा है। जीव उस सनातन स्वरूप का ही अंश है। परन्तु यह जीव प्रकृति के कर्मों को अपने ऊपर थोप लेता है। प्रकृति को जहाँ से सत्ता मिलती है उस परमेश्वर की ओर यह जीव नहीं देखता है।

करन करावनहार स्वामी, सकल घटां के अन्तर्यामी।

ऐसा कौन बैठा है जो शरीर में रक्त बना रहा है ? इतनी तेजी से रक्त का संचार होता है कि यदि शरीर के किसी भाग में इन्जेक्शन लगायें तो उसमें भरी औषधि पूरे शरीर में फैल जाती है। न चाहने पर भी बालों को सफेद कौन कर रहा है ? आप नहीं चाहते कि बाल सफेद हो जायें, चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ जायँ लेकिन पड़ जाती हैं। ….तो आपके कहने में जो नहीं चलता वह आप नहीं हैं। वह कुछ और ही वस्तु है, फिर भी उसे अपने पर थोप लेते हैं।

यह अहंकार न जाने कैसे-कैसे वेश बदलता है ? यह जरूरी नहीं कि साधु हो जाओ तो अहंकार आपको छोड़ देगा। ना ना। अरे ! जो जेल जाते हैं उनको भी अहंकार छोड़ता नहीं है। पुराना कैदी नये कैदी से पूछता हैः “क्यों रे ! कितनी सजा है ?” जवाब मिलता हैः “छः महीने की।” पुराना कैदी कहता हैः “अपना बिस्तर बाहर बरामदे में लगा। तुझे पता नहीं यहाँ तीस सालवाले मर्द रहते हैं ? तू तो कल का बच्चा है। कोई छोटी-मोटी हरकत की होगी। सिर्फ छः महीने की सजा ! तू अभी नवसिखुआ लगता है। पहली बार आया है क्या ?”

नये कैदी ने ʹहाँʹ के जवाब में सिर हिलाया।

पुराना कैदी बोलाः ” मैं तो चौथी बार आया हूँ।”

जेल जाने का भी अहंकार होता है।

आप अकेले में बैठकर पूजा कर रहे हो तो घंटी अपने ढंग की बजेगी लेकिन यदि घर में दो चार भक्त आ गये तो घंटी बजाने में अहंकार भी कुछ खेल खेलेगा। आरती बोलने में भी लम्बा विस्तार करने लगेगा। और तो क्या कहें ? बैलगाड़ी हाँकने वाले लड़के जब खेतों के बीच में से आयेंगे तो अपनी चाल में भी होंगे किन्तु जब गाँव में प्रवेश करेंगे तब बैलों की पूँछ मरोड़ेंगे, उनको दौड़ायेंगे। साइकिल और रिक्शावाले भी जब अपने मुहल्ले में जायेंगे तो आगे कोई नहीं होगा फिर भी ʹहार्नʹ बजायेंगे। यह अहंकार कैसे-कैसे खेल खेलता है ! भगवान की कृपा हो और सावधानी बरती जाय तभी इससे बचा जा सकता है, नहीं तो यह सबको निगल जाता है।

दोपहर का समय था। बुद्धु हलवाई दुकान पर बैठा था। ऊपर कुछ कागजात पड़े हुए थे। चूहों और बिल्ली की भाग-दौड़ में कागजों का बंडल गिरा। उनमें से छमाही परीक्षा का परिणाम हाथ में आया। बुद्धु हलवाई देखता हैः इतिहास में पाँच अंक और गणित में सिर्फ तीन अंक ! प्रत्येक विषय में इतने कम अंक देखकर उसे बड़ा गुस्सा आया। वह आगबबूला हो गया। इतने में ही उसका लड़का पाठशाला से आया। बुद्धु हलवाई ने उसका कान पकड़कर कहाः “रोज दो-पाँच रूपये लेता है और परीक्षा का परिणाम ! देख, तीन अंक, पाँच अंक !

