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पूज्य बापूजी के सद्भावना-वचन : जोधपुर से एतिहासिक सत्संग


 

 

पूज्य बापूजी ने हमेशा कानून-व्यवस्था को सहयोग दिया है एवं अपने साधकों को भी धैर्य व शांति बनाये रखने का संदेश समय-समय पर देते रहे हैं । जोधपुर कोर्ट का निर्णय आने के परिप्रेक्ष्य में पुलिस प्रशासन को सहयोग हो इसलिए पूज्य बापूजी ने पहले ही सभी साधकों को संदेश दिया था कि ‘25 अप्रैल को जोधपुर आना पैसे, श्रम, स्वास्थ्य और समय की बरबादी है ।’ विपरीत निर्णय आने के बावजूद सभीने समता, धैर्य एवं शांति का परिचय दिया । इस पर पूज्यश्री ने कहा है कि ‘मैं सभीको हृदयपूर्वक शाबाशी, धन्यवाद देता हूँ कि जोधपुर न आने की बात मान ली । मेरे उन माई के लालों को, उनके माता-पिताओं को धन्यवाद है । ‘चलो, जोधपुर पहुँचो । यह करो, वह करो…’ – सोशल मीडिया पर क्या-क्या डाल देते हैं । लेकिन सबने ऐसी अफवाहों को मटियामेट कर दिया और नहीं आये इससे मुझे बड़ी संतुष्टि है । पुलिस विभाग तथा और भी सब संतुष्ट हैं । जो जोधपुर नहीं आये, आज्ञा मानी उनकी गुरुभक्ति फली । पहले जो आ गये थे उनकी तपस्या फली, मान-अपमान सहा ।’
पूज्यश्री ने आश्रम के नाम पर फैलायी जानेवाली अफवाहों से सावधान किया है कि ‘कोई ऐसे भी लोग पैदा हो गये हैं कि आश्रम के लेटर पैड की नकल करके उसके द्वारा ‘फलानी पार्टी के विरुद्ध हमारे साधक यह करेंगे, वह करेंगे… हम इतने करोड़ साधक हैं… मैं फलाना संचालक हूँ ।’ यह सब नकली धौंस देते हैं पार्टियों को । हस्ताक्षर करके सोशल मीडिया पर डाल देते हैं अथवा और कुछ कर देते हैं । हमारे साधक ऐसी धौंस नहीं देते । यह हमारे शिष्यों की भाषा ही नहीं है । ऐसा कोई व्यक्ति फर्जी संचालक बन जाता है और साधकों को बदनाम करने के लिए प्रशासन या पुलिस से भिड़ाने की कोशिश करता है तो मेरे साधक भिड़ने की बेवकूफी नहीं करेंगे ।
‘बापू का वीर’ कहला के  कुछ-का-कुछ  बोल देते हैं, ऐसे लोगों की बातों में नहीं आओ । सबका भला हो । कोई गड़बड़ संदेश डालें तो उनसे सावधान तो रहना ही पड़ेगा । भ्रामक प्रचार में नहीं पड़ो, मेरे सिद्धांत पर ही चलो ।
उपद्रवियों एवं भड़कानेवालों से बचो । अहिंसा परमो धर्मः । हमारा किसी भी पार्टी, व्यक्ति या पब्लिसिटी चाहनेवालों से विरोध नहीं है ।
अब कोई बोलते हैं, ‘आश्रमवालों पर दबाव बनाओ । लीगलवाले ऐसे हैं – वैसे हैं…’ तो यह भड़काऊ लोगों का काम है । न लीगलवालों का कोई कसूर है न आश्रमवालों का, ये परिस्थितियाँ आती रहती हैं । आश्रमवाले बुरे नहीं हैं, सब हमारे प्यारे हैं, बच्चे हैं । जो अवसरवादी हैं वे आश्रमवालों को बदनाम करके खुद आश्रम के संचालक बनना चाहते हैं लेकिन उनको पता नहीं है कि हमारे भक्त जानते हैं कि आश्रमवाले बापू को चाहते हैं, बच्चे-बच्चियाँ – सभी चाहते हैं ।
जो लोग बाहर से नहीं चाहते हैं वे भी सत्संग सुनते हैं और भीतर से तो ‘वाह ! वाह !’ करते हैं । जेल में 1500 भाई रहते हैं, कोई भी मेरे प्रति नाराज नहीं है । बस, उछालनेवालों ने तो उछाल दिया कि ‘कैदियों ने थालियाँ बजायीं…’ नहीं, उन  बेचारों ने  तो खाना  छोड़ दिया । ‘बापू फफक-फफक के रोये…’ बापू ऐसे नहीं हैं । ‘बापू को यह हो गया – वह हो गया’ – ऐसी बातों में नहीं आना । बापू के बच्चे, नहीं रहेंगे कच्चे !
जो दुःखी हो गये थे, मेरे को प्रसन्न देखकर उनका दुःख भी मिट जाता है । बापू मौज में हैं क्योंकि बापू ने बड़े बापू (साँईं लीलाशाहजी महाराज) की बात मान ली । आप भी मेरी बात मान लो । परिस्थितियाँ व आँधी-तूफान आते हैं परंतु बाद में मौसम बड़ा सुखदायी हो जाता है । बढ़िया, सुखदायी परिस्थितियाँ आयेंगी ।
हमारे साधकों पर राजनीति का कीचड़ मत उछालो । किसी पार्टी को बदनाम करने की कोशिश न करो । भगवान सबका भला करे । हम किसीको क्यों कोसें ?’
बापूजी ने धैर्य एवं उमंग बनाये रखने की हिदायत भी दी है कि ‘बड़े मनवाले बनो । जितनी बड़ी गाज गिरती है उतने बड़े रास्ते भी बन जाते हैं । तो ऐसा नहीं है कि जो हो गया वह सब आखिरी है । ऊपर और भी न्यायालय हैं, कहीं गलती होती है तो दूसरा ऊपर का न्यायालय सुधार लेता है । तो बड़े मनवाले भी बनो और धैर्यवान भी बनो !

