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भगवान के दर्शन से भी ऊँचा


 

(पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)

आत्मसाक्षात्कार करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। जीव, जगत (स्थूल जगत, सूक्ष्म जगत) और ईश्वर – ये सब माया के अन्तर्गत आते हैं। आत्मसाक्षात्कार माया से परे है। जिसकी सत्ता से जीव, जगत, ईश्वर दिखते हैं, उस सत्ता को मैं रूप से ज्यों का त्यों अनुभव करना, इसका नाम है आत्मसाक्षात्कार। जन्मदिवस से भी हजारों गुना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है। आत्मासाक्षात्कार दिवस। भगवान कहते हैं-

 

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।

यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।।

 

हजारों मनुष्यों में कोई विरला सिद्धि के लिए यत्न करता है और उन सिद्धों में से कोई विरला मुझे तत्वतः जानता है।

 

आत्मसाक्षात्कार को ऐसे कोई विरले महात्मा ही पाते हैं। योगसिद्धि, दिव्य दर्शन, योगियों का आकाशगमन, खेचरी, भूचरी सिद्धियाँ, भूमि में अदृश्य हो जाना, अग्नि में प्रवेश करके अग्निमय होना, लोक-लोकान्तर में जाना, छोटा होना, बड़ा होना इन अष्टसिद्धियों और नवनिधियों के धनी हनुमानजी आत्मज्ञानी श्रीरामजी के चरणों में गये, ऐसी आत्मसाक्षात्कार की सर्वोपरि महिमा है। साधना चाह कोई कितनी भी ऊँची कर ले, भगवान राम, श्रीकृष्ण, शिव के साथ बातचीत कर ले, शिवलोक में शिवजी के गण या विष्णुलोक में जय-विजय की नाईं रहने को भी मिल जाय फिर भी साक्षात्कार के बिन यात्रा अधूरी रहती है।

 

आज हमारी असली शादी का दिवस है। आज ईश्वर मिलन दिवस, मेरे गुरूदेव का विजय दिवस है, मेरे गुरूदेव का दान दिवस है, गुरूदेव के पूरे बरसने का दिवस है। दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो पूरी मानवता के लिए अपने परम तत्त्व को पा सकने की खबर देने वाला दिवस आत्मसाक्षात्कार दिवस है। आज वह पावन दिवस है जब जीवात्मा सदियों की अधूरी यात्रा पूरी करने में सफल हो गया। धरती पर तो रोज करीब डेढ़ करोड़ो लोगों का जन्म दिवस होता है।

 

शादी दिवस और प्रमोशन दिवस भी लाखों लोगों का हो सकता है। ईश्वर के दर्शन का दिवस भी दर्जनों भक्तों का हो सकता है लेकिन ईश्वर-साक्षात्कार दिवस तो कभी-कभी और कहीं-कहीं किसी-किसी विरले को देखने को मिलता है। जो लोक संत हैं और प्रसिद्ध हैं उनके साक्षात्कार दिवस का तो पता चलता है, बाकी तो कई ऐसे आत्मारामी संत हैं जिसका हमको आपको पता ही नहीं। ऐसे दिवस पर कुछ न करें तब भी वातावरण में आध्यात्मिकता की अद्भुत तरंगें फैलती रहती हैं।

 

आसोज सुद दो दिवस, संवत बीस इक्कीस।

मध्याह्न ढाई बजे, मिला ईस से ईस।।

 

देह मिथ्या हुई पढ़ते तो हो, बोलते तो हो लेकिन देह कौनसी, पता है जो दिखती है वह स्थूल देह है, इसके अंदर सूक्ष्म देह है। विष्णुभक्त होगा तो विष्णुलोक में जायगा, तत्त्वज्ञान नहीं है तो अभी देह मिथ्या नहीं हुई। अगर पापी है तो नरकों में जायेगा फिर पशुयोनि में आयेगा, पुण्यात्मा है तो स्वर्ग में जायेगा फिर अच्छे घर में आयेगा, लेकिन अब न आना न जाना, अपने आपमें व्यापक हो जाना है। जब तत्त्व ज्ञान हो गया तो देह और आकृति का अस्तित्व अंदर टिकाने वाला शरीर मिथ्या हो गया। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर सारे बाधित हो गये। जली हुई रस्सी देखने में तो आती है लेकिन उससे आप किसी को बाँध नहीं सकते। ऐसे ही जन्म जन्मांतरों की यात्रा का कारण जो अज्ञान था, वह गुरु की कृपादृष्टि से पूरा हो गया (मिट गया)। जैसे धान से चावल ले लिया भूसी की ऐसी-तैसी, केले से गूदा ले लिया फिर केले के छिलके को तुम कैसे निरर्थक समझते हो, ऐसे ही शरीर होते हुए भी-