लड़के ने कहाः “पापा ! यह मार्कशीट तो बहुत पुरानी है। आगे देखिये, उस पर आपका नाम लिखा है। मेरी मार्कशीट तो मेरे पास है।

बुद्धु हलवाई का गुस्सा न जाने कहाँ चला गया। हमें अपनी गलती दिखती नहीं है और यदि दिखती है तो बहुत छोटी हो जाती है परन्तु यदि दूसरे की है तो बड़ी दिखती है। यह अहंकार की पहचान है। परिवार में देवरानी जेठानी आपस में क्यों लड़ती हैं ? अपने अधिकार की रक्षा और दूसरे का कर्त्तव्य, इसी से झगड़ा होता है। ʹतेरा यह कर्त्तव्य है…. मेरा यह अधिकार है।ʹ यदि हम अपना कर्त्तव्य देखें और सामने वाले के अधिकार की रक्षा करें तो कुटुम्ब, समाज और देश स्वर्ग में बदल जायेगा। हम लोग क्या करते हैं ? अपने अधिकार की रक्षा करते हैं और सामने वाले को उसका कर्त्तव्य बताते हैं- “साधु संत की सेवा करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। वक्ता आ जाय तो अपना तन, मन, धन अर्पण कर देना तुम्हारा कर्त्तव्य है।

मैं आपको आपके कर्त्तव्य और मेरा अधिकार बताऊँ तो मेरे अंदर का रस प्रगट नहीं होगा और आपके अंतःकरण में रसस्वरूप की कोई अनुभूति नहीं होगी। यदि मैं अपने कर्त्तव्य की रक्षा करूँ… आप चार कदम चलकर भगवान के नाते, संत के नाते यहाँ आये रो तो यह देखना मेरा कर्त्तव्य है कि आपके पाप मिट जायें, आपकी अशांति मिट जाय और जीवन की शाम होने से पहले जीवनदाता का दर्शन करने की तड़प आपमें पैदा हो जाय, आपकी अविद्या मिट जाय। अगर मैं अपना ऐसा कर्त्तव्य समझता हूँ और अपने अधिकार के प्रति लापरवाह रहता हूँ तो मेरा अधिकार अपने आप मेरे पीछे-पीछे खिंचकर आयेगा और मेरी सेवा करेगा। मेरा कर्त्तव्य पालने का मुझे आनंद भी आयेगा। जीवन जीने का यही सही तरीका है।

किसान ने अनजान कन्यापक्षवालों को धोखा देने के लिए भले ही झूठ बोल दिया किः ʹये बैल, घोड़ा, मकान आदि मेरे हैं…..ʹ लेकिन जिसने पंचायती मकान बनाया है वह तो जानता है कि यह किसका है। ऐसे ही हम कह रहे हैं किः ʹयह मैं हूँ और यह मेरा है…ʹ लेकिन जिस प्रकृति और परमात्मा ने यह सब बनाया है वे तो जानते हैं कि किसका है। फिर उसको ʹमैंʹ और ʹमेराʹ मानना यह नादानी है।

शास्त्रों में आता हैः ʹजिसकी वाणी और मन दोनों पवित्र हैं तथा सत्य एवं धर्म के द्वारा सुरक्षित हैं और जो शरीर, मन तथा इन्द्रियों को अपना नहीं मानता है, उसको वेदान्त का फल अपने आप मिल जाता है।ʹ

जो ईमानदारी एवं तत्परता से कार्य करता है लेकिन अपने में कर्त्तापने को आरोपित नहीं करता वह कर्मयोगी है।

एक बाबाजी ने सत्संगियों के बीच किसी सेठ की प्रशंसा करते हुए कहा किः “ये तो बड़े दानवीर हैं, बहुत अच्छे हैं….ʹ किन्तु सेठजी को बड़ा लज्जित हुआ देखकर उन्होंने पूछाः “भाई ! तुम लज्जित क्यों हो गये ?” सेठ बोलाः “महाराज ! आपने लोगों को बताया कि ʹये बड़े दानी हैं, सत्संगियों की सेवा करते हैं…..ʹ आदि। …..लेकिन बाबाजी ! मैं तो कुछ भी नहीं करता हूँ। सूर्य और चन्द्रमा दिन-रात रोशनी दे रहे हैं, हवायें चल रही हैं। दिया हुआ सब दाता का है, मेरा तो यह शरीर भी नहीं है।”