महामनाः स्यात्, तद् व्रतम् । 
तपन्तं न निन्देत्, वर्षन्तं न निन्देत्, ऋतून् न निन्देत्, लोकान् न निन्देत्, पशून् न निन्देत्, मज्ज्ञो नाश्नीयात्, तद् व्रतम् ।

बड़े मनवाले बनो, उदार हृदयवाले बनो, यह व्रत है । गर्मी बढ़ गयी, निंदा न करें । बरसते हुए मेघ की भी निंदा न करें । और भी ऋतुएँ आयेंगी, उनकी निंदा न करें । लोगों की निंदा न करें, पशुओं की निंदा न करें । मांस, मछली आदि न खायें । उपद्रव न करें न करवायें । यह व्रत है । – यह उपनिषद् का वचन मैंने आत्मसात् किया है तो मैं तो मौज में ही रहता हूँ । फिर आप क्यों दुःखी होंगे ! यही तो जीवन का फल है ।’
हर परिस्थिति में सम रहने की सीख देते हुए बापूजी ने कहा है कि ‘जरा-सा डंडा देखकर पूँछ दब जाय (डर जायें), जरा-सा ब्रेड (अनुकूलता) देख के पूँछ हिलने लग जाय (खुश हो जायें) तो कुत्ते में और मनुष्य में क्या फर्क है ? जरा-सा दुःख आ जाय और दुःखी हो जायें, जरा-सा सुख आ जाय तो छाती फुला लें… नहीं, श्रीकृष्ण कहते हैं :

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ।।
 (गीता : 6.32)

सुखद परिस्थिति आ जाय चाहे दुःखद आ जाय… आयी है वह जायेगी । तो अभी ऐसी परिस्थिति आयी है वह भी जायेगी, क्या फर्क पड़ता है ! तुम नित्य रहनेवाले हो और शरीर व परिस्थितियाँ अनित्य हैं । अपने-आपको याद करो, ‘मैं अमर हूँ, चैतन्य हूँ… ।’ लीलाशाह भगवान ने मुझे जो सिखाया वही मैं तुम्हें सिखा रहा हूँ । सीख लो, बस ।
न बेवकूफ बनो न बेवकूफ बनाओ । न दुःखी रहो न दुःखी बनाओ । दुःखाकार और सुखाकार वृत्तियाँ आती हैं, चली जाती हैं । तुम दोनों के साक्षी हो । अपने-आपमें रहो । दुःख आया, सुख आया तो उनसे प्रभावित न होओ । सत्संग होता रहे, सत्कर्म होते रहें ।

बहुत गयी थोड़ी रही, व्याकुल मन मत हो ।
धीरज सबका मित्र है, करी कमाई मत खो ।।

सुख के बड़े प्रलोभन आयें या दुःख के बड़े पहाड़ गिरें, बिजलियाँ चमकें तो घबराना नहीं, मजे में रहना ।

रात अँधियारी हो, घिरी घटाएँ काली हों ।
रास्ता सुनसान हो, आँधी और तूफान हों ।
मंजिल तेरी दूर हो, पाँव तेरे मजबूर हों ।
तो क्या करोगे ? डर जाओगे ?   ना…
रुक जाओगे ?   ना…   तो क्या करोगे ?