 

देह सभी मिथ्या हुई, जगत हुआ निस्सार।

हुआ आत्मा से तभी,  अपना साक्षात्कार।।

 

आज तो आप लोग भी मुझे साक्षात्कार-दिवस की खूब मुबारकबादी देना, इससे आपका हौसला बुलंद होगा। जैसे खाते पीते, सुख-दुःख, निंदा स्तुति के माहौल से गुजरते हुए पूज्यपाद भगवत्पाद श्री श्री लीलाशाहजी  बापू, रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि अथवा तो और कई नामी-अनामी संत समत्वयोग की ऊँचाई तक पहुँच गये, साक्षात्कार कर लिया, ऐसे ही आप भी उस परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं, ऐसे ही साक्षात्कारी पुरूषों के इस पर्व को समझने सुनने से आत्मचाँद की यात्रा करने का मोक्षद्वार खुल जाता है।

 

मनुष्य तू इतना छोटा नहीं कि रोटी, कपड़े मकान, दुकान या रूपयों में ही सारी जिंदगी पूरी कर दे। इन छूट जाने वाली असत् चीजों में ही जीवन पूरा करके अपने साथ अन्याय मत कर। तू तो उस सत्स्वरूप परमात्मा के साक्षात्कार का लक्ष्य बना। वह कोई कठिन नहीं है, बस उससे प्रीति हो जाये।

 

असत् पदार्थों की और दृष्टि रहेगी तो विषमता बढ़ेगी। यह शरीर मिथ्या है, पहले नहीं था, बाद में नहीं रहेगा। धन, पद ये मिथ्या हैं, इनकी तरफ नजर रहेगी तो आपका व्यवहार समतावाला होगा। धीरे धीरे समता में स्थिति आने से आप कर्मयोगी होने में सफल हो जाओगे। ज्ञान के द्वारा सत् असत् का विवेक करके सत् का अनुसंधान करोगे और असत् की आसक्ति मिटाकर समता में खड़े रहोगे तो आपका ज्ञानयोग हो जायगा। बिना साक्षात्कार के समता कभी आ ही नहीं सकती चाहे भक्ति में प्रखर हो, योग में प्रखर हो, ज्ञान का बस भंडार हो लेकिन अगर साक्षात्कार नहीं हुआ तो वह सिद्धपुरूष नहीं साधक है। साक्षात्कार हुआ तो बस सिद्ध हो गया।

 

इस महान से महान दिवस पर साधकों के लिए एक उत्तम तोहफा यह है कि आप अपने दोनों हाथों की उँगलियों को आमने सामने करके मिला दें। होंठ बंद करके जीभ ऐसे रखें कि न ऊपर लगे न नीचे, बीच में रखें। फिर जीव-ब्रह्म की एकता का संकल्प करके, तत्त्वरूप से जो मौत के बाद भी हमारा साथ नहीं छोड़ता उसमें शांत हो जायें। यह अभ्यास प्रतिदिन करें, कुछ समय श्वासोच्छवास की गिनती करें जिससे मन एकाग्र होने लगेगा, शक्ति का संचय होने लगेगा। धीरे-धीरे इस अभ्यास को बढ़ाते जायेंगे तो तत्त्व में स्थिति हो जायेगी। जीवन की शाम होने के पहले साक्षात्कारी महापुरूषों की कृपा की कुंजी से साक्षात्कार कर लेना चाहिए।

 

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इक घड़ी न मिलते ता कलिजुगु होता….


 

सिख समाज के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव जी बचपन से ही धार्मिक कार्यों और सत्संगियों की सेवा में रूचि लेते थे। अर्जुनदेव अपने पिता गुरु रामदास जी से पिता के नाते उतना लगाव नहीं रखते थे, जितना गुरु के नाते रखते थे। एक भी क्षण के लिए वे अपने गुरु रामदास जी से दूर होना नहीं चाहते थे। गुरु राम दास जी ने अपने पुत्र अर्जुन देव में सेवा, गुरुचरणों में समर्पण, अधिकार नहीं कर्तव्य में रूचि, आज्ञापालन में निष्ठा आदि सदगुणों को देख के यह निश्चय कर लिया था कि ‘गुरुगद्दी का अधिकारी तो अर्जुनदेव ही हो सकता है।’ इसलिए उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का निर्णय किया।
एक बार गुरु रामदासजी के पास उनके एक संबंधी का संदेश आया कि ‘मेरे पुत्र का विवाह है। आप इस अवसर पर लाहौर अवश्य पधारें।’ गुरु रामदास जी ने अपने बड़े बेटे पिरथीचंद को वहाँ जाने के लिए कहा तो पिरथीचंद ने अपने पीछे कहीं छोटे भाई अर्जुनदेव को गुरुगद्दी न सौंप दी जाय इस भय से मना कर दिया। तब गुरु जी ने दूसरे बेटे बाबा महादेव जी को वहाँ जाने के लिए कहा उन्होंने भी मना कर दिया क्योंकि उन्हें संसारी बातों में रूचि नहीं थी। तब रामदास जी ने अर्जुनदेव जी कहाः “बेटा ! तुम लाहौर जाओ और जब तक मैं न बुलाऊँ, तुम वहीं रहना।”