देने वाला दे रहा, दिन और रैन।

लोग मुझे दानी कहें, इसलिए नीचे नैन।।

दान तो करो लेकिन दान का गर्व मत करो। सेवा तो करो किन्तु सेवा का गर्व मत करो। भजन करो किन्तु भजन का गर्व मत करो। मित्र बनाओ लेकिन ʹमेरे इतने मित्र हैं…. मेरे पास इतना धन है….ʹ ऐसा गर्व न हो। धनबल, जनबल, सत्ताबल ये सारे बल प्रकृति के हैं। आप उनको अपना मानकर उनमें उलझो मत, अपितु ये वस्तुएँ प्रकृति की हैं और आप अमर आत्मा हो, परमात्मा का सनातन सत्य हो, अपने परमात्म-स्वभाव का सुमिरन-मनन-निदिध्यासन करके अपने अलौकिक सुख और ज्ञान को प्रगट कर लो भैया !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2000, पृष्ठ संख्या 4,5,6 अंक 94

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सेवा का रहस्य


अपने निजी स्वार्थ को जीवन का एकमात्र लक्ष्य बनाकर एक संकुचित क्षेत्र के अंदर कोल्हू के बैल की तरह घूमते हुए मानव समाज की वास्तविक उन्नति के लिए अत्यन्त आवश्यकता है ʹसेवाʹ की।

सेवा संकुचित क्षेत्र में फँसे हुए स्वार्थी मानव को विश्वात्मा के साथ एकत्व कराने की एक अनुपम कला है। श्रद्धा से सम्पृक्त सेवा ही धर्म है। स्नेह-संयुक्त सेवा वात्सल्य है। मैत्रीपरम सेवा सख्य है। मधुर सेवा श्रृंगार है। प्रेमयुक्त सेवा ही अमृत है। संयोग में यह रससृष्टि तथा वियोग में हितवृष्टि करती है। सेवा एक ऐसी दृष्टि है जो पाषाणखण्ड में ईश्वर को प्रगट कर सकती है, मृत को अमर बना सकती है। सेवा क्षुद्र अहंकार को मिटाकर ब्रह्मभाव को प्रगट कर देती है। अपने हितैषी के प्रति जो श्रद्धा, विश्वास अथवा सेवा की भावना है, वर उस पर उपकार करने के लिए नहीं है। ʹमैं अपनी सेवा के द्वारा अमुक को सुख पहुँचाता हूँ….ʹ यह भावना अहंकार को आभूषण पहनाती है। सेवा दूसरे पर उपकार करने के लिए नहीं अपितु अपने अन्तःकरण की शुद्धि के लिए होती है। सेवा चित्त को गंगाजल के समान निर्मल एवं स्वच्छ बनाने वाली है।

सेवानिष्ठा की परिपक्वता के लिए उसका विषय एक होना आवश्यक है। फिर चाहे माता-पिता हों गुरु, ईश्वर अथवा समाज हो, सभी में एक ही ईश्वर है। एक की भावना से सेवा अचल हो जाती है और वेदान्त के अनुसार अचल वस्तु ब्रह्म से पृथक नहीं होती। चल ही माया है, अचल नहीं। साधना में निष्ठा की परिपक्वता ही सिद्धि है। यदि सेवा की वृत्ति परिपक्वता दशा में शांत हो जायेगी तो वह आत्मा से एकत्व करा देगी और स्वयं भी आत्मस्वरूप हो जायेगी।

सेवा के प्रारम्भ में स्व-सुख की वासना उपस्थित हो सकती है परन्तु जब सेवक सेवा के द्वारा सेव्य को प्रसन्न करना चाहता है और सेव्य की प्रसन्नता में स्वयं हर्षित होता है तब उसकी स्व-सुख की वासना धीरे-धीरे कम होने लगती है। केवल अपने इष्ट के सुख में सुखी होना उसका स्वभाव बन जाता है और अन्य सुखों की इच्छा निवृत्त होने लगती है। ʹमैं अपनी सेवा से किसी को सुख देता हूँ….ʹ यद्यपि यह भावना भी पूर्ण निःस्वार्थता नहीं है परन्तु यह स्वार्थ-निवृत्ति का एक साधन है। अतः प्रारम्भिक अवस्था में इसे दोष नहीं माना जा सकता। यह प्रभु प्रेमरूपी महल में पहुँचाने वाली प्रथम सीढ़ी है क्योंकि जिस हृदय में अपने इष्ट को देखना है, रखना है, वहाँ प्रारम्भ में इष्ट के लिए हित की भूमिका का बनना आवश्यक भी है। यह प्रारम्भ है, पूर्णता नहीं। वेदान्त की भाषा में जब तक सेवक का ʹमैंʹ पूर्ण रूप से स्वामी के ʹमैंʹ में विलीन नहीं हो जाता, तब तक सेवा पूर्ण नहीं होती।