बं बं ॐ ॐ, हर हर ॐ ॐ, हर हर ॐ ॐ…

हास्य-प्रयोग करके चिंता, भ्रम और मायूसी को भगा दोगे तो मैं समझूँगा कि तुमने मेरी खूब आरतियाँ कर दीं ।
किसी प्रसिद्ध अखबार ने लिखा है कि ‘बापू के भक्त बोलते हैं कि ‘‘हम किसी मीडिया की बातों से या किसीकी मान्यता से बापू के शिष्य नहीं बने हैं ।’’ वे तो अभी भी इतनी श्रद्धा रखते हैं, यह गजब की बात है !’ मैं ऐसे मीडियावालों को भी धन्यवाद देता हूँ जो हमारे साधकों की सज्जनता को भी प्रकाशित करते हैं । और जिन्होंने नहीं किया वे भी करें । इलाहाबाद के प्रसिद्ध अखबारों ने किया है तो और मीडियावाले भी करें । और नहीं भी करें तब भी हम तो उनके लिए धन्यवाद ही देते हैं । जो नकारात्मक भी प्रचार करते हैं, उनको भी भगवान सद्बुद्धि दें ! जो भी, जैसा भी हो, सबका मंगल, सबका भला । 
भगवान आपकी कैसी साधना कराना चाहते हैं और मेरी परिपक्वता साधकों को कैसे दिखाना चाहते हैं, वह भगवान जो जानते हैं, वह तुम नहीं जानते हो । ऐसी परिस्थिति में भी बापू निर्लेप, निर्दुःख ! फिर तुम तो बापू के बच्चे हो, तुम काहे को दुःखी और परेशान होओगे ? सब बीत जायेगा ।
सत्संग करनेवाले सत्संग करते रहें, बाल संस्कार केन्द्र चलानेवाले बाल संस्कार केन्द्र चलाते रहें – जिसकी जो सेवा है, अपनी-अपनी जगह पर करते रहें ।

खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा ।
ये किश्ती तो हिलती जायेगी,
तू हँसता जा या रोता जा ।।

अरे ! ऐसा हो गया – वैसा हो गया… इसमें क्या है, हो-हो के बदल जाता है ।’
पूज्य बापूजी ने यह भी कहा है कि ‘नारायण साँईं, भारती, भारती की माँ – इतना ही मेरा परिवार नहीं है, मेरे सारे साधक मेरा ही परिवार हैं । और जो साधकों के सम्पर्क में हैं या साधकों को भला-बुरा मानते हैं वे भी मेरा ही परिवार हैं । इस बहाने भी तो वे साधकों का चिंतन करते हैं ! देर-सवेर वे भी प्यारे हो जायेंगे ।
कोई कहते हों, ‘तुम्हारे बापू ऐसे हैं – वैसे हैं…’ तो मैं पूछता हूँ कि हैदराबाद से ‘बायो मेडिकल इंजीनियरिंग’ और अमेरिका से एम.एस. की डिग्री प्राप्त किया हुआ शरद और साइकोलॉजी में एम.ए. की हुई शिल्पी – ये सज्जन माता-पिता के सज्जन बच्चे किसी बीमार लड़की को मेरे पास भेजें और बापू उससे छेड़छाड़ करें – ऐसा ये कर सकते हैं क्या ? और हम ऐसा कर सकते हैं क्या ? जो समय बताते हैं, उस समय में तो हम 9 से 11.15 बजे तक सत्संग व मँगनी के कार्यक्रम में थे । (उसके बाद वहाँ आये हुए भक्तों से बापूजी की कुछ समय तक बातचीत भी चली ।) तो यह सच्ची बात लोग देखते नहीं । जो कुछ आ गया, बोलते रहते हैं । हमको तो भरोसा है कि