अर्जुनदेव जी गुरुआज्ञा पाते ही लाहौर निकल पड़े। विवाह-कार्य सम्पन्न हुआ। 3-4 महीने हो गये लेकिन अभी तक गुरु जी की ओर से न कोई पत्र आया न ही बुलावा। उनको 4 महीने का बिछुड़ना 4 युगों के समान प्रतीत होने लगा। गुरुदेव के बिना एक-एक पल काटना मुश्किल हो गया तब अर्जुनदेव जी ने गुरु जी को पत्र लिखाः

मेरा मनु लोचै गुर दरसन ताई।
बिलप करे चात्रिक की निआई।…..

‘हे गुरु जी ! आपके दर्शन के लिए मेरा मन व्याकुल है और चातक की तरह विलाप करता है। हे संतजनों के प्यारे ! आपके दर्शन के बिना प्यास नहीं बुझती।’

यह पत्र पिरथीचंद के हाथ लगा। उन्होंने उसके गुरु जी तक इस डर से नहीं पहुँचने दिया कि कहीं गुरुजी उनको बुला न लें। 10-12 दिन हुए, गुरु जी की ओर से कोई पत्र न आया। अर्जुन देव जी ने दूसरा पत्र लिखाः

तेरा मुखु सुहावा जीउ सहज धुनि बाणी।……

‘आपका मुख शोभनीय है और वाणी सहज अर्थात् शांतिरूप है। हे सारंगपाणि ! आपके दर्शन किये चिरकाल हो गया है। हे मेरे प्रभु ! मेरे मित्र ! सज्जन ! यह स्थान धन्य है जहाँ आप बस रहे हैं !’

यह पत्र भी पिरथीचंद को मिल गया, उन्होंने वह पत्र भी छुपा लिया। इधर अर्जुनदेव जी की व्याकुलता बढ़ती गयी। उन्होंने कुछ समय पश्चात् तीसरा पत्र लिखकर जिस सिख के हाथ भेजा, उससे कहा कि वह उसे गुरु जी के सिवा किसी को न दे। उसमें लिखा थाः

इक घड़ी न मिलते ता कलिजुगु होता।…..

‘एक घड़ी दर्शन न होने पर तो समय कलियुग सा लगता है लेकिन हे प्यारे ! अब आपको कब मिलूँगा ? हे गुरु ! आपका दरबार देखे बिना मुझे नींद नहीं आती और न ही मेरी रात्रि बीतती है। मैं तन, मन और वाणी से उस गुरु पर बलिहारी जाता हूँ, जिसका दरबार सच्चा है।’

सिख ने वह पत्र सीधा गुरु रामदास जी को दिया। गुरु जी ने अर्जुन देव का पत्र पढ़ा, उनके आँसू बह निकले। अर्जुनदेव जी का त्याग एवं समर्पण देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए। पत्र पर तीन का अंक देखकर सिख से पूछाः “दूसरे दो पत्र कहाँ हैं ?” सिख ने उत्तर दियाः “मैंने वे पत्र तो पिरथीचंद को दिये थे।”

गुरु जी ने पिरथीचंद को बुलाकर पूछा तो उन्होंने साफ मना कर दिया। अंतर्यामी गुरु जी ने अपने सेवक को कहाः “जाओ, पिरथीचंद की कोट की जेब में दोनों पत्र पड़े हैं, उनको ले आओ।” सिख जाकर पत्र ले आया।

पिरथीचंद शर्माये। उन्होंने कहाः “पिता जी ! वे पत्र मेरे द्वारा लिखे गये हैं।”

गुरु जी ने अर्जुनदेव जी को बुलवा लिया। फिर दोनों से कहाः “इस वाणी की तीन सीढ़ियाँ (पंक्तियाँ) हैं, जो इसकी चौथी सीढ़ी का उच्चारण करेगा, उसी की पहली तीनों सीढ़ियाँ समझी जायेंगी।”

पिरथीचंद तो झूठ बोला था, उनसे तो वाणी उच्चारित नहीं हो सकी। अर्जुनदेव जी ने चौथी सीढ़ी का उच्चारण करते हुए कहाः

भागु होआ गुरि संत मिलाइआ।
प्रभु अबिनासी घर महि पाइआ।….