सेवा में इष्ट तो एक होता ही है, सेवक भी एक ही होता है। वह सब सेवकों के रूप में स्वयं ही अनेक रूप धारण करके अपने स्वामी की सेवा करता है। अनेक सेवकों के साथ वह सेवा के अनेक  प्रकारों को भी अपना ही रूप मानता है। भिन्न दृष्टि होने पर ईर्ष्या का प्रागट्य होता है जो कि सेवा में विष है। सरलता सेवा में अमृत है।

किसी भी कारण किसी के प्रति चित्त में कटुता आ जाने से सेवा भी कटु हो जाती है क्योंकि सेवा शरीर का विषय नहीं अपितु रसमय हृदय का मधुर उल्लास है। सेवा में क्रिया की अपेक्षा भाव की प्रधानता है। भाव की मधुरता से सेवा भी मधुर रहती है। कटुता चाहे किसी के प्रति भी हो परन्तु उसका निवास-वस्तु स्वयं ही अशुद्ध हो जायेगी। अपने अन्तर को शांत व निर्मल रखकर रोम-रोम को रसमय करने का नाम है ʹसेवाʹ।

सेवा में सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु है सेवक का लक्ष्य। क्या किसी मनोरथ की पूर्ति, प्रतिष्ठा की आकांक्षा या किसी को वश में करने की इच्छा है ? यदि ऐसा है तो यह सेवा नहीं, स्वार्थ का ताण्डवमात्र है। सेवा का फल न तो स्वर्गादि की प्राप्ति है और न ही भोग-ऐश्वर्य की। सेवा स्वयं एक सर्वोत्तम फल है। सेवा केवल उपाय नहीं अपितु उपेय (प्राप्तव्य) भी है।

जिसके मन में ऐसी कल्पना उठती हो किः ʹमुझे तो सेवा का कोई फल नहीं मिला….ʹ वह सेवा का रहस्य नहीं जानता। उसकी दृष्टि प्राप्त जीवनशक्ति एवं प्रज्ञा के सदुपयोग की ओर न होकर किसी आगन्तुक पदार्थ पर है। यह स्वार्थ का खेल है, सेवा नहीं। सेवा चित्तशुद्धि का साधन होने के साथ-साथ शुद्ध वस्तु का अनुभव भी है।

स्पर्धा सेवा को कलंकित करने वाला मैल है। सेवा में स्पर्धा का आ जाना, दूसरे को पीछे छोड़ने के लिए स्वयं आगे बढ़ने की इच्छा रखना, दूसरे की सेवा को देखकर ईर्ष्या होना अथवा तो दूसरे को अपनी सेवा में बाधा मान लेना, इनसे सेवा के अंतरंग मर्मस्पर्शी रूप का दर्शन नहीं हो पाता। सेवा चित्त को निर्मल व उज्जवल बनाती है। उसमें अनुरोध ही अनुरोध है, विरोध अथवा अवरोध नहीं है।

जड़-चेतन जीवमात्र में भगवान के स्वरूप का दर्शन करके भगवद् बुद्धि करने से अपने प्रत्येक कर्म के द्वारा उनकी यथायोग्य उल्लासपूर्ण सेवा होती है। ऐसे सेवक के प्रत्येक कार्य से चराचर जगत में व्याप्त परमात्मा प्रसन्न होते हैं। यह सेवा अपने-आप में उत्कृष्ट भगवदपूजा है। सबमें भगवद्-दर्शन करने से वह स्वयं भी वही रूप हो जाता है क्योंकि स्वामी की सत्ता की सेवक की सत्ता है। सेवक का अस्तित्त्व स्वामी से पृथक नहीं होता। यदि पृथक हो गया तो सेवा अपूर्ण रहेगी क्योंकि पृथक होने से एक नये ʹमैंʹ की उत्पत्ति हो जाती है और वह सेवा के रस को अपने में समेट लेता है। स्वामी का ज्ञान ही सेवक का ज्ञान है और इस प्रकार अंततः स्वामी का ʹमैंʹ ही सेवक का ʹमैंʹ हो जाता है, सेवक स्वयं स्वामी हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2000, पृष्ठ संख्या 6-7 अंक 91

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