साँच को आँच नहीं, झूठ को पैर नहीं ।

बाकी झूठा कितना भी प्रचार-प्रसार हो, कितने भी आरोप लग जायें तो क्या होगा ? मुझे तो गुरुओं के वचन याद हैं : बद होना बुरा, बदकर्म बुरा है लेकिन बदनाम होना बहुत बढ़िया है ।
मेरे बच्चे-बच्चियाँ भी बदनाम हो रहे हैं और मैं भी बदनाम हो रहा हूँ, ये तो बड़ी तपस्या के दिन आ गये ! वाह भाई वाह ! वाह, वाह !!’
पूज्यश्री ने कहा है कि ‘अलग-अलग गौशालाओं में जो 8500 गायें हैं, उनकी भी सेवा होती रहे । जो वृद्ध अथवा गरीब हैं, उनके लिए जो ‘भजन करो, भोजन करो, पैसा पाओ’ योजना चलती है, वह भी चलती रहे । गायों और गरीबों की सेवा चलती रहे सभी जगहों पर ।’

समाजोत्थान में संतों की महती भूमिका


सच्चे संत जाति, धर्म, मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि दायरों से परे होते हैं। ऐसे करुणावान संत ही अज्ञान-निद्रा में सोये हुए समाज के बीच आकर लोगों में भगवद्भक्ति, भगवद्ज्ञान, निष्काम कर्म की प्रेरणा जगा के समाज को सही मार्ग दिखाते हैं, जिस पर चल के हर वर्ग के लोग आध्यात्मिकता की ऊँचाईयों को छूने के साथ-साथ अपना सर्वांगीण विकास सहज में ही कर लेते हैं। सभी में भगवद्-दर्शन करने की प्रेरणा देने वाले ऐसे संतों के द्वारा ही धार्मिक अहिष्णुता, छुआछूत, जातिगत भेदभाव, राग-द्वेष आदि अनेक दोष दूर होकर समाज का व्यापक हित होता है।

ऐसे संतों का जहाँ भी अवतरण हुआ है वहाँ भारतीय संस्कृति के वैदिक ज्ञान का प्रचार-प्रसार होकर समाज में व्यापक परिवर्तन हुए हैं।

जब समाज में कई विकृतियाँ फैलने लगीं तब आद्य गुरु शंकराचार्य जी ने अपने शिष्यों के साथ भारत के कोने-कोने में घूम-घूमकर सनातन धर्म व अद्वैत ज्ञान का प्रचार किया।

यवनों के आक्रमण से जब सम्पूर्ण हिन्दू समाज त्रस्त था तब योगी गोरखनाथ जी व नाथ-परम्परा के योगियों ने समाज में धर्मनिष्ठा व अध्यात्म का प्रचार-प्रसार किया।

राजस्थान में राजर्षि संत पीपा जी ने काशी के स्वामी रामानंद जी से दीक्षा ले के प्रजा को धर्म-मार्ग पर लगाया तो भक्तिमती मीराबाई ने गुरु रैदास जी का शिष्त्व स्वीकार कर सारे राजस्थान और गुजरात में भगवद्भक्ति की गंगा बहायी।

तमिलनाडू के आलवारों (वैष्णव भक्त), नायनारों (शैव भक्त) तथा संत तिरुवल्लुवर जैसे संतों से बड़ी संख्या में लोग लाभान्वित हुए। 11वीं-12वीं शताब्दी में श्री रामानुजाचार्यजी ने ‘वेदांत भक्ति’ का भारतभर में प्रचार किया। आँध्र प्रदेश के संत वेमना के उपदेशों का समाज पर बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा।

गुजरात के संत नरसिंह मेहता जी, संत प्रीतमदास जी आदि ने भी प्रभुभक्ति का प्रचार किया और समाज को सही दिशा दी।

संत तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस तथा अन्य कई ग्रंथों की प्रचलित भाषा में रचना करके सामान्य जनों को आदर्श जीवन जीने की रीति बतायी और उनके जीवन को भक्ति रस से सराबोर कर दिया।

महाराष्ट्र के संतजन – ज्ञानेश्वरजी, नामदेव जी, एकनाथ जी, तुकाराम जी, चोखामेला, राँका, बाँका, जनाबाई, नरहरि जी आदि ने और वारकरी सम्प्रदाय के अन्य संतों ने जब घूम-घूम के भगवन्नाम-संकीर्तन के माध्यम से समाज को जगाना शुरु किया तो लाखों लोग उनके अनुयायी बन भगवद्भक्ति के रास्ते चल पड़े।