‘जब पुण्यों का प्रभाव हुआ, सौभाग्य हुआ तब संतों ने आप ही गुरु से मिलाप करा दिया और अब (आपकी कृपा से) अविनाशी प्रभु अंतःकरण रूपी घर में प्राप्त हुआ है। अब प्रार्थना है कि आपकी सेवा करते हुए पलभर भी न बिछड़ूँ। मैं आपका दास हूँ।’

गुरु राम दास जी बहुत प्रसन्न हुए और अर्जुनदेव जी को गले लगाकर बोलेः “बस बेटा ! तुम ही गुरु की पदवी के योग्य हो।” अर्जुनदेव जी गुरु के प्रति तड़प जल्दी ही उन्हें गुरु के निकट ले आयी।

जब बच्चा झूठमूठ में रोता है तो माँ ध्यान न भी दे लेकिन जब वह माँ के लिए सचमुच तड़पता है तो माँ उससे दूर नहीं रह पाती, तो हजारों माताओं की करुणा जिनके हृदय में होती है, ऐसे सदगुरु के लिए शिष्य के लिए हृदय में सच्ची तड़प जग जाय तो वे भला दूर कैसे रह सकते हैं !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2015, पृष्ठ संख्या 23, अंक 274
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कैसी भयंकर दुर्गति !


 

श्री रामचरितमानस के उत्तरकांड में गरुड़ जी काकभुशुंडिजी से पूछते हैं- ‘कौन सा दुःख सबसे बड़ा है ? आप संत और असंत के मर्म (भेद) को जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिये। श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान पुण्य कौन-सा है और सबसे भयंकर पाप कौन सा है ?

काकभुशुंडिजी कहते हैं- “हे तात ! बड़े आदर के साथ और प्रेम से सुनो। दरिद्रता (अज्ञान) से बढ़कर दुःख संसार में कोई नहीं है। संसार में जो आसक्ति है, यही सभी दुःखों का कारण है और संत-मिलन के समान जगत में कोई दूसरा सुख नहीं है। हे गरुड़ ! मन, वचन, शरीर से दूसरे पर उपकार करना संत का सहज स्वभाव है। संत दूसरे के हित के लिए दुःख सहते हैं और असंत, अभागी दूसरे को दुःख देने के लिए सब कुछ करते हैं।”

दुष्ट बिना स्वार्थ के भी दूसरे को हानि पहुँचाता है। जैसे साँप डंक मारता है तो उसको कुछ खाने-पीने को मिलता है ? बस, दूसरे के अंदर जहर डालता है। चूहा भी दूसरों का कपड़ा काट देता है तो क्या उसका पेट भरता है ? नहीं, वह निरर्थक दूसरों को हानि पहुँचाता है। ओले बरसकर गेहूँ चने को नष्ट करके स्वयं धरती में मिट्टी में मिल गये, दुष्ट का भी जन्म जगत के अनर्थ के लिए है।

‘संत उदय संतत सुखकारी ‘ संत का उदय, जन्म, अभ्युदय हमेशा वैसे ही सुखकारी होता है जैसे चन्द्रमा और सूर्य का उदय लोगों के लिए हितकारी है।

‘परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा’ – श्रुति विदित परम धर्म है दूसरे को कष्ट नहीं पहुँचाना, जानबूझकर किसी को तकलीफ न देना। दूसरे की निंदा करने से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं है। जो भगवान और गुरु की निंदा करता है, वह मेंढक होता है। टर्र… टर्र….. तो बहुत करे लेकिन ऐसी जीभ का क्या होना और क्या न होना ! जीभ निंदा करने के लिए नहीं मिली है, यह तो भगवद्-गुणानुवाद के लिए मिली है। ब्राह्मण (ब्रह्म में रमण करने वाले संत-महापुरुषों) का निंदक बहुत नरक-भोग के बाद कौए का शरीर धारण करके संसार में पैदा होता है और व्यर्थ काँव-काँव करता है क्योंकि पहले जो बोलने की शक्ति मिली थी, वह तो निंदा करने में खर्च कर दी।

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी।
रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
होहिं उलूक संत निंदा रत।
मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।

‘जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है।’

जो मूर्ख मनुष्य सबकी निंदा करते हैं वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। कैसी भयंकर दुर्गति होती है निंदा करने वालों की !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2015, पृष्ठ संख्या 8, अंक 274
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