सम्पूर्ण महाराष्ट्र संकीर्तन क्रांति में उल्लसित होने लगा। समर्थ रामदास जी के शिष्य शिवाजी महाराज ने विधर्मी आक्रांताओं से पीड़ित समाज में प्राण फूँककर हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की।

पंजाब के संत गुरुनानक देव जी से गुरु गोविन्दसिंह जी तक दस गुरुओं की परम्परा द्वारा पंजाब एवं देश के अन्य भागों के भी लोग लाभान्वित हुए। गुरु हरगोविन्दसिंह, गुरु तेगबहादुर, गुरु गोविन्दसिंह और उनके शिष्यों ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर देशवासियों की धर्मांतरण से रक्षा की।

कर्नाटक के श्री अल्लमप्रभुजी, अक्का महादेवी जी, श्री मध्वाचार्य जी तथा संत पुरंदरदास जी, कनकदास जी आदि ने ज्ञान व भक्ति के माध्यम से समाज की आध्यात्मिक उन्नति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। स्वामी विद्यारण्यजी ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना करके हिन्दू संस्कृति व धर्मशास्त्रों की यवनों से रक्षा की।

ओड़िशा की ‘वैष्णव-पंचसखा परम्परा’ के भक्तों एवं भक्त भीम भोई, दासिया बाउरी, रघु केवट आदि ने लोगों के भक्तिभाव को पुष्ट किया। बलरामदास जी के ‘रामायण’, शारलादास जी के ‘महाभारत’ व जगन्नाथदास जी के ‘भागवत’ ओड़िशावासियों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला।

बंगाल के श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिष्यों के साथ सम्पूर्ण देश में संकीर्तन यात्राओं द्वारा भगवन्नाम का प्रचार किया। उन यात्राओं में मुसलमान भी शामिल होते थे। आक्रांताओं द्वारा नष्ट व लुप्त हुए कई तीर्थस्थलों को गौरांग व उनके शिष्यों ने पुनः खोज निकाला। रामकृष्ण परमंहस जी के सत्शिष्य स्वामी विवेकानंद जी ने विदेशों में भी वेदांत का प्रचार किया और स्वदेश में जवानों को राष्ट्रभक्ति के संदेशों के माध्यम से अंग्रेज शासन से स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए प्रेरित किया।

असम में श्रीमंत शंकरदेव जी, श्री माधवदेव जी आदि ने धार्मिक-सामाजिक उत्थान में अहम भूमिका निभायी।

संत उड़िया बाबा जी, स्वामी अखंडानंद जी, आनंदमयी माँ, हरि बाबा जी, रमण महर्षि, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी शिवानंद सरस्वती आदि संतों ने भारतीय संस्कृति का अध्यात्म-ज्ञान सरल भाषा में समाज तक पहुँचाया।

काशी के स्वामी रामानंद जी ने हर वर्ग के लोगों में आध्यात्मिक प्रसाद बाँटा। उस समय का सूत्र हो गयाः ‘जाति पांति पूछै नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई।’ उनके शिष्य संत कबीर जी, रैदास जी, धन्ना जी आदि अनेक संतों ने लोगों में परमात्मप्राप्ति का अलख जगाया।

इस परम्परा के दादूपंथी संतों ने अपने गुरु की वाणियों के साथ पूर्व के संतों की वाणियों का भी संरक्षण किया, जिनसे बड़ी संख्या में जनता लाभान्वित हुई। संत दादू दयाल जी की परम्परा के संत निश्चलदास जी ने ‘विचारसागर’ ग्रंथ की रचना कर वेदांत का गूढ़ ज्ञान लोगों को प्राकृत भाषा में सुलभ करा दिया।

इसी संत-परम्परा में स्वामी केशवानंद जी महाराज के सत्शिष्य भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी ने समाज में वेदांत-ज्ञान, भक्ति व कर्मयोग का प्रचार किया एवं बाल, युवा, नर-नारी – सभी को संयम-सदाचार की शिक्षा देकर उनका आत्मोत्थान किया। आपने भारत के अलावा विदेशों में भी सत्संगों द्वारा लोगों में सामाजिक, धार्मिक व आध्यात्मिक जागृति की।

समाज की आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करने वाली इस दिव्य ज्योति को जागृत रखने के लिए पूज्यपाद स्वामी लीलाशाह जी के सत्शिष्य संत श्री आशाराम जी बापू गाँव-गाँव, नगरों-महानगरों में घूम-घूमकर कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग के साथ कुंडलिनी योग आदि का समन्वय करते हुए जीवन को सुखी स्वस्थ व सम्मानित बनाने वाला सत्संग एवं ध्यान का प्रसाद बाँटने लगे। वर्तमान में भी देश-विदेश के करोड़ों लोग आपके मार्गदर्शन में परम ध्येय ईश्वरप्राप्ति की ओर अग्रसर हो रहे हैं।

आपने समाज के पिछड़े, अभावग्रस्त लोगों को भोजन, भजन, कीर्तन, सत्संग लाभ एवं जीवनोपयोगी वस्तुएँ व आर्थिक सहायता देकर उन्हें स्वधर्म के प्रति निष्ठावान बनाया व धर्मांतरण से बचाया। कत्लखाने भेजी जा रही हजारों गायों की रक्षा की और उनके लिए गौशालाएँ बनवायीं।

पूज्य श्री ने खान-पान, पहनावा, जन्मदिवस मनाने, बच्चों का नामकरण करने तथा पर्वों को मनाने की पद्धतियों में आयी विकृतियों से समाज को सावधान किया तथा इन सबके हितकारी तौर-तरीके बताकर उनके पीछे छुपे आध्यात्मिक रहस्यों को भी समझाया। आपने संयम-सदाचार प्रेरक ‘युवाधन सुरक्षा अभियान’ चलाया तथा मातृ-पितृ पूजन दिवस (14  फरवरी) व तुलसी पूजन दिवस (25 दिसम्बर) जैसे संस्कृतिरक्षक पर्वों का शुभारम्भ किया।

जब-जब संतों व संस्कृति पर कोई आँच आयी तब-तब पूज्य बापू जी ने मजबूत ढाल बनकर उसका सामना किया। काँची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती पर जब झूठा आरोप लगा तब आप दिल्ली में धरना देने के लिए पहुँच गये। इसी प्रकार सत्य साँईं बाबा, कृपालु जी महाराज, साध्वी प्रज्ञा, रामदेव बाबा, आचार्य बालकृष्ण आदि के खिलाफ जब कीचड़ उछाला गया तब भी आपने उसके खिलाफ आवाज उठायी। आपकी प्रेरणा से समय-समय पर प्रेरणा सभाएँ, संत सम्मेलन आदि आयोजित किये जाते रहे हैं। आपने भारत को विश्वगुरु पद पर देखने के लिए अपना पूरा जीवन लगाया है।

आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, भौतिक तथा अन्य सभी दृष्टियों से समाज का उत्थान हमारे संतों-महापुरुषों के द्वारा ही हुआ है। संतों ने ही परस्परं भावयन्तु – एक दूसरे को उन्नत करने का भाव तथा मानव को महामना बनाने वाला धर्म, संस्कृति के सिद्धान्तों को समाज में स्थापित किया। समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2018, पृष्ठ संख्या 2,7,8 अंक 305

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लोग निंदा करें तो भले करें, तुम सेवा करते रहो


– भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाह जी महाराज

तुम्हें ये वचन सुनाता हूँ तो यह भी सेवा है। तुम कहोगे कि ‘स्वामी जी ! सेवा का अभिमान होगा।’ अरे नहीं, मैं समाज का ऋणी हूँ। सेवा करके समाज का ऋण उतार रहा हूँ। परोपकार तभी करूँ जब ऋण न हो। गृहस्थ में रहकर भी सेवा करो। मेरी बातें पसंद आती हैं या नहीं ? हम सभी सेवा करें, भलाई के कामों में आगे बढ़ें। लोग निंदा करें तो भले करें, तुम सेवा करते रहो।

साहस करो, कमर कस के हिम्मत करो। हिम्मत से क्या नहीं होता ? हमारी निष्काम सेवा से अंतःकरण उज्जवल होता है और भगवान का आशीर्वाद मिलता है। जिनकी सेवा करते हैं वे बदले में आशीर्वाद देते हैं।

कुछ लोग कहते हैं कि ‘सेवा करते समय कई लोग निन्दा करते हैं’ परंतु सेवा की जायेगी तो दुःख भी सहने होंगे। किसी स्वार्थ से जो सेवा की जाती है, वह उत्तम सेवा नहीं है। प्रकृति को आँखें हैं, वह अपना फल स्वयं देगी।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2018, पृष्ठ संख्या 24 अंक 305